पाँच दिन का दीवाली उत्सव धनत्रयोदशी के दिन प्रारम्भ होता है और भाई दूज तक चलता है। दीवाली के दौर.....
 
नरक चतुर्दशी के दिन अभ्यंग स्नान
पाँच दिन का दीवाली उत्सव धनत्रयोदशी के दिन प्रारम्भ होता है और भाई दूज तक चलता है। दीवाली के दौरान अभ्यंग स्नान को चतुर्दशी, अमावस्या और प्रतिपदा के दिन करने की सलाह दी गई है।

चतुर्दशी के दिन अभ्यंग स्नान बहुत ही महत्वपूर्ण होता है जिसे नरक चतुर्दशी के नाम से जाना जाता है। यह माना जाता है कि जो भी इस दिन स्नान करता है वह नरक जाने से बच सकता है। अभ्यंग स्नान के दौरान उबटन के लिए तिल के तेल का उपयोग किया जाता है।

चतुर्दशी के दिन अभ्यंग स्नान लक्ष्मी पूजा से एक दिन पहले या उसी दिन हो सकता है। जब सूर्योदय से पहले चतुर्दशी तिथि और सूर्योदय के बाद अमावस्या तिथि प्रचलित हो तब नरक चतुर्दशी और लक्ष्मी पूजा एक ही दिन हो जाते हैं। अभ्यंग स्नान चतुर्दशी तिथि के प्रचलित रहते हुए हमेशा चन्द्रोदय के दौरान (लेकिन सूर्योदय से पहले) किया जाता है।

अभ्यंग स्नान के लिए मुहूर्त का समय चतुर्दशी तिथि के प्रचलित रहते हुए चन्द्रोदय और सूर्योदय के मध्य का होता है। हम अभ्यंग स्नान का मुहूर्त ठीक हिन्दू पुराणों में निर्धारित समय के अनुसार ही उपलब्ध कराते हैं। सभी तथ्यों को ध्यान में रखकर हम अभ्यंग स्नान के लिए सबसे उपयुक्त दिन और समय उपलब्ध कराते हैं।

नरक चतुर्दशी के दिन को छोटी दीवाली, रूप चतुर्दशी, और रूप चौदस के नाम से भी जाना जाता है।

अक्सर नरक चतुर्दशी और काली चौदस को एक ही त्योहार माना जाता है। वास्तविकता में यह दोनों अलग-अलग त्यौहार है और एक ही तिथि को मनाये जाते हैं। यह दोनों त्यौहार अलग-अलग दिन भी हो सकते हैं और यह चतुर्दशी तिथि के प्रारम्भ और समाप्त होने के समय पर निर्भर होता है।






लक्ष्मी माता की पूजा:--

दीवाली पर लक्ष्मी माता को प्रसन्न करने के लिए लक्ष्मी माता की पूजा की जाती है। लक्ष्मी आ जाने के बाद बुद्धि विचलित न हो इसके लिए लक्ष्मी के साथ गणपति भगवान की भी पूजा की जाती है। देवताओं के खजांची हैं भगवान कुबेर इसलिए दीपावली की रात में इनकी पूजा भी होती है। ऐसी मान्यता है कि माता लक्ष्मी भगवान विष्णु की पूजा के बिना प्रसन्न नहीं होती है। इसलिए विष्णु की भी पूजा होती है। दीपावली की रात मां काली और सरस्वती की भी पूजा लक्ष्मी जी के साथ होती है क्योंकि लक्ष्मी, काली और सरस्वती मिलकर आदि लक्ष्मी बन जाती हैं। इस दिन देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होने के बाद भक्त को कभी धन की कमी नहीं होती। भगवती महालक्ष्मी चल एवं अचल संपत्ति देने वाली हैं। दीपावली की रात लक्ष्मीजी के विधिवत पूजन से हमारे सभी दुख और कष्ट दूर होते हैं। लक्ष्मी पूजन की संक्षिप्त विधि निम्न प्रकार से है:

लक्ष्मी पूजन की सामग्री:--

महालक्ष्मी पूजन में केशर, रोली, चावल, पान, सुपारी, फल, फूल, दूध, खील, बताशे, सिंदूर, सूखे, मेवे, मिठाई, दही, गंगाजल, धूप, अगरबत्ती, दीपक, रूई तथा कलावा नारियल और तांबे का कलश चाहिए। इसमें मां लक्ष्मी को कुछ वस्तुएं बेहद प्रिय हैं। उनका उपयोग करने से वह शीघ्र प्रसन्न होती हैं। इसलिए इनका उपयोग जरूर करें।

वस्त्र:--

लाल-गुलाबी या पीले रंग का रेशमी वस्त्र है।

पुष्प:--

कमल व गुलाब

फल:--

श्रीफल, सीताफल, बेर, अनार व सिंघाड़े

सुगंध:--

केवड़ा, गुलाब, चंदन के इत्र

अनाज:--

चावल, घर में शुद्धता पूर्ण बनी केसर की मिठाई, हलवा, शिरा का नैवेद्य

प्रकाश के लिए:--

गाय का घी, मूंगफली या तिल्ली का तेल

पूजा की तैयारी:--

एक चौकी पर माता लक्ष्मी और भगवान श्रीगणेश की मूर्तियां इस प्रकार रखें कि लक्ष्मी जी की दाईं दिशा में श्रीगणेश रहें और उनका मुख पूर्व दिशा की ओर रहे। कलश को लक्ष्मीजी के पास चावलों पर रखें। नारियल को लाल वस्त्र में इस प्रकार लपेटें कि नारियल का अग्रभाग दिखाई देता रहे व इसे कलश पर रखें। यह कलश वरुण का प्रतीक है। दो बड़े दीपकों में से एक में घी व दूसरे में तेल डालें। एक दीपक चौकी के दाईं ओर रखें व दूसरा मूर्तियों के चरणों में। एक छोटा दीपक गणेशजी के पास रखें।

मूर्तियों वाली चौकी के सामने छोटी चौकी रखकर उस पर लाल वस्त्र बिछाएं। कलश की ओर एक मुट्ठी चावल से इस पर नवग्रह की प्रतीक नौ ढेरियां बनाएं। गणेशजी की ओर चावल की सोलह ढेरियां बनाएं। ये सोलह मातृका की प्रतीक हैं। नवग्रह व षोडश मातृका के बीच स्वस्तिक का चिह्न बनाएं। इसके बीच सुपारी रखें व चारों कोनों पर चावल की ढेरी। सबसे ऊपर बीचोंबीच ॐ लिखें। छोटी चौकी के सामने तीन थाली व जल भरकर कलश रखें।

थालियों की निम्नानुसार व्यवस्था करें:--

1. ग्यारह दीपक

2. खील, बताशे, मिठाई, वस्त्र, आभूषण, चन्दन का लेप, सिन्दूर, कुंकुम, सुपारी, पान

3. फूल, दुर्वा, चावल, लौंग, इलायची, केसर-कपूर, हल्दी-चूने का लेप, सुगंधित पदार्थ, धूप, अगरबत्ती, एक दीपक।

इन थालियों के सामने यजमान बैठें। परिवार के सदस्य उनके बाईं ओर बैठें। कोई आगंतुक हो तो वह आपके या आपके परिवार के सदस्यों के पीछे बैठे।

पूजा की विधि:--

पवित्रिकरण:--

सबसे पहले पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके खुद का तथा पूजन सामग्री का जल छिड़ककर पवित्रिकरण करें और साथ में मंत्र पढ़ें।

ॐ पवित्रः अपवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपिवा। यः स्मरेत्‌ पुण्डरीकाक्षं स वाह्यभ्यन्तर शुचिः॥ पृथ्विति मंत्रस्य मेरुपृष्ठः गषिः सुतलं छन्दः कूर्मोदेवता आसने विनियोगः॥

आसन शुद्धि मंत्र बोलें:--

ऊं पृथ्वी त्वयाधृता लोका देवि त्यवं विष्णुनाधृता। त्वं च धारयमां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥

ऊँ महालक्ष्म्यै नम: मंत्र जप के साथ महालक्ष्मी के समक्ष आचमनी से जल अर्पित करें।

आचमन:--

ऊं केशवाय नम:,

ऊं माधवाय नम:,

ऊं नारायणाय नम:,

फिर हाथ धोएं, पुन:

उसके बाद निम्न मंत्रों से तीन बार आचमन करें:--

श्री महालक्ष्म्यै नमः ऐं आत्मा तत्वं शोधयामि नमः स्वाहा।

अर्थ:--

श्री महालक्ष्मी को मेरा नमन। मैं आत्मा तत्व को शुद्ध करता हूं।

श्री महालक्ष्म्यै नमः ह्रीं विद्या तत्वं शोधयामि नमः स्वाहा

अर्थ:--

श्री महालक्ष्मी को मेरा नमन। मैं विद्या तत्व को शुद्ध करता हूं।

श्री महालक्ष्म्यै नमः क्लीं षिव तत्वं शोधयामि नमः स्वाहा

अर्थ:--

श्री महालक्ष्मी को मेरा नमन। मैं शिव तत्व को शुद्ध करता हूं।


शुद्धि और आचमन के बाद चंदन लगाना चाहिए।:--

अनामिका उंगली से श्रीखंड चंदन लगाते हुए यह मंत्र बोलें:--

चन्‍दनस्‍य महत्‍पुण्‍यम् पवित्रं पापनाशनम्, आपदां हरते नित्‍यम् लक्ष्‍मी तिष्‍ठतु सर्वदा।

कलावा बांधने:--

येन बद्धो बलिःराजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चलः ॥

न्यास:--

इसका प्रयोजन शरीर के सभी महत्वपूर्ण अंगो में पवित्रता का समावेश तथा अंत:चेतना को जगाना ताकि देव पूजन जैसा श्रेष्ठ कृत्य किया जा सके। बाए हाथ में (हथेली) जल लेकर दाहिने हाथ की पांचो अंगुलियों को उनमे भिगोकर बताए गए स्थान को मंत्रोचार के साथ स्पर्श करें।

ॐ वाड़मेsआस्येsस्तु। (मुख को)

ॐ नसोर्मेप्राणेsस्तु। (नासिका के दोनो छिद्रों को)

ॐ अक्ष्णोर्मेचक्षुरस्तु। (दोनो नेत्रो को)

ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु। (दोनो कानो को)

ॐ बाह्वोर्मे बलमस्तु। (दोनो बाहो को)

ॐ उर्वोर्मेओजोsस्तु। (दोनो जंघाओं को)

ॐ अरिष्टानिमेsड़्गानि, तनूस्तंवा मे सहसन्तु। (समस्त शरीर को)

संकल्प:--

संकल्प में पुष्प, फल, सुपारी, पान, चांदी का सिक्का, नारियल (पानी वाला), मिठाई, मेवा, आदि सभी सामग्री थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लेकर संकल्प करें कि हे महालक्ष्मी मैं आपका पूजन कर रहा हूं।

हे मां लक्ष्मी, मैं समस्त कामनाओं की पूर्ति के लिए श्रीसूक्त लक्ष्मी जी की जो साधना कर रहा हूं, आपकी कृपा के बिना कहां संभव है। हे माता श्री लक्ष्मी, मुझ पर प्रसन्न हों।

कलश पूजन:--

ऊं कलशस्य मुखे विष्णु: कंठे रुद्र: समाश्रित: मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्मृता:।

इसके बाद तिजोरी या रुपए रखने के स्थान पर स्वास्तिक बनाएं और श्लोक पढ़ें:--

मंगलम भगवान विष्णु, मंगलम गरुड़ध्वज: मंगलम् पुंडरीकाक्ष: मंगलायतनो हरि:।

हाथ में अक्षत लेकर बोलें:--

ॐ भूर्भुवः स्वः महालक्ष्मी, इहागच्छ इह तिष्ठ, एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम्।

लक्ष्मी पूजन:--

ॐ या सा पद्मासनस्था, विपुल-कटि-तटी, पद्म-दलायताक्षी। गम्भीरावर्त-नाभिः, स्तन-भर-नमिता, शुभ्र-वस्त्रोत्तरीया।। लक्ष्मी दिव्यैर्गजेन्द्रैः। मणि-गज-खचितैः, स्नापिता हेम-कुम्भैः। नित्यं सा पद्म-हस्ता, मम वसतु गृहे, सर्व-मांगल्य-युक्ता।।

इसके बाद लक्ष्मी देवी की प्रतिष्ठा करें।

गणपति पूजन:--

किसी भी पूजा में सर्वप्रथम गणेश जी की पूजा की जाती है। इसलिए आपको भी सबसे पहले गणेश जी की ही पूजा करनी चाहिए। हाथ में पुष्प लेकर गणपति का ध्यान करें-

गजाननम्भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बू फलचारुभक्षणम्। उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्। आवाहन: ऊं गं गणपतये इहागच्छ इह तिष्ठ।।

तना कहकर पात्र में अक्षत छोड़ें।

पूजन के बाद गणेश जी को प्रसाद अर्पित करें।

नवग्रहों का पूजन:--

हाथ में थोड़ा सा जल ले लीजिए और आह्वान व पूजन मंत्र बोलिए और पूजा सामग्री चढ़ाइए। फिर नवग्रहों का पूजन कीजिए। हाथ में चावल और फूल लेकर नवग्रह का ध्यान करें:--

ओम् ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानु: शशि भूमिसुतो बुधश्च। गुरुश्च शुक्र: शनिराहुकेतव: सर्वे ग्रहा: शान्तिकरा भवन्तु।। नवग्रह देवताभ्यो नम: आहवयामी स्थापयामि नम:।

सूर्य:-- ॐ सूर्याय नम:

चन्द्र:-- ॐ चन्द्राय नम:

मंगल:-- ॐ भौमाय नम:

बुध:-- ॐ बुधाय नम:

गुरू:-- ॐ गुरवे नम:

शुक्र:-- ॐ शुक्राय नम:

शनि:-- ॐ शनिचराय नम

राहु:-- ॐ राहवे नम:

केतु:-- ॐ केतवे नम:

कुबेर का पूजन:--

कुबेर मंत्र को उत्तर की ओर मुख करके ही सिद्ध किया जाता है, अति दुर्लभ कुबेर मंत्र इस प्रकार है-

कुबेर मंत्र:--

ऊं श्रीं, ऊं ह्रीं श्रीं, ऊं ह्रीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय: नम:


प्रतिष्ठा के बाद स्नान कराएं:--

ॐ मन्दाकिन्या समानीतैः, हेमाम्भोरुह-वासितैः स्नानं कुरुष्व देवेशि, सलिलं च सुगन्धिभिः।।

ॐ लक्ष्म्यै नमः।।

इदं रक्त चंदनम् लेपनम् से रक्त चंदन लगाएं।

इदं सिन्दूराभरणं से सिन्दूर लगाएं।

ॐ मन्दार-पारिजाताद्यैः, अनेकैः कुसुमैः शुभैः।

पूजयामि शिवे, भक्तया, कमलायै नमो नमः।।

ॐ लक्ष्म्यै नमः, पुष्पाणि समर्पयामि।

इस मंत्र से पुष्प चढ़ाएं फिर माला पहनाएं। अब लक्ष्मी देवी को इदं रक्त वस्त्र समर्पयामि कहकर लाल वस्त्र पहनाएं। पूजन के बाद लक्ष्मी जी की आरती करना न भूलें। आरती के बाद प्रसाद का भोग लगाएं। इसी वक्त दीप का पूजन करें।


निम्न प्रकार पूजन करे:--

स्नानार्थ जलं समर्पयामि (जल से स्नान कराए)

स्नानान्ते पुनराचमनीयं जल समर्पयामि (जल चढ़ाए)

दुग्ध स्नानं समर्पयामि (दुध से स्नान कराए)

दधि स्नानं समर्पयामि (दही से स्नान कराए)

घृतस्नानं समर्पयामि (घी से स्नान कराए)

मधुस्नानं समर्पयामि (शहद से स्नान कराए)

शर्करा स्नानं समर्पयामि (शक्कर से स्नान कराए)

पंचामृत स्नानं समर्पयामि (पंचामृत से स्नान कराए)

गन्धोदक स्नानं समर्पयामि (चन्दन एवं इत्र से सुवासित जल से स्नान करावे)

शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि (जल से पुन: स्नान कराए)

यज्ञोपवीतं समर्पयामि (यज्ञोपवीत चढ़ाए)

चन्दनं समर्पयामि (चंदन चढ़ाए)

कुकंम समर्पयामि (कुकंम चढ़ाए)

सुन्दूरं समर्पयामि (सिन्दुर चढ़ाए)

बिल्वपत्रै समर्पयामि (विल्व पत्र चढ़ाए)

पुष्पमाला समर्पयामि (पुष्पमाला चढ़ाए)

धूपमाघ्रापयामि (धूप दिखाए)

दीपं दर्शयामि (दीपक दिखाए व हाथ धो लें)

नैवेध निवेद्यामि (नेवैध चढ़ाए(निवेदित) करे)

ऋतु फलानि समर्पयामि (फल जो इस ऋतु में उपलब्ध हो चढ़ाए)

ताम्बूलं समर्पयामि (लौंग, इलायची एवं सुपारी युक्त पान चढ़ाए)

दक्षिणा समर्पयामि (दक्षिणा चढ़ाए)

इसके बाद कर्पूर अथवा रूई की बाती जलाकर आरती करे।


षोडशमातृका पूजन:--

इसके बाद भगवती षोडश मातृकाओं का पूजन किया जाता है। हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प ले लीजिए। सोलह माताओं को नमस्कार कर लीजिए और पूजा सामग्री चढ़ा दीजिए। सोलह माताओं की पूजा के बाद मौली लेकर भगवान गणपति पर चढ़ाइए और फिर अपने हाथ में बंधवा लीजिए और तिलक लगा लीजिए। अब महालक्ष्मी की पूजा प्रारंभ कीजिए। गणेशजी, लक्ष्मीजी व अन्य देवी-देवताओं का विधिवत षोडशोपचार पूजन, श्री सूक्त, लक्ष्मी सूक्त व पुरुष सूक्त का पाठ करें और आरती उतारें।
पूजा के उपरांत मिठाइयां, पकवान, खीर आदि का भोग लगाकर सबको प्रसाद बांटें।

दीपक पूजन:--

दीपक ज्ञान के प्रकाश का प्रतीक है। हृदय में भरे हुए अज्ञान और संसार में फैले हुए अंधकार का शमन करने वाला दीपक देवताओं की ज्योर्तिमय शक्ति का प्रतिनिधि है। इसे भगवान का तेजस्वी रूप मान कर पूजा जाना चाहिए। भावना करें कि सबके अंत:करण में सद्ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न हो रहा है। बीच में एक बड़ा घृत दीपक और उसके चारों ओर ग्यारह, इक्कीस, अथवा इससे भी अधिक दीपक, अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार तिल के तेल से प्रज्ज्वलित करके एक परात में रख कर आगे लिखे मंत्र से ध्यान करें। दीप पूजन करने के बाद पहले मंदिर में दीपदान करें और फिर घर में दीए सजाएं। दीवाली की रात लक्ष्मी जी के सामने घी का दीया पूरी रात जलना चाहिए।

मां वैभव लक्ष्मी की आरती

ऊँ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता.

तुमको निशदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥ ऊँ जय लक्ष्मी माता

उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता.

सूर्य चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥ ऊँ जय लक्ष्मी माता

दुर्गा रुप निरंजनि, सुख-सम्पत्ति दाता.

जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्घि-सिद्घि धन पाता॥ ऊँ जय लक्ष्मी माता

तुम पाताल निवासिनी, तुम ही शुभदाता.

कर्म प्रभाव प्रकाशिनि, भवनिधि की त्राता॥ ऊँ जय लक्ष्मी माता

जिस घर में तुम रहती, सब सद्गुण आता.

सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥ ऊँ जय लक्ष्मी माता

तुम बिन यज्ञ न होवे, वस्त्र न कोई पाता.

खान पान का वैभव, सब तुमसे आता॥ ऊँ जय लक्ष्मी माता

शुभ-गुण मंदिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता.

रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥ ऊँ जय लक्ष्मी माता

श्री महालक्ष्मीजी की आरती, जो कोई नर गाता.

उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता ॥ ऊँ जय लक्ष्मी माता

प्रदक्षिणा:--

यानि कानि च पापानी जन्मान्तर कृतानि च। तानी सर्वानि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे॥ प्रदक्षिणा समर्पयामि। प्रदक्षिणा करें (अगर स्थान न हो तो आसन पर खड़े-खड़े ही स्थान पर घूमे)

क्षमा प्रार्थना:--

पुष्प सर्मपित कर देवी को निम्न मंत्र से प्रणाम करे।

नमो दैव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम:। नम: प्रकृतयै भद्रायै नियता: प्रणता: स्मताम॥ या देवी सर्व भूतेषु मातृरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

ततपश्चात देवी से क्षमा प्रार्थना करे कि जाने अनजाने में कोई गलती या न्यूनता-अधिकता यदि पूजा में हो गई हो तो वे क्षमा करें।






नरक चतुर्दशी (रूप चौदस) की कथा

दीपावली पर्व के ठीक एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी को छोटी दीवाली, रूप चौदस और काली चतुर्दशी भी कहा जाता है। मान्यता है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के विधि-विधान से पूजा करने वाले व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है।   इसी दिन शाम को दीपदान की प्रथा है जिसे यमराज के लिए किया जाता है। इस पर्व का जो महत्व है उस दृष्टि से भी यह काफी महत्वपूर्ण त्योहार है। यह पांच पर्वों की श्रृंखला के मध्य में रहने वाला त्योहार है।  दीपावली से दो दिन पहले धनतेरस फिर नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली। इसे छोटी दीपावली इसलिए कहा जाता है क्योंकि दीपावली से एक दिन पहले रात के वक्त उसी प्रकार दीये की रोशनी से रात के तिमिर को प्रकाश पुंज से दूर भगा दिया जाता है जैसे दीपावली की रात को।  क्या है इसकी कथा- इस रात दीये जलाने की प्रथा के संदर्भ में कई पौराणिक कथाएं और लोकमान्यताएं हैं।  एक कथा के अनुसार आज के दिन ही भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी और दुराचारी दु्र्दांत असुर नरकासुर का वध किया था और सोलह हजार एक सौ कन्याओं को नरकासुर के बंदी गृह से मुक्त कर उन्हें सम्मान प्रदान किया था। इस उपलक्ष्य में दीयों की बारात सजाई जाती है।  इस दिन के व्रत और पूजा के संदर्भ में एक दूसरी कथा यह है कि रंति देव नामक एक पुण्यात्मा और धर्मात्मा राजा थे। उन्होंने अनजाने में भी कोई पाप नहीं किया था लेकिन जब मृत्यु का समय आया तो उनके समक्ष यमदूत आ खड़े हुए।  यमदूत को सामने देख राजा अचंभित हुए और बोले मैंने तो कभी कोई पाप कर्म नहीं किया फिर आप लोग मुझे लेने क्यों आए हो क्योंकि आपके यहां आने का मतलब है कि मुझे नर्क जाना होगा। आप मुझ पर कृपा करें और बताएं कि मेरे किस अपराध के कारण मुझे नरक जाना पड़ रहा है। यह सुनकर यमदूत ने कहा कि हे राजन् एक बार आपके द्वार से एक बार एक ब्राह्मण भूखा लौट गया था,यह उसी पापकर्म का फल है। इसके बाद राजा ने यमदूत से एक वर्ष समय मांगा। तब यमदूतों ने राजा को एक वर्ष की मोहलत दे दी। राजा अपनी परेशानी लेकर ऋषियों के पास पहुंचे और उन्हें अपनी सारी कहानी सुनाकर उनसे इस पाप से मुक्ति का क्या उपाय पूछा।  तब ऋषि ने उन्हें बताया कि कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करें और ब्राह्मणों को भोजन करवा कर उनके प्रति हुए अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करें। राजा ने वैसा ही किया जैसा ऋषियों ने उन्हें बताया।  इस प्रकार राजा पाप मुक्त हुए और उन्हें विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ। उस दिन से पाप और नर्क से मुक्ति हेतु भूलोक में कार्तिक चतुर्दशी के दिन का व्रत प्रचलित है।
Posted at 30 Oct 2018 by admin
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