read full Shreemad Bhaagwat Mahaapuran kathaa with mahatmya in hindi meaning, created by mahaamuni vyaasdevji
 
श्रीमद्भावत्महापुराण, महामुनि श्रीव्यासदेवजी द्वारा रचित महाग्रंथ है, जिसके बारे मै कहा गया है कि "मन की शुद्धि के लिये इससे बढकर कोई साधन नहीं है, जब मनुष्य के जन्म-जन्मान्तर के पुन्यों का उदय होता है, तभी उसे इस भागवतशास्त्र की प्राप्ती होती है।" श्रीमद्भागवत की कथा तो देवताओं के लिये भी दुर्लभ है।
जब शुकदेवजी राजा परीक्षित को यह कथा सुनाने के लीये सभा मे विराजमान हुए तब देवता लोग उनके पास अमृत का कलश लेकर आये।
सबने शुकदेवमुनि को नमस्कार करके कहा, 'आप यह अमृत लेकर बदले में हमें कथामृत का दान दीजीये। इस प्रकार परस्पर विनिमय (अदला-बदली) हो जाने पर राजा परीक्षित अमृत का पान करें और हम सब श्रीमद्भागवत रुपी अमृत का पान करेंगें।
इस संसार मे कहाँ काँच और कहाँ महामुल्य मणि तथा कहाँ सुधा और कहाँ कथा? श्री शुकदेवजी ने (यह सोच कर) उस समय देवताओं की हँसी उडा दी। उन्हें भक्तिशुन्य (कथा का अनधिकारी) जानकर कथामृत का दान नहीं किया। इस प्रकार यह श्रीमद्भागवत की कथा देवताओं को भी दुर्लभ है।भागवत महात्म्य
कलियुग मे भागवतशास्त्र ही पढने-सुनने से तत्काल मोक्ष देने वाला महापुराण है। जिस प्रकार कोई प्यासा कुएँ के पास आकर भी प्यासा रह जाता है, भक्तिशुन्य होने पर श्रीमद्भागवत कि प्राप्ति नहीं हो पाती।
भगवान हमेशा प्राणीयों पर दया दृष्टि रखते है, जिसका जैसा आचरण होता है उसे उसी दिशा के द्वारा मुक्ति तक लेजाते है, पापी प्रवृत्ती वालों को पाप द्वार, भक्तिभाव वाली प्रवृत्ती वालों को भक्ति द्वारा। सभी को अंततः मोक्ष के द्वार तक लेजाना ही भगवान का उद्देश्य होता है। परन्तु पापी प्रवृत्ती वाले प्राणीयों को बार-बार जन्म लेकर तब तक पाप करने होते है; जब तक उनके पाप का घडा पुरा ना भर जाऐ। और भक्तिभाव वाली प्रवृत्ती वालों को केवल भक्तिमार्ग पर ही चलना होता है। अतः पाठ्कों से निवेदन है, कि ईस श्रीमद्भावत्महापुराण का पुर्णतः भक्तिभाव से पठन करे।
अष्टादश पुराणों में भागवत नितांत महत्वपूर्ण तथा प्रख्यात पुराण है। पुराणों की गणना में भागवत अष्टम पुराण के रूप में परिगृहीत किया जाता है। भागवत पुराण में महर्षि सूत जी उनके समक्ष प्रस्तुत साधुओं को एक कथा सुनाते हैं। साधु लोग उनसे विष्णु के विभिन्न अवतारों के बारे में प्रश्न पूछते हैं। सूत जी कहते हैं कि यह कथा उन्होने एक दूसरे ऋषि शुकदेव से सुनी थी। इसमें कुल बारह स्कन्ध हैं।
प्रथम स्कन्ध - इसमें भक्तियोग और उससे उत्पन्न एवं उसे स्थिर रखने वाला वैराग्य का वर्णन किया गया है।
द्वितीय स्कन्ध - ब्रह्माण्ड की उत्त्पत्ति एवं उसमें विराट् पुरुष की स्थिति का स्वरूप।
तृतीय स्कन्ध - उद्धव द्वारा भगवान् का बाल चरित्र का वर्णन।
चतुर्थ स्कन्ध - राजर्षि ध्रुव एवं पृथु आदि का चरित्र।
पंचम स्कन्ध - समुद्र, पर्वत, नदी, पाताल, नरक आदि की स्थिति।
षष्ठ स्कन्ध - देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि के जन्म की कथा।
सप्तम स्कन्ध - हिरण्यकश्यिपु, हिरण्याक्ष के साथ प्रहलाद का चरित्र।
अष्टम स्कन्ध - गजेन्द्र मोक्ष, मन्वन्तर कथा, वामन अवतार
नवम स्कन्ध - राजवंशों का विवरण। श्रीराम की कथा।
दशम स्कन्ध - भगवान् श्रीकृष्ण की अनन्त लीलाएं।
एकादश स्कन्ध - यदु वंश का संहार।
द्वादश स्कन्ध - विभिन्न युगों तथा प्रलयों और भगवान् के उपांगों आदि का स्वरूप।

श्रीमद्भागवत भक्तिरस तथा अध्यात्मज्ञान का समन्वय उपस्थित करता है। भागवत निगमकल्पतरु का स्वयंफल माना जाता है जिसे नैष्ठिक ब्रह्मचारी तथा ब्रह्मज्ञानी महर्षि शुक ने अपनी मधुर वाणी से संयुक्त कर अमृतमय बना डाला है। स्वयं भागवत में कहा गया है-

सर्ववेदान्तसारं हि श्रीभागवतमिष्यते।
तद्रसामृततृप्तस्य नान्यत्र स्याद्रतिः क्वचित् ॥
श्रीमद्भाग्वतम् सर्व वेदान्त का सार है। उस रसामृत के पान से जो तृप्त हो गया है, उसे किसी अन्य जगह पर कोई रति नहीं हो सकती। (अर्थात उसे किसी अन्य वस्तु में आनन्द नहीं आ सकता।)
॥ जय सियाराम ॥

श्रीमद्भावत्महात्म्यश्रीमद्भावत्महापुराण
 
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