read full Shreemad Bhaagwat Mahaapuran kathaa Skandh-1 with mahatmya in hindi meaning, created by mahaamuni vyaasdevji
 
।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ।।

श्रीमद्भागवतमाहापुराण: प्रथम स्कंध: चौदहवाँ अध्याय

अपशकुन देखकर महाराज युधिष्ठिर का शंका करना और अर्जुन का द्वारका से लौटना : पृष्ठ 2

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ऊर्वक्षिबाहवो मह्यं स्फुरन्त्यग्ड़ पुनः पुनः।
वेपथुश्चापि हृदये आराद्दास्यन्ति विप्रियम्।।11।।

प्यारे भीमसेन! मेरी बायीं जाँघ, आँख और भुजा बार-बार फड़क रही हैं। हृदय जोरो से धड़क रहा है। अवश्य ही बहुत जल्दी कोई अनिष्ट होने वाला है॥11॥

शिवैषोद्यन्तमादित्यमभिरौत्यनलानना।
मामग्ड़ सारमेयोऽयमभिरेभत्यभीरुवत्।।12।।

देखो, यह सियारिन उदय होते हुए सुर्य कि ओर मुँह करके रो रही है। अरे! उसके मुँह से तो आग भी निकल रही है! यह कुत्ता बिल्कुल निर्भय-सा होकर मेरी ओर देखकर चिल्ला रहा है॥12॥

शस्ताः कुर्वन्ति मां सव्यं दक्षिणं पशवोऽपरे।
वाहांश्च पुरुषव्याघ्र लक्षये रुदतो मम।।13।।

भीमसेन! गौ आदि अच्छे पशु मुझे अपने बाये करके जाते है गधे आदि बुरे पशु मुझे अपने दाहिने कर देते है॥13॥

मृत्युदूतः कपोतोऽयमुलूकः कम्पयम्ननः।
प्रत्युलूकश्च कुह्वानैर्विश्वं वै शून्यमिच्छतः।।14।।

यह मृत्युदुत पेडुखी, उल्लु और उसका प्रतिपक्षी कौआ रात को अपने कर्ण-कठोर शब्दों से मेरे मन को कँपाते हुए विश्व को सूना कर देना चाहते है॥14॥

धूम्रा दिशः परिधयः कम्पते भूः सहाद्रिभिः।
निर्घातश्च महांस्तात साकं च स्तनयित्नुभिः।।15।।

दिशाएँ धुँधली हो गयी है, सुर्य और चँद्रमा के चारो ओर बार-बार मण्डल बैठते है। यह पृथ्वी पहाड़ों के साथ काँप उठती है, बादल बड़े जोर-जोर से गरजते है और जहाँ-तहाँ बिजली भी गिरती रहती है॥15॥

वायुर्वाती खरस्पर्शो रजसा विसृजंस्तमः।
असृग्वर्षन्ति जलदा बीभत्समिव सर्वतः।।16।।

शरीर को छेदने वाली एवं धूलि-वर्षा से अंधकार फैलाने वाली आँधी चलने लगी है। बादल बड़ा ड़रावना दृश्य उपस्थित करके सब ओर खुन बरसाते है॥16॥

सूर्यं हतप्रभं पश्य ग्रहमदर्मं मिथो दिवि।
ससग्कुलैर्भूतगणैर्ज्वलिते इव रोदसी।।17।।

देखो सुर्य कि प्रभा मन्द पड़ गयी है। आकाश मे ग्रह परस्पर टकराया करते है। भूतों की घनी भीड़ मे पृथ्वी और अंतरिक्ष मे आग-सी लगी हुई है॥17॥

नद्यो नदाश्च क्षुभिताः सरांसि च मनांसि च।
न ज्वलत्यग्निराज्येन कालोऽयं किं विधास्यती।।18।।

नदी, नद, तालाब और लोगों के मन क्षुब्ध हो रहे है। घी से आग नहीं जलती। यह भयंकर काल न जाने क्या करेगा॥18॥

न पिबन्ति स्तनं वत्सा न दुह्यन्ति च मातरः।
रुदन्त्यश्रुमुखा गावो न हृष्यन्त्यृषभा व्रजे।।19।।

बछड़े दुध नहीं पिते, गौएँ दुहने नही देती, गोशाला मे गौएँ आँसु बहा-बहाकर रो रही है। बैल भी उदास हो रहे है॥19॥

दैवतानि रुदन्तीव स्विद्यन्ति ह्युच्चलन्ति च।
इमेजनपदा ग्रामाः पुरोद्यानाकराश्रमाः।
भ्रटश्रियो निरानन्दाः किमघं दर्शयन्ति नः।।20।।

देवताओं की मुर्तिया रो-सी रही है, उनमे से पसीना चुने लगता है और वे हिलती-डोलती भी है। भाई! ये देश, गाँव, शहर, बगीचे, खानें और आश्रम श्रीहीन और आनन्दरहीत हो गये है। पता नहीं ये हमारे किस दुःख की सूचना दे रहे है॥20॥

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