read full Shreemad Bhaagwat Mahaapuran kathaa Skandh-1 with mahatmya in hindi meaning, created by mahaamuni vyaasdevji
 
।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ।।

श्रीमद्भागवतमाहापुराण: प्रथम स्कंध: चौदहवाँ अध्याय

अपशकुन देखकर महाराज युधिष्ठिर का शंका करना और अर्जुन का द्वारका से लौटना : पृष्ठ 3

[Share it]

मन्य एतैर्महोत्पातैर्नूनं भगवतः पदैः।
अनन्यपुरुषश्रीभिर्हीना भूर्हतसौभगा।।21।।

इन बड़े-बड़े उत्पातों को देखकर मै तो ऐसा समझता हुँ कि निश्चय ही यह भाग्यहिना भुमि भगवान के उन चरणकमलों से (जिनका सौन्दर्य तथा जिनके ध्वजा, वज्र अंकुशादि विलक्षण चिह्न और किसी मे भी कहीं भी नहीं है।) रहित हो गयी है॥21॥

इती चिन्तयतस्तस्य दृष्टारिटेन चेतसा।
राज्ञः प्रत्यागमद्ब्रह्मन्यदुपुर्याः कपिध्वजः।।22।।

शौनकजी! राजा युधिष्ठिर इन भयंकर उत्पातों को देखकर मन-ही-मन चिन्तित हो रहे थे कि द्वारका से लौटकर अर्जुन आये॥22॥

तं पादयोर्निपतीतमयथापूर्वमातूरम्।
अधोवदनमब्बिन्दून्सृजन्तं नयनाब्जयोः।।23।।
विलोक्योद्विग्नहृदयो विच्छायमनुजं नृपः।
पृच्छती स्म सुहृम्नध्ये संस्मरन्नारदेरितम्।।24।।

युधिष्ठिर ने देखा, अर्जुन इतने आतुर हो रहे है जितने पहले कभी नही देखे गये थे। मुँह लटका हुआ है, कमल सरीखे नेत्रों मे आँसु बह रहे है और शरिर मे बिल्कुल काँति नहीं है। उनको इस रुप मे अपने चरणों पर पड़ा देखकर युधिष्ठिर घबरा गये। देवर्षि नारद कि बाते याद करके सुहृदो के सामने ही अर्जुन से पुछा॥23-24॥

युधिष्ठिर उवाच
कच्चिदानर्तपुर्यां नः स्वजनाः सुखमासते।
मधुभोजदशार्हार्ह सात्वतान्धकवृष्णयः।।25।।

युधिष्ठिर ने कहा — 'भाई द्वारकापुरी मे हमारे स्वजन सम्बन्धी मधु, भोज, दशार्ह, आर्ह, सात्वत, अन्धक और वृष्णवंशी यादव कुशल से तो है?॥25॥

शूरो मातामहः कच्चित्स्वस्त्यास्ते वाथ मारिषः।
मातूलः सानुजः कच्चित्कुशल्यानकदुन्दुभिः।।26।।

हमारे माननिय शुरसेनजी प्रसन्न है? अपने छोटे भाई सहित मामा वसुदेवजी तो कुशल-पुर्वक है?॥26॥

सप्त स्वसारस्तत्पत्न्यो मातूलान्यः सहात्मजाः।
आसते सस्रुषाः क्षेमंदेवकीप्रमुखाः स्वयम्।।27।।

उनकी पत्नियाँ हमारी मामी देवकी आदि सातों बहिने अपने पुत्रों और बहुओं के साथ आनन्द से तो है?॥27॥

कच्चिद्राजाहुको जीवत्यसत्पुत्रोऽस्य चानुजः।
हृदीकः ससुतोऽक्रूरो जयन्तगदसारणाः।।28।।
आसते कुशलं कच्चिद्ये च शत्रुजिदादयः।
कच्चिदास्ते सुखं रामो भगवान्सात्वतां प्रभुः।।29।।

जिनका पुत्र कंस बड़ा ही दुष्ट था, वे राजा उग्रसेन अपने छोटे भाई देवर के साथ जीवित तो है न? हृदीक, उनके पुत्र कृतवर्मा, अक्रुर, जयन्त, गद, सारण तथा शत्रुजित आदि यादव वीर सकुशल है न? यादवों के प्रभु बलरामजी तो आनन्द से है?॥28-29॥

प्रद्युम्नः सर्ववृष्णीनां सुखमास्ते महारथः।
गम्भीररयोऽनिरुद्धो वर्धते भगवानुत।।30।।

वृष्णवंश के सर्वश्रेष्ठ महारथी प्रद्युम्न सुख से तो है? युद्ध में बड़ी फुर्ती दिखलाने वाले भगवान अनिरुद्ध आनन्द से है न?॥30॥

FACEBOOK COMMENTES
  Share it --

Shri Bhagwatji (Page 3 of 5)
[First][1]  [2] [3] [4] [5][Last]