read full Shreemad Bhaagwat Mahaapuran kathaa Skandh-1 with mahatmya in hindi meaning, created by mahaamuni vyaasdevji
 
।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ।।

श्रीमद्भागवतमाहापुराण: प्रथम स्कंध: पँद्रहवाँ अध्याय

कृष्ण विरह व्यथित पाण्डवों का परीक्षित् को राज्य देकर स्वर्ग सिधारना : पृष्ठ 1


सूत उवाच
एवंकृष्णसखः कृष्णोभ्रात्रा राज्ञा विकल्पितः।
नानाशड़्कास्पदं रुपंकृष्णविश्लेषकर्शितः॥1॥

सुतजी कहते है — भगवान श्रीकृष्ण के प्यारे सखा अर्जुन एक तो पहले ही श्रीकृष्ण के विरह से कृश हो रहे थे, उस पर राजा युधिष्ठिर ने उनकी विषादग्रस्त मुद्रा देखकर उसके विषय मे कई प्रकार की आशंकाएँ करते हुए प्रश्नों की झड़ी लगा दी॥1॥

शोकेन शुष्यद्वदन हृत्सरोजो हतप्रभः।
विभुं तमेवानुस्मरन्नाशन्कोत्प्रतीभाषितूम्॥2॥

शोक से अर्जुन का मुख और हृदय-कमल सूख गया था, चेहरा फिका पड़ गया था। वे उन्हीं भगवान श्रीकृष्ण के ध्यान मे ऐसे डुब रहे थे कि बड़े भाई के प्रश्नों का कुछ भी उत्तर न दे सके॥2॥

कृच्छ्रेण संस्तभ्य शुचः पाणिनामृज्य नेत्रयोः।
परोक्षेण समुन्नद्ध प्रणयौत्कण्ठकातरः॥3॥
सख्यं मैत्रीं सौहृदं च सारथ्यादिषु संस्मरन्।
नृपमग्रजमित्याह बाष्पगद्नदया गिरा॥4॥

भगवान श्रीकृष्ण के आँखो से ओझल हो जाने के कारण वे बढी हुई प्रेम जनित उत्कण्ठा के परवश हो रहे थे। रथ हाँकने, टहलने आदि के समय भगवान ने उनके साथ जो मित्रता, अभिन्नहृदयता और प्रेम भरे हुए व्यवहार हुआ करते थे, उनकी याद-पर-याद आ रही थी; बड़े कष्ट से उन्होने अपने शोक का वेग रोका, हाथ से नेत्रों के आँसु पोंछे और फिर रुँधे हुए गले से अपने बड़े भाई महाराज युधिष्ठिर से कहा॥3-4॥

अर्जुन उवाच
वञ्चितोऽहं महाराज हरिणा बन्धुरुपिणा।
येन मेऽपहृतं तेजो देवविस्मापनं महत्॥5॥

अर्जुन बोले — महाराज! मेरे ममेरे भाई अथवा अत्यन्त घनिष्ठ मित्र का रुप धारण कर श्रीकृष्ण ने मुझे ठग लिया। मेरे जिस प्रबल पराक्रम से बड़े-बड़े देवता भी आश्चर्य मे डुब जाते थे, उसे श्रीकृष्ण ने मुझसे छीन लिया॥5॥

यस्य क्षणवियोगेन लोको ह्यप्रियदर्शनः।
उक्थेन रहितो ह्येष मृतकः प्रोच्यते यथा॥6॥

जैसे यह शरीर प्राण से रहित होने पर मृतक कहलाता है, वैसे ही उनके क्षण-भर के वियोग से यह संसार अप्रिय दिखने लगता है॥6॥

यत्संश्रयाद्रुपदगेहमुपागतानां राज्ञां स्वयंवरमुखे स्मरदुर्मदानाम्।
तेजो हृतं खलु मयाभिहतश्च मत्स्यः सञ्जीकृतेन धनुषाधिगता च कृष्णा॥7॥

उनके आश्रय से द्रोपदी-स्वयंवर मे राजा द्रुपद के घर आये हुए कामोन्मत राजाओं का तेज मैने हरण कर लिया, धनुष पर चढाकर मत्स्य-वेधन किया और इस प्रकार द्रोपदी को प्राप्त किया था॥7॥

यत्सन्निधावहमु खाण्डवमग्नयेऽदामिन्द्रं च सामरगणं तरसा विजित्य।
लब्धा सभा मयकृताद्भुतशिल्पमाया दिग्भ्योऽहरन्नृपतयो बलिमध्वरे ते॥8॥

उनकी सन्निधि मात्र से मैने समस्त देवताओं के साथ इन्द्र को अपने बल से जीतकर अग्निदेव को उनकी तृप्ति के लिये खाण्डव वन दान कर दिया और मयदानव की निर्माण की हुई, आलौकिक कलाकौशल से युक्त महामयी सभा प्राप्त की और आपके यज्ञ मे सब ओर से आ-आकर राजाओं ने अनेकों प्रकार की भेंटे समर्पित की॥8॥

यत्तेजसा नृपशिरोऽघ्र्ड़िमहम्नखार्थमार्योऽनुजस्तव गजायुतसत्त्ववीर्यः।
तेनाहृताः प्रमथनाथमखाय भूपा यम्नोचितास्तदनयन्बलिमध्वरे ते॥9॥

दस हजार हाथियों की शक्ति ओर बल से सम्पन्न आपके इन छोटे भाई भीमसेन ने भी उन्हीं कि कृपा से राजाओं के सिर पर पैर रखने वाले अभिमानी जरासन्ध का वध किया था; तदन्तर उन्हीं भगवान ने उन बहुत से राजाओं को मुक्त किया, जिनको जरासन्ध ने महाभैरव-यज्ञ मे बलि चढाने के लिये बंदी बना रखा था। उन सब सब राजाओं ने आपके यज्ञ मे अनेको प्रकार के उपहार दिये थे॥9॥

पत्न्यास्तवाधिमखॡकप्तमहाभिषेक श्लाघिष्ठचारुकबरं कितवैः सभायाम्।
स्पृटं विकीर्य पदयोः पतीताश्रुमुख्या यस्तत्स्त्रियोऽकृतहतेशविमुदृकेशाः॥10॥

महारानी द्रोपदी राजसुय-यज्ञ के महान अभिषेक से पवित्र हुए अपने उन सुन्दर केशों को, जिन्हे दुष्टों ने भरी सभा मे छुने का साहस किया था, बिखेर कर तथा आँखो मे आँसु भरकर जब श्रीकृष्ण के चरणों मे गिर पड़ी, तब उन्होने उसके सामने उसके उस घोर अपमान का बदला लेने की प्रतिज्ञा करके उन धुर्तों की स्त्रियों ऐसी दशा कर दी कि वे विधवा हो गयी और उन्हे अपने केश अपने हाथों से खोल देने पड़े॥10॥

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