read full Shreemad Bhaagwat Mahaapuran kathaa Skandh-1 with mahatmya in hindi meaning, created by mahaamuni vyaasdevji
 
।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ।।

श्रीमद्भागवतमाहापुराण: प्रथम स्कंध: उन्नीसवाँ अध्याय

राजा परीक्षित् का अनशनव्रत और शुकदेवजी का आगमन : पृष्ठ 1


सूत उवाच महीपतीस्त्वथ तत्कर्म गर्ह्यं विचिन्तयन्नात्मकृतं सुदुर्मनाः।
अहो मया नीचमनार्यवत्कृतं निरागसि ब्रह्मणि गूढतेजसि॥1॥

सूतजी कहते है — राजधानी मे पहुँचने पर राजा परीक्षित् को अपने उस निन्दनीय कर्म के लिये बड़ा पश्चाताप हुआ। वे अत्यन्त उदास हो गये और सोचने लगे -'मैने निरपराध एवं अपना तेज छिपाये हुए ब्राह्मण के साथ अनार्य पुरुषों के समान बड़ा नीच व्यवहार किया। यह बड़े खेद की बात है॥1॥

घ्रुवं ततो मे कृतदेवहेलनाद्दुरत्ययं व्यसनं नातीदीर्घात्।
तदस्तू कामं ह्यघनिष्कृताय मे यथा न कुर्यां पुनरेवमद्धा॥2॥

अवश्य ही उन महात्मा के अपमान के फलस्वरुप शीघ्र से शीघ्र मुझ पर कोई घोर विपत्ति आवेगी। मै भी ऐसा ही चाहता हुँ; क्योंकि उससे मेरे पाप का प्रायश्चित हो जायेगा और फिर कभी मै ऐसा काम करने का दुःसाहस नहीं करुँगा॥2॥

अद्यैव राज्यं बलमृद्धकोशं प्रकोपितब्रह्मकुलानलो मे।
दहत्वभद्रस्य पुनर्न मेऽभूत्पापीयसी धीर्द्विजदेवगोभ्यः॥3॥

ब्राह्मणों की क्रोधाग्नि आज ही मेरे राज्य, सेना और भरे-पुरे खजाने को खाक कर दे-जिससे फिर कभी मुझ दुष्ट की ब्राह्मण, देवता और गौओं के प्रति ऐसी पापबुद्धि न हो॥3॥

स चिन्तयन्नित्थमथाश्रृणोद्यथा मुनेः सुतोक्तो निर्ॠतीस्तक्षकाख्यः।
स साधु मेने न चिरेण तक्षका नलं प्रसक्तस्य विरक्तिकारणम्॥4॥

वे इस प्रकार चिन्ता कर ही रहे थे की उन्हे मालुम हुआ की ॠषिकुमार के शाप से तक्षक मुझे डसेगा। उन्हे वह धधकती हुई आग के समान तक्षक का डसना बहुत भला मालुम हुआ। उन्होने सोचा कि बहुत दिनों से मैं संसार मे आसक्त हो रहा था, अब मुझे शीघ्र वैराग्य होने का कारण प्राप्त हो गया॥4॥

अथो विहायेमममुं च लोकं विमर्शितौ हेयतया पुरस्तात्।
कृष्णाघ्र्ङिसेवामधिमन्यमान उपाविशत्प्रायममत्​र्यनद्याम्॥5॥

वे इस लोक और परलोक के भोगो को तो पहले ही तुच्छ और त्याज्य समझते थे। अब उनका स्वरुपतः त्याग करके भगवान श्रीकृष्ण के चरण-कमलों की सेवा ही सर्वोपरी मानकर आमरण अनशनव्रत लेकर वे गग्ड़ातट पर बैठ गये॥5॥

या वै लसच्छ्रीतूलसीविमिश्र कृष्णाघ्र्ङिरेण्वभ्यधिकाम्बुनेत्री।
पुनाती लोकानुभयत्र सेशान्कस्तां न सेवेत मरिष्यमाणः॥6॥

गग्ड़ाजी का जल भगवान श्रीकृष्ण के चरण-कमलों का वह पराग लेकर प्रवाहित होता है, जो श्रीमती तुलसी की गन्ध से मिश्रित है। यही कारण है कि वे लोकपालो के सहित ऊपर-नीचे के समस्त लोको को पवित्र करती है। कौन ऐसा मरणासन्न पुरुष होगा, जो उनका सेवन न करेगा?॥6॥

इती व्यवच्छिद्य स पाण्डवेयः प्रायोपवेशं प्रती विष्णुपद्याम्।
दधौ मुकुन्दाघ्र्ङिमनन्यभावो मुनिव्रतो मुक्तसमस्तसग्ड़ः॥7॥

इस प्रकार गग्ड़ाजी के तट पर आमरण अनशन का निश्चय करके उन्होने समस्त आसक्तियों का परित्याग कर दिया और वे मुनियों का व्रत स्विकार करके अनन्यभाव से श्रीकृष्ण के चरण-कमलों का ध्यान करने लगे॥7॥

तत्रोपजग्मुर्भुवनं पुनाना महानुभावा मुनयः सशिष्याः।
प्रायेण तीर्थाभिगमापदेशैः स्वयं हि तीर्थानि पुनन्ति सन्तः॥8॥

उस समय त्रिलोकी को पवित्र करने वाले बड़े-बड़े महानुभाव ॠषि-मुनि अपने शिष्यों के साथ वहाँ पधारे। संतजन प्रायः तिर्थयात्रा के बहाने स्वयं उन तीर्थस्थानों को ही पवित्र करते है॥8॥

अत्रिर्वसिष्ठश्च्यवनः शरद्वानरिष्टनेमिर्भृगुरग्ड़िराश्च।
पराशरो गाधिसुतोऽथ राम उतथ्य इन्द्रप्रमदेध्मवाहौ॥9॥
मेधातीथिर्देवल आर्ष्टिषेणो भारद्वाजो गौतमः पिप्पलादः।
मैत्रेय और्वः कवषः कुम्भयोनिर्द्वैपायनो भगवान्नारदश्च॥10॥
अन्ये च देवर्षिब्रह्मर्षिवर्या राजर्षिवर्या अरुणादयश्च।
नानार्षेयप्रवरान्समेतानभ्यर्च्य राजा शिरसा ववन्दे॥11॥

उस समय वहाँ पर अत्रि, वसिष्ठ, च्यवन, शरद्वान, अरिष्टनेमि, भृगु, अग्ङिरा, पराशर, विश्वामित्र, परशुराम, उतथ्य, इन्द्रप्रमद, मेघातिथि, देवल, आर्ष्टिषेण, भारद्वाज, गौतम, पिप्पलाद, मैत्रेय, और्व, कवष, अगस्त्य, भगवान व्यास, नारद तथा अरुणादि राजर्षिवर्यों का शुभागमन हुआ। इस प्रकार विभिन्न गोत्रों के मुख्य-मुख्य ॠषियों को एकत्र देखकर राजा ने सबका यथायोग्य सत्कार किया और उनके चरणों पर सिर रखकर वन्दना की॥9-11॥

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