read full Shreemad Bhaagwat Mahaapuran kathaa Skandh-1 with mahatmya in hindi meaning, created by mahaamuni vyaasdevji
 
।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ।।

श्रीमद्भागवतमाहापुराण: प्रथम स्कंध: दुसरा अध्याय

भगवत्कथा और भगवद्भक्ति का महात्म्य : पृष्ठ 1

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व्यास उवाच
इति सम्प्रश्नसंहृष्टो विप्राणां रौमहशर्णिः।
प्रतिपूज्य वचस्तेशां प्रवक्तुमुपचत्क्रमे॥1॥

व्यासजी कहते हैं— शौनकादि ब्रह्मवादी ॠषियों के ये प्रश्न सुनकर रोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा को बड़ा ही आनन्द हुआ। उन्होने ॠषियों के इस मंगलमय प्रश्न का अभीनन्दन करके कहना आरम्भ किया॥1॥

सूत उवाच
यंप्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव।
पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदुस्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि॥2॥

सुतजी ने कहा— जिस समय श्री शुकदेवजी का यज्ञोपवित-संस्कार भी नहीं हुआ था, सुतरां लौकिक-वैदिक कर्मों के अनुष्ठान का अवसर भी नहीं आया था, उन्हे अकेले ही सन्यास लेने के उद्देश्य से जाते देखकर उनके पिता व्यासजी विरह से कातर होकर पुकारने लगे-'बेटा! बेटा!' उस समय तन्मय होने के कारण श्रीशुकदेवजी की ओर से वृक्षों ने उत्तर दिया। ऐसे सबके हृदय मे विराजमान श्रीशुकदेव मुनि को मैं नमस्कार करता हुँ॥2॥

यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेकमध्यात्मदीपमतितितीर्षतां तमोऽन्धम्।
संसारिणां करुणयाह पुराणगुह्यं तं व्याससूनुमुपयामि गुरुं मुनीनाम्॥3॥

यह श्रीमद्भागवत अत्यन्त गोपनीय-रहस्यातमक पुराण है। यह भगवत्स्वरुप का अनुभव कराने वाला और समस्त वेदों का सार है। संसार मे फँसे हुए जो लोग इस घोर अज्ञानान्धकार से पार जाना चाहते हैं, उनके लिये आध्यात्मिक तत्वों को प्रकाशित करने वाला यह एक अद्वितीय दिपक हैं। वास्तव मे उन्हीं पर करुणा करके बड़े-बड़े मुनियों के आचार्य श्रीशुकदेवजी ने इसका वर्णन किया हैं। मैं उनकी शरण ग्रहण करता हुँ॥3॥

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥4॥

मनुष्यों मे सर्वश्रेष्ठ भगवान के अवतार नर-नारयण ॠषियों को, सरस्वती देवी को और श्रीव्यासदेवजी को नमस्कार करके तब संसार और अन्तःकरण के समस्त विकारों पर विजय प्राप्त कराने वाले इस श्रीमद्भागवतमाहापुराण का पाठ करना चाहिये॥4॥

मुनयः साधु पृष्टोऽहं भवद्भिर्लोकमग्ड़लम्।
यत्कृतः कृष्णसम्प्रश्नो येनात्मा सुप्रसीदति॥5॥

शौनकादि ॠषियों! आपने सम्पुर्ण विश्व के कल्याण के लिये यह बहुत सुन्दर प्रश्न किया है; क्योंकि यह प्रश्न श्रीकृष्ण के सम्बन्ध मे है और इससे भलीभाँती आत्मशुद्धि हो जाती है॥5॥

स वै पुंसां परोधर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।
अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति॥6॥

मनुष्यों के लिये सर्वश्रेष्ठ धर्म वही है, जिससे भगवान श्रीकृष्ण मे भक्ति हो-भक्ति भी ऐसी, जिसमें किसी प्रकार की कामना न हो और जो नित्य-निरन्तर बनी रहे; ऐसी भक्ति से हृदय आनन्दस्वरुप परमात्मा की उपलब्धि करके कृतकृत्य हो हो जाता है॥6॥

वासुदेवे भगवति भक्तियोगः प्रयोजितः।
जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यदहैतुकम्॥7॥

भगवान श्रीकृष्ण मे भक्ति होते ही, अनन्य प्रेम से उनमे चित्त जोड़ते ही निष्काम ज्ञान और वैराग्य का आविर्भाव हो जाता है॥7॥

धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेनकथासु यः।
नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव ही केवलम्॥8॥

धर्म का ठीक-ठीक अनुष्ठान करने पर भी यदि मनुष्य के हृदय मे भगवान की लीला-कथाओं के प्रति अनुराग उदय न हो तो वह निरा श्रम-ही-श्रम है॥8॥

धर्मस्य ह्यापवर्ग्यस्य नार्थोऽर्थायोपकल्पते।
नार्थस्य धर्मैकान्तस्य कामो लाभाय हि स्मृतः॥9॥

धर्म का फल है मोक्ष। उसकी सार्थकता अर्थ प्राप्ति मे नहीं हैं। अर्थ केवल धर्म के लिये है। भोग-विलास उसका फल नहीं माना गया हैं।।9॥

कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभो जीवेत यावता।
जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभिः॥10॥

भोग-विलास का फल इन्द्रियों को तृप्त करना नहीं है, उसका प्रयोजन है केवल जीवन-निर्वाह। जिवन का फल भी तत्व-जिज्ञासा है। बहुत कर्म करके स्वर्गादि प्राप्त करना उसका फल नहीं है॥10॥

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