read full Shreemad Bhaagwat Mahaapuran kathaa Skandh-1 with mahatmya in hindi meaning, created by mahaamuni vyaasdevji
 
।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ।।

श्रीमद्भागवतमाहापुराण: प्रथम स्कंध: आठवाँ अध्याय

गर्भ मे परीक्षित् की रक्षा, कुन्ती के द्वारा भगवान की स्तुति और युधिष्ठिर का शोक : पृष्ठ 1

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सूत उवाच
अथ ते सम्परेतानां स्वानामुदकमिच्छताम्।
दातूं सकृष्णा गग्ड़ायां पुरस्कृत्य ययुः स्त्रियः।।1।।

सुतजी कहते है — इसके बाद पाण्डव श्रीकृष्ण के साथ जलाञ्जलि के लिये मरे हुए स्वजनों का तर्पण करने के लिये स्त्रियों को आगे करके गंगा तट पर गये॥1॥

ते निनीयोदकं सर्वे विलप्य च भृशं पुनः।
आप्लुता हरिपादाब्जरजःपूतसरिञ्जले।।2।।

वहाँ उन सबने मृत बन्धुओं को जलदान दिया और उनके गुणों का स्मरण करके बहुत विलाप किया। तदन्तर भगवान के चरण-कमलों की धुलि से पवित्र गंगाजल मे पुनः स्नान किया॥2॥

तत्रासीनं कुरुपतीं धृतराष्ट्रं सहानुजम्।
गान्धारीं पुत्रशोकार्तां पृथां कृष्णां च माधवः।।3।।
सान्त्वयामास मुनिभिर्हतबन्धूञ्शुचार्पितान्।
भूतेषु कालस्य गतीं दर्शयन्न प्रतीक्रियाम्।।4।।

वहाँ अपने भाईयों के साथ कुरुपति महाराज युधिष्ठिर, धृतराष्ट्र, पुत्र-शोक से व्याकुल गान्धारी, कुन्ती और द्रोपदी-सब बैठकर मरे हुए स्वजनों के लिये शोक करने लगे। भगवान श्रीकृष्ण ने धौम्यादि मुनियों के साथ उनको सन्त्वना दी और समझाया कि संसार के सभी प्राणी काल के अधीन है, मौत से किसी को कोई बचा नहीं सकता॥3-4॥

साधयित्वाजातशत्रोः स्वं राज्यं कितवैर्हृतम्।
घातयित्वासतो राज्ञः कचस्पर्शक्षतायुषः।।5।।

इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने अजातशत्रु महाराज युधिष्ठिर को उनका राज्य, जो धुर्तो ने छल से छीन लिया था, वापस दिलाया तथा द्रोपदी के केशों का स्पर्श करने से जिनकी आयु क्षीण हो गयी थी, उन दुष्ट राजाओं का वध कराया॥5॥

याजयित्वाश्वमेधैस्तं त्रिभिरुत्तमकल्पकैः।
तद्यशः पावनं दिक्षु शतमन्योरिवातनोत्।।6।।

साथ ही युधिष्ठिर के द्वारा उत्तम सामग्रियों से तथा पुरोहितों से तीन अश्वमेध यज्ञ कराये। इस प्रकार युधिष्ठिर के पवित्र यश को सौ यज्ञ करने वाले इन्द्र के यश कि तरह सब ओर फैला दिया॥6॥

आमन्त्रय पाण्डुपुत्रांश्च शैनेयोद्धवसंयुतः।
द्वैपायनादिभिर्विप्रैः पूजितैः प्रतीपूजितः।।7।।
गन्तूं कृतमतीर्ब्रह्मन्द्वारकां रथमास्थितः।
उपलेभेऽभिधावन्तीमुत्तरां भयविह्वलाम्।।8।।

इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने वहाँ से जाने का विचार किया। उन्होने इसके लिये पाण्डवों से विदा ली और व्यास आदि ब्राह्मणों का सत्कार किया। उन लोगो ने भी भगवान का बड़ा ही सम्मान किया। तदन्तर सात्यकि और उद्धव के साथ द्वारका जाने के लिये वे रथ पर सवार हुए। उसी समय उन्होने देखा कि उत्तरा भय से विह्वल होकर दौड़ी चली आ रही है॥7-8॥

उत्तरोवाच
पाहि पाहि महायोगिन्देवदेव जगत्पते।
नान्यं त्वदभयं पश्ये यत्र मृत्युः परस्परम्।।9।।

उत्तरा ने कहा — देवाधिदेव! जगदीश्वर! आप महायोगी है। आप मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। आपके अतिरिक्त इस लोक मे मुझे अभय देनेवाला और कोई नहीं है; क्योंकि यहाँ सभी परस्पर एक दुसरे की मृत्यु के निमित्त बन रहे है॥9॥

अभिद्रवती मामीश शरस्तप्तायसो विभो।
कामं दहतू मां नाथ मा मे गर्भो निपात्यताम्।।10।।

प्रभो! आप सर्व-शक्तिमान है। यह दहकते हुए लोहे का बाण मेरी ओर दौड़ा आ रहा है। स्वामिन्! यह मुझे भले ही जला डाले, परन्तु मेरे गर्भ को नष्ट न करे-ऐसी कृपा कीजिये॥10॥

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