श्रीदुर्गासपतशती हिंन्दु धर्म का सर्वमान्य ग्रंथ है। इसमे भगवती की कृपा के सुन्दर इतिहास के साथ ही बड़े-बड़े गूढ साधन-रहस्य भरे हैं। कर्म, भक्ति और ज्ञान की त्रिविध मन्दाकिनी बहानेवाला यह ग्रंथ भक्तों के लिये वांछाकल्पतरु है सकाम भक्त इसके सेवन से मनोऽभिलाषित दुर्लभतम वस्तु या स्थिती को सहज ही प्राप्त कर लेते है और निष्काम भक्त परम दुर्लभ मोक्ष को पाकर कृतार्थ होते हैं।
 














॥श्री दुर्गा सप्तशती॥॥ जय मातादी ॥
 
1- अथ सप्तश्लोकी दुर्गा - 7 2- श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनामस्त्रोत्रम् - 9 3- पाठविधि - 13 1- देव्याः कवचम् - 19 2- अर्गलास्त्रोत्रम् - 30 3- कीलकम् - 36 4- वेदोक्तं रात्रिसूक्तम् - 41 5- तन्त्रोक्तं रात्रिसूक्तम् - 43 6- श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् - 44 7- नवार्णविधिः - 52 8- सप्तशती न्यासः - 56 4- श्रीदुर्गासपतशती प्रारम्भ प्रथम अध्याय - मेघा ॠषि का राजा सुरथ और समाधि को भगवती की महिमा बताते हुए मधु-कैटभ वध का प्रसंग सुनाना द्वितीय अध्याय - देवताऒं के तेज से देवी दुर्गा का प्रादुर्भाव और महिषासुर की सेना का वध - 75 तृतीय अध्याय - सेनापतियों सहित महिषासुर का वध - 88 चतुर्थ अध्याय - इन्द्रादि देवताऒं द्वारा देवी जगदंबा की स्तुति - 97 पंचम अध्याय - देवताऒं द्वारा देवी की स्तुति, चण्ड-मुण्ड के मुख से अम्बिका के रुप की प्रशंसा सुनकर शुम्भ का उनके पास दूत भेजना और दूत का निराश लौटना - 109 छठा अध्याय - धूम्रलोचन वध - 123 सांतवां अध्याय - चण्ड-मुण्ड का वध - 128 आठवां अध्याय - रक्तबीज-वध - 134 नवम् अध्याय - निशुंभ का वध - 145 दशम अध्याय - शुंभ का वध - 153 ग्यारहवां अध्याय - देवताऒं द्वारा देवी की स्तुति तथा जगदंबा द्वारा देवताऒं को रक्षा का वरदान - 159 बारहवां अध्याय - देवी-चरित्रों के पाठ का माहात्म्य - 171 तेरहवां अध्याय - सुरथ और वैश्य को देवी का वरदान - 179 5- उपसंहार - 183 1- ॠग्वेदोक्तं देवीसुक्तम् - 186 2- तन्त्रोक्तं देवीसुक्तम् - 189 3- प्राधानिकं रहस्यम् - 192 4- वैकृतिकं रहस्यम् - 198 5- मूर्ति रहस्यम् - 208 6- क्षमा-प्रार्थना - 214 7- श्रीदुर्गा-मानस-पूजा - 216 8- दुर्गाद्वात्रिंशन्नाममाला - 223 9- देव्यपराधक्षमापन स्त्रोत्रम् - 230 10- सिद्धकुञ्जिका स्त्रोत्रम् - 226 11- सपतशती के कुछ सिद्ध सम्पुट-मन्त्र - 233 12- श्रीदेवीजी की आरती - 238 13- अम्बाजी की आरती - 239 14- देवीमयी - 240
या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः,
पापात्मानां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः।
श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा,
तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम्॥

त्वमेव माता च पिता त्वमेव,
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव,
त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥

देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मारर्गतोऽखिलस्य।
प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य॥
 
श्रीदुर्गासपतशती हिंन्दु धर्म का सर्वमान्य ग्रंथ है। इसमे भगवती की कृपा के सुन्दर इतिहास के साथ ही बड़े-बड़े गूढ साधन-रहस्य भरे हैं। कर्म, भक्ति और ज्ञान की त्रिविध मन्दाकिनी बहानेवाला यह ग्रंथ भक्तों के लिये वांछाकल्पतरु है सकाम भक्त इसके सेवन से मनोऽभिलाषित दुर्लभतम वस्तु या स्थिती को सहज ही प्राप्त कर लेते है और निष्काम भक्त परम दुर्लभ मोक्ष को पाकर कृतार्थ होते हैं। राजा सुरथ से महर्षि मेधान ने कहा था - 'तामुपैहि महाराज शरणं परमेश्वरीम्। आराधिता सैव नृणां भोगस्वर्गापवर्गदा॥ अर्थात- माहाराज! आप उन्हीं भगवती परमेश्वरी की शरण ग्रहण किजिए। वे आराधना से प्रसन्न होकर मनुष्यों को भोग, स्वर्ग और अपुनरावर्ती मोक्ष प्रदान करती हैं।' इसी के अनुसार आराधना करके ऐश्वर्यकामी राजा सुरथ ने अखण्ड साम्राज्य प्राप्त किया तथा वैराग्यवान समाधि वैश्य ने दुर्लभ ज्ञान के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति की। अब तक इस आशीर्वादरुप मन्त्रमय ग्रंथ के आश्रय से न मालूम कितने आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु तथा प्रेमी भक्त अपना मनोरथ सफल कर चुके हैं। हर्ष की बात है कि जगज्जनी भगवती श्रीदुर्गाजी की कृपा से वही सपतशती संक्षिप्त पाठ-विधि सहित पाठको के समक्ष हमारी वेबसाईट पर प्रकाशीत की जा रही है।
सप्तशती के पाठ मे विधि का ध्यान रखना तो उत्तम है ही, उसमे भी सबसे उत्तम बात है भगवती दुर्गा माता के चरणों मे प्रेमपूर्ण भक्ति। श्रद्धा और भक्ति के साथ जगदम्बा के स्मरण पुर्वक सप्तशती का पाठ करने वाले को उनकी कृपा का शीघ्र अनुभव हो सकता है। आशा है, प्रेमी पाठक इससे लाभ उठायेंगे।
 
1- अथ सप्तश्लोकी दुर्गा 2- श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनामस्त्रोत्रम् 3- पाठविधि 3.1- देव्याः कवचम् 3.2- अर्गलास्त्रोत्रम् 3.3- कीलकम् 3.4- वेदोक्तं रात्रिसूक्तम् 3.5- तन्त्रोक्तं रात्रिसूक्तम् 3.6- श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् 3.7- नवार्णविधिः 3.8- सप्तशती न्यासः 4- श्रीदुर्गासपतशती प्रारम्भ 4.1- प्रथम अध्याय - मेघा ॠषि का राजा सुरथ और समाधि को भगवती की महिमा बताते हुए मधु-कैटभ वध का प्रसंग सुनाना 4.2- द्वितीय अध्याय - देवताऒं के तेज से देवी दुर्गा का प्रादुर्भाव और महिषासुर की सेना का वध 4.3- तृतीय अध्याय - सेनापतियों सहित महिषासुर का वध 4.4- चतुर्थ अध्याय - इन्द्रादि देवताऒं द्वारा देवी जगदंबा की स्तुति 4.5- पंचम अध्याय - देवताऒं द्वारा देवी की स्तुति, चण्ड-मुण्ड के मुख से अम्बिका के रुप की प्रशंसा सुनकर शुम्भ का उनके पास दूत भेजना और दूत का निराश लौटना 4.6- छठा अध्याय - धूम्रलोचन वध 4.7- सांतवां अध्याय - चण्ड-मुण्ड का वध 4.8- आठवां अध्याय - रक्तबीज-वध 4.9- नवम् अध्याय - निशुंभ का वध 4.10- दशम अध्याय - शुंभ का वध 4.11- ग्यारहवां अध्याय - देवताऒं द्वारा देवी की स्तुति तथा जगदंबा द्वारा देवताऒं को रक्षा का वरदान 4.12- बारहवां अध्याय - देवी-चरित्रों के पाठ का माहात्म्य 4.13- तेरहवां अध्याय - सुरथ और वैश्य को देवी का वरदान 5- उपसंहार 5.1- ॠग्वेदोक्तं देवीसुक्तम् 5.2- तन्त्रोक्तं देवीसुक्तम् 5.3- प्राधानिकं रहस्यम् 5.4- वैकृतिकं रहस्यम् 5.5- मूर्ति रहस्यम् 6- क्षमा-प्रार्थना 7- श्रीदुर्गा-मानस-पूजा 8- दुर्गाद्वात्रिंशन्नाममाला 9- देव्यपराधक्षमापन स्त्रोत्रम् 10- सिद्धकुञ्जिका स्त्रोत्रम् 11- सप्तशती के कुछ सिद्ध सम्पुट-मन्त्र 12- श्री दुर्गा जी की आरती 13- अम्बाजी की आरती 14- देवीमयी