भारत त्यौहारों का देश है। दिवाली, होली, दशहरा और रक्षा बंधन यहां के कुछ एक प्रसिद्ध त्यौहार है। .....
 
रक्षाबंधन का त्यौहार
भारत त्यौहारों का देश है। दिवाली, होली, दशहरा और रक्षा बंधन यहां के कुछ एक प्रसिद्ध त्यौहार है। इन त्यौहारों में रक्षा बंधन विशेष रुप से प्रसिद्ध है। रक्षा-बंधन का पर्व भारत के कुछ स्थानों में रक्षासूत्र के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन काल से यह पर्व भाई-बहन के निश्चल स्नेह के प्रतीक के रुप में माना जाता है। हमारे यहां सभी पर्व किसी न किसी कथा, दंत कथा या किवदन्ती से जुडे हुए है। रक्षा बंधन का पर्व भी ऎसी ही कुछ कथाओं से संबन्धित है। रक्षा बंधन क्यों मनाया जाता है, यह जानने का प्रयास करते है।
हम उनसे लड़ लें, चाहे कितना ही झगड़ लें, लेकिन अंत में जितना प्यार हम उनसे करते हैं उसके सामने दुनिया की कोई भी मूल्यवान वस्तु बेकार है। यही कहता है हर एक बहन का दिल अपने भाई के लिए। बचपन से बड़े होने तक और बाद में बहन की शादी के बाद अलग हो जाने पर भी बहन-भाई का प्यार कम नहीं होता। एक बहन का प्यार ऐसा है कि चाहे उसका भाई उसकी कोई बात ना माने, फिर भी वह आखिरी श्वास तक चाहेगी कि उसका भाई हमेशा खुश रहे।
रक्षाबंधन का त्यौहार भाई-बहन के अटूट प्यार की निशानी है, जिसे वर्षों से मनाया जा रहा है। भाई-बहन के विश्वास को बनाए रखने वाला यह त्यौहार श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। लेकिन इसे क्यों मनाते हैं इसके पीछे कई कहानियां प्रचलित हैं।

रक्षा बंधन से जुड़ी पौराणिक कथाएँ

1. लक्ष्मी जी का राजा बली को राखी बांधना -
पुराणों के अनुसार रक्षा बंधन पर्व लक्ष्मी जी का बली को राखी बांधने से जुडा हुआ है। कथा कुछ इस प्रकार है। एक बार की बात है, कि दानवों के राजा बलि ने सौ यज्ञ पूरे करने के बाद चाहा कि उसे स्वर्ग की प्राप्ति हो, राजा बलि कि इस मनोइच्छा का भान देव इन्द्र को होने पर, देव इन्द्र का सिहांसन डोलने लगा।
घबरा कर इन्द्र भगवान विष्णु की शरण में गयें। भगवान विष्णु वामन अवतार ले, ब्राह्माण वेश धर कर, राजा बलि के यहां भिक्षा मांगने पहुंच गयें। ब्राह्माण बने श्री विष्णु ने भिक्षा में तीन पग भूमि मांग ली। राजा बलि अपने वचन पर अडिग रहते हुए, श्री विष्णु को तीन पग भूमि दान में दे दी।
वामन रुप में भगवान ने एक पग में स्वर्ग ओर दुसरे पग में पृ्थ्वी को नाप लिया। अभी तीसरा पैर रखना शेष था। बलि के सामने संकट उत्पन्न हो गया। ऎसे मे राजा बलि अपना वचन नहीं निभाता तो अधर्म होगा है। आखिरकार उसने अपना सिर भगवान के आगे कर दिया और कहां तीसरा पग आप मेरे सिर पर रख दीजिए। वामन भगवान ने ठिक वैसा ही किया, श्री विष्णु के पैर रखते ही, राजा बलि परलोग पहुंच गया।
बलि के द्वारा वचन का पालन करने पर, भगवान विष्णु अत्यन्त प्रसन्न्द हुए, उन्होंने आग्रह किया कि राजा बलि उनसे कुछ मांग लें। इसके बदले में बलि ने रात दिन भगवान को अपने सामने रहने का वचन मांग लिया।, श्री विष्णु को अपना वचन का पालन करते हुए, राजा बलि का द्वारपाल बनना पडा। इस समस्या के समाधान के लिये लक्ष्मी जी को नारद जी ने एक उपाय सुझाया। लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जाकर उसे राखी बांध अपना भाई बनाया और उपहार स्वरुप अपने पति भगवान विष्णु को अपने साथ ले आई। इस दिन का यह प्रसंग है, उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा थी। उस दिन से ही रक्षा बंधन का पर्व मनाया जाने लगा।

2. इंद्राणी का देवराज इंद्र को रक्षासुत्र बांधना-
एक बार महाराज युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा, “हे अच्युत! मुझे रक्षाबन्धन की वह कथा सुनाइए जिससे मनुष्यों की प्रेतबाधा और दुख दूर होता है।“
इस पर भगवान बोले, “हे पाण्डव श्रेष्ठ! प्राचीन समय में एक बार देवों तथा असुरों में बारह वर्षों तक युद्ध हुआ। संग्राम में देवराज इंद्र की पराजय हुई, जिस कारणवश देवता कान्ति विहीन हो गए। इंद्र रणभूमि छोड़कर विजय की आशा को तिलांजलि देकर देवताओं सहित अमरावती चला गया। लेकिन पीछे से विजेता दैत्यराज ने तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया और राजपद में घोषित कर दिया कि इंद्रदेव सभा में न आएं तथा देवता एवं मनुष्य यज्ञ कर्म न करें।
सब लोग मेरी पूजा करें, जिसको इसमें आपत्ति हो वह राज्य छोड़कर चला जाए। दैत्यराज की इस आज्ञा से यज्ञ, वेद, पठन, पाठन तथा उत्सव समाप्त कर दिए गए। धर्म का नाश होने से देवों का बल घटने लगा। अब सभी इस परेशानी का हल चाहते थे इसलिए इंद्र स्वयं ही देवगुरु बृहस्पति के पास गए।
वे बोले, “हे गुरु! मैं शत्रुओं से घिरा हुआ प्राणान्त संग्राम करना चाहता हूं।“ इन्द्र को परेशान देख पहले तो बृहस्पति ने समझाया कि होनी बलवान होती है, जो होना है, होकर रहेगा, इसलिए आपका क्रोध करना व्यर्थ है। परंतु इंद्र की हठधर्मिता तथा उत्साह देखकर रक्षा विधान करने को कहा। श्रावण पूर्णिमा को प्रात:काल ही रक्षा का विधान सम्पन्न किया गया।
स्वयं गुरु ने उन्हें एक मंत्र प्रदान किया – “येनवद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:। तेन त्वाममिवध्नामि रक्षे माचल माचल।।“ इस मन्त्रोच्चारण से देवगुरु ने श्रावणी के ही दिन रक्षा विधान किया। सहधर्मिणी इंद्राणी के साथ वृत्त संहारक इंद्र ने बृहस्पति की उस वाणी का अक्षरश: पालन किया और दानवों पर विजय प्राप्त की। कहते हैं कि आज भी इसी मंत्र का उच्चारण करके कई लोग रक्षाबंधन का त्यौहार मनाते हैं।

3. रानि कर्णवती का हुमायूं को राखी भेजना-
बात उस समय की है, जब राजपूतों और मुगलों की लडाई चल रही थी। उस समय चितौड के महाराजा की की विधवा रानी कर्णवती ने अपने राज्य की रक्षा के लिये हुमायूं को राखी भेजी थी। हुमायूं ने भी उस राखी की लाज रखी और स्नेह दिखाते हुए, उसने तुरम्त अपनी सेनाएं वापस बुला लिया। इस ऎतिहासिक घटना ने भाई -बहन के प्यार को मजबूती प्रदान की। इस घटना की याद में भी रक्षा बंधन का पर्व मनाया जाता है।

4. द्वौपदी का श्री कृ्ष्ण को राखी बांधना-
राखी का यह पर्व पुराणों से होता हुआ, महाभारत अर्थात द्वापर युग में गया, और आज आधुनिक काल में भी इस पर्व का महत्व कम नहीं हुआ है। राखी से जुडा हुआ एक प्रसंग महाभारत में भी पाया जाता है। प्रंसग इस प्रकार है। शिशुपाल का वध करते समय कृ्ष्ण जी की तर्जनी अंगूली में चोट लग गई, जिसके फलस्वरुप अंगूली से लहू बहने लगा। लहू को रोकने के लिये द्रौपदी ने अपनी साडी की किनारी फाडकर, श्री कृ्ष्ण की अंगूली पर बांध दी।
इसी ऋण को चुकाने के लिये श्री कृ्ष्ण ने चीर हरण के समय द्वौपदी की लाज बचाकर इस ऋण को चुकाया था। इस दिन की यह घटना है उस दिन भी श्रावण मास की पूर्णिमा थी।

रक्षा बंधन का धार्मिक आधार-
भारत के कई क्षत्रों में इसे अलग - अलग नामों से अलग - अलग रुप में मनाया जाता है। जैसे उतरांचल में इसे श्रावणी नाम से मनाया जाता है भारत के ब्राह्माण वर्ग में इस इन यज्ञोपवीत धारण किया जाता है। इस दिन यज्ञोपवीत
यज्ञोपवीत धारण करना शुभ माना जाता है। इस दिन ब्राह्माण वर्ग अपने यजमानों को यज्ञोपवीत तथा राखी देकर दक्षिणा लेते है। अमरनाथ की प्रसिद्ध धार्मिक यात्रा भी रक्षा बंधन के दिन समाप्त होती है।

रक्षा बंधन का सामाजिक आधार-
भारत के राजस्थान राज्य में इस इद्न रामराखी और चूडा राखी बांधने की परम्परा है। राम राखी केवल भगवान को ही बांधी जाती है। व चूडा राखी केवल भाभियों की चूडियों में ही बांधी जाती है। यह रेशमी डोरे से राखी बनाई जाती है। यहां राखी बांधने से पहले राखी को कच्चे दूध से अभिमंत्रित किया जाता है। और राखी बांधने के बाद भोजन किया जाता है।

राखी के अन्य रुप-
भारत में स्थान बदलने के साथ ही पर्व को मनाने की परम्परा भी बदल जाती है, यही कारण है कि तमिलनाडू, केरल और उडीसा के दक्षिण में इसे अवनि अवितम के रुप में मनाया जाता है। इस पर्व का एक अन्य नाम भी है, इसे हरियाली तीज के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन से पहले तक ठाकुर झुले में दर्शन देते है, परन्तु रक्षा बंधन के दिन से ये दर्शन समाप्त होते है। Posted at 23 Apr 2020 by admin
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