बहुत लोगो को भागवत का ज्ञान ही नहीं होता है यंहा पर भगवत के विषयो को स्कंध के अनुसार बताया गया है,.....
 
भागवत के विषय
बहुत लोगो को भागवत का ज्ञान ही नहीं होता है यंहा पर भगवत के विषयो को स्कंध के अनुसार बताया गया है,ताकि पाठक को भागवत के मूल विषय समझ मे आ जाये और इसके प्रति रुचि बढे.

श्रीमद्भागवत महात्म्य :- श्रीमद्भागवत के महात्म्य में ‘गोकर्णोपाख्यान’ और ‘भक्ति’ के कष्ट निवारण दोनों के माध्यम से ये बताया गया है कि श्रीमद्भागवत के केवल श्रवण मात्र से कैसे जीव का उद्धार हो जाता है. ‘श्रवण की महिमा’ है, यही इसका सार है.

प्रथम स्कन्ध :- प्रथम स्कन्ध में कुन्ती और भीष्म स्तुत्ति से ‘भक्ति-योग’ के बारे में बताया गया है और ‘परीक्षित की कथा’ के माध्यम से ये बताया गया है कि एक मरते हुए व्यक्ति को क्या करना चाहिए ? क्योकि ये प्रश्न केवल परीक्षित का नहीं, हम सब का है क्योकि ‘सात दिन’ ही प्रत्येक जीव के पास है, आठवाँ दिन है ही नहीं, इन्ही सात दिन में उसका जन्म होता है और इन्ही सात दिन में मर जाता है.

द्वितीय स्कन्ध :- द्वितीय स्कन्ध में ‘योग-धारणा’ के द्वारा शरीर त्याग की विधि बताई गयी है,भगवान का ध्यान कैसे करना चाहिए उसके बारे में बताया गया है.

तृतीय स्कन्ध :- तृतीय स्कन्ध में ‘कपिल-गीता’ का वर्णन है जिसमें ‘भक्ति का मर्म’ ‘काल की महिमा’ और देह-गेह में आसक्त पुरुषों की ‘अधोगति’ का वर्णन,मनुष्य योनि को प्राप्त हुए जीव की गति क्या होती है. केवल भक्ति से ही वह इन सब से छूटकर भगवान की ओर जा सकता है.

चतुर्थ स्कन्ध :- चतुर्थ स्कन्ध में ये बताया गया है कि यदि भक्ति सच्ची हो तो उम्र का बंधन नहीं होता ‘ध्रुवजी की कथा’ ने यही सिद्ध किया है. ‘पुरंजनोपाख्यान’ में इन्द्रियों की प्रबलता के बारे में बताया गया है.

पंचम स्कन्ध :- पंचम स्कन्ध में ‘भरत-चरित्र’ के माध्यम से ये बताया गया है कि भरतजी कैसे एक हिरन के मोह में पड़कर अपने तीन जन्म गवा देते है.‘भवाटवी’ के प्रसंग में ये बताया गया है कि व्यक्ति अपनी इन्द्रियों के बस में होकर कैसे अपनी दुर्गति करता है. ‘नरकों का वर्णन’ बताया गया है कि मरने के बाद व्यक्ति की अपने-अपने कर्मो के हिसाब से कैसे नरको की यातना भोगनी पड़ती है.

षष्ट स्कन्ध :- षष्ट स्कन्ध मे भगवान ‘नाम की महिमा’ के सम्बन्ध में ‘अजामिलोपाख्यान’ है,‘नारायण कवच’ का वर्णन है जिससे वृत्रासुर का वध होता है, नारायण कवच वास्तव में भगवान के विभिन्न नाम है जिसे धारण करने वाले व्यक्ति कों कोई परास्त नहीं कर सकता.‘पुंसवन विधि’ एक संस्कार है जिसके बारे में बताया गया है.

सप्तम स्कन्ध :- सप्तम स्कन्ध में ‘प्रहलाद-चरित्र’ के माध्यम से बताया गया है कि हजारों मुसीबत आने पर भी भगवान का नाम न छूटे, यदि भगवान का बैरी पिता ही क्यों न हो उसे भी छोड़ देना चाहिए. मानव-धर्म, वर्ण-धर्म, स्त्री-धर्म,ब्रह्मचर्य गृहस्थ और वानप्रस्थ-आश्रमो के नियम का कैसे पालन करना चाहिए इसका निरुपण है.कर्म व्यक्ति कों कैसे करना चाहिए,यही इस स्कन्ध का सार है.

अष्टम स्कन्ध :- भगवान कैसे भक्त के चरण पकडे़ हुए व्यक्ति का पहले, बाद में भक्त का उद्धार करते है ये ‘गजेन्द्र-ग्राह कथा’के माध्यम से बताया गया है. ‘समुद्र मंथन’, ‘मोहिनी अवतार’, ‘वामन अवतार’, के माध्यम से भगवान की भक्ति और लीलाओं का वर्णन है.

नवम स्कन्ध :- नवम स्कन्ध में ‘सूर्ये-वंश’ और ‘चंद्र-वंश’ की कथाओं के माध्यम से उन राजाओ का वर्णन है जिनकी भक्ति के कारण भगवान ने उनके वंश में जन्म लिया. जिसका चरित्र सुनने मात्र से जीव पवित्र हो जाता है.यही इस स्कन्ध का सार है.

दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध) :- भागवत का ‘हृदय’ दशम स्कन्ध है बड़े-बड़े संत महात्मा, भक्त के प्राण है ये दशम स्कन्ध. भगवान अजन्मा है, उनका न जन्म होता है न मृत्यु, श्रीकृष्ण का तो केवल ‘प्राकट्य’ होता है, भगवान का प्राकट्य किसके जीवन में,और क्यो होता है,किस तरह के भक्त भगवान को प्रिय है, भक्तो पर कृपा करने के लिए, उन्ही की ‘पूजा-पद्धति’ स्वीकार करने के लिए,चाहे जैसी भी पद्धति हो, के लिए ही भगवान का प्राकट्य हुआ, उनकी सारी लीलाये, केवल अपने भक्तो के लिए थी, जिस-जिस भक्त ने उद्धार चाहा, वह राक्षस बनकर उनके सामने आता गया और जिसने उनके साथ क्रीडा चाही वह भक्त, सखा, गोपी, के माध्यम से सामने आते गए, उद्देश्य केवल एक था – ‘श्रीकृष्ण की प्राप्ति ’ भगवान की इन्ही ‘दिव्य लीलाओ का वर्णन’ इस स्कन्ध में है. जहाँ ‘पूतना-मोक्ष’,‘उखल बंधन’ ‘चीर-हरण’,‘गोवर्धन’ जैसी दिव्य-लीला और ‘रास’, ‘महारास’, ‘गोपीगीत’ तो दिवातिदिव्य लीलाये है. इन दिव्य लीलाओ का श्रवण, चिंतन, मनन, बस यही ‘जीवन का सार’ है.

दशम स्कन्ध (उत्तरार्ध) :- दशम स्कन्ध उत्तरार्ध में भगवान की ‘ऐश्वर्य-लीला’ का वर्णन है जहाँ भगवान ने वासुरी छोड़कर सुदर्शन चक्र धारण किया उनकी कर्मभूमि, नित्चर्या, गृहस्थ, का बड़ा ही अनुपम वर्णन है.

एकादश स्कन्ध :- एकादश स्कन्ध में भगवान ने अपने ही यदुवंश कों ऋषियों का श्राप लगाकर यह बताया की गलती चाहे कोई भी करे मेरे अपने भी उसको अपनी करनी का फल भोगना पड़ेगा. भगवान की माया बड़ी प्रबल है उससे पार होने के उपाय केवल भगवान की भक्ति है,यही इस एकादश स्कन्ध का सार है. अवधूतोपख्यान - २४ गुरुओ की कथा शिक्षायें है.

द्वादश स्कन्ध :- द्वादश स्कन्ध में कलियुग के दोषों से बचने के उपाए – केवल ‘नामसंकीर्तन’ है. मृत्यु तो परीक्षित जी को आई ही नहीं क्योकि उन्होंने उसके पहले ही समाधि लगाकर स्वंय को भगवान में लीन कर दिया था उनकी परमगति हुई क्योकि जिसने इस भागवत रूपी अमृत का पान कर लिया हो उसे मृत्यु कैसे आ सकती थी.

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य :- कीर्तनोत्सव में उद्धव जी का प्रकट होना, श्रीमद्भागवत में विशुद्ध भक्ति,भगवान श्रीकृष्ण के नाम लीला गुण आदि का संकीर्तन किया जाये तो वे स्वयं ही हृदय में आ विराजते है और श्रवण,कीर्तन करने वाले के सारे दुख मिटा देते है,ठीक वैसे ही जैसे सूर्ये अन्धकार को और आँधी बादलों को तितर-बितर कर देते है. जिस वाणी से घट-घटवासी अविनाशी भगवान के नाम लीला, गुण,का उच्चारण नहीं होता, वह वाणी भावपूर्ण होने पर भी निरर्थक है, सारहीन है. जिस वाणी से चाहे वह रस, भाव, अंलकार आदि से युक्त ही क्यों न हो - जगत् को पवित्र करने वाले भगवान श्रीकृष्ण के यश का कभी गान नहीं होता. वह तो अत्यंत अपवित्र है इसके विपरीत जिसमे सुन्दर रचना भी नहीं है, और जो व्याकरण आदि की द्रृष्टि से दूषित शब्दों से युक्त भी है, परन्तु जिसके प्रत्येक श्लोक में भगवान के सुयश नाम जड़े है वही वाणी लोगो के सारे पापों का नाश कर देती है.Posted at 14 Nov 2018 by admin
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