भगवान का नाम अग्निस्वरूप है । जैसे आग जो होती है उसमें हम कुछ भी चीज डाले, गीली या सूखी, सब कुछ उसम.....
 
भगवान का जो नाम है, ये भगवान से भी बडा है।
भगवान का नाम अग्निस्वरूप है । जैसे आग जो होती है उसमें हम कुछ भी चीज डाले, गीली या सूखी, सब कुछ उसमें जल जाता है । हमने जो चीज आग में डाल दी वो जल जाएगी।

ऐसे ही भगवान का नाम है व्यक्ति कैसे भी ले,वो तो अपना असर दिखाएगा, जैसे अग्नि का काम है जलाना वैसे ही भगवान का नाम लिया आपने, तो वो असर दिखाएगा
अब चाहे व्यक्ति हँस के ले, गा के ले, उठते-बैठते कैसे भी ले, क्रोध से कहे, प्रेम से कहे, वो कभी खाली नहीं जाता है. तो वो असर दिखाएगा नाम अपना असरा दिखाता है.

बात ये है कि भगवान के नाम पर ही इतना जोर क्यों दिया गया? ये जो चार युग होते है द्वापर युग, त्रेतायुग, सतयुग और कलयुग ये चार है, इनमें भगवान को प्राप्त करने के अलग-अलग तरीके विधिया है।

जैसे सतयुग में कहा गया है कि भगवान “ध्यान और तप” से मिलते है, हम सुनते है कि लोग हजारों वर्ष तक तपस्या ही करते रहे तो ये सतयुग की बात है, सतयुग में ध्यान से भगवान की प्राप्ति होती थी, उस युग मे लोगों की आयु भी हजारों वर्ष तक होती थी इसलिए उस समय के लोग ध्यान करते थे,

फिर त्रेतायुग आया उसमें भगवान “यज्ञ और हवन” से मिलते थे. क्योकि आयु कम हो गई थी, जितनी सतयुग में थी, उससे कम हो गई, तो लोग ज्यादा हवन करते थे।

फिर द्वापर युग में कहा गया कि भगवान “परिचर्या” अर्थात सेवा से ही मिलेंगे तो सेवा करने लगे. फिर कलियुग आया, तो आयु बहुत ही कम हो गई, सौ वर्ष से भी कम आयु होनें लगी, तो कलयुग में न तो व्यक्ति ध्यान कर सकता है, न ही सेवा कर सकता है, और न ही यज्ञ कर सकता है।

तो भगवान प्राप्ति का साधन, “भगवन नाम” ही बता दिया गया. कि कलयुग में भगवत प्राप्ति का सबसे सीधा और सरल उपाय उनका नाम है । नाम में भगवान ने अपनी सारी शक्ति भर दी.

रामायण का एक प्रसंग है जब भगवान को लंका जाना था और समुद्र को पार करना था तब समुद्र ने बताया कि आप इसमें राम-नाम के पत्थर डाल कर सेतु बनाइए,

तो सब लोग सेतु बंधन करने लगे लोग पत्थर पर राम का नाम लिखकर समुद्र में डालते और वो तैरते, भगवान राम एक जगह बैठकर ये देखते है तो वो मन में ये विचार करते है कि जब मेरे नाम लिखने से ये पत्थर डूबते नहीं है, तो मै स्वयं एक पत्थर को डाल के देखता हू ।

वो भी तैरगा, तो सारे वानर अपने काम में लगें थे तो भगवान उठकर दूर चले गए, और एक पत्थर उठाकर समुद्र में डाला, तो वो डूब गया अब भगवान को आश्चर्य हुआ,
कि जो पत्थर वानर मेरा नाम लिखकर डाल रहे है, वो तैर रहा है और जो मैने डाला वो डूब गया तो उस समय हनुमान जी ये सब देख रहे थे तो वो झाडियों में से निकल कर आए,

और बोले -कि प्रभु! आप ये क्या करे है, तो भगवान ने कहा - कि देखो ये पत्थर डूब गया है, ये बात मेरे और तुम्हारे बीच में रहना चाहिए तब हनुमान जी बोले क्यों? तो भगवान कहते है कि लोगों को विश्वास मेरे नाम पर है मेरे ऊपर है, कि मेरे नाम से ही पत्थर तैरते है.

तब हनुमान जी कहते है कि प्रभु आपने तो केवल एक अहिल्या को तारा है, पर आपके नाम ने न जाने कितने को तारा है ।

तो जो शक्ति आपके नाम में है, वो आप में नहीं. आप तो अवतार के बाद अपने धाम को चले जाओगे, पर आपका नाम तो आज भी है, और हमेशा तारेगा, आपके बाद भी, उसमें वो शक्ति है ।

हनुमान जी जब सीता जी की खोज करने जाते है तो राम जी उन्हें एक अगूठीं देते है कि जब सीता जी मिल जाए, तो ये अगूठी दे देना कि तुम राम के दूत हो वो तुम्हें पहचान जाएगी, तो उस पर राम का नाम लिखा था. तो वो उस अगूठी को मुहॅ में रखकर समुद्र को पार करते है ।

तो अंगूठी को अपने मुख में रख लेते है, इस प्रसंग से हनुमान जी ये शिक्षा दे रहे है, कि मेरे मुह में राम-नाम की अगूठी होने से वो इस समुद्र को पार कर गए, तो इसमें कोई अचरज नहीं है।

अगर व्यक्ति साक्षात राम का नाम ले, तो क्या वो इस संसार सागर से पार नहीं हो पाएगा क्या ? जब मै इस अगूठी से पार हो गया, तो जब व्यक्ति साक्षात अपने मुहॅ से राम का नाम लेगा तो जरुर पार हो जायेगा.

ये जो नाम है वो एक नौका है जो इस संसार सागर से पार होने के लिए भगवान ने हम सब को दे रखी है ।

और उसका कोई नियम नहीं बताया, भगवान ने, कि नहा-धो के पूजा में बैठोगे, तभी मेरा नाम ले सकोगे, कोई नियम नहीं, जब जैसे भी परिस्थिति में हो, उठते-बैठते, खाते-पीते, बस अपनी आदत बना लो, नाम लेने की, कृष्ण, राम जो भी जिसको प्यारा लगे, नाम को भजने की कोई पाबंदी नहीं, कि ये वाला ही नाम लो तो उससे उद्धार होगा नहीं ?
उनके तो नाम भी कई है, जिस भक्त को जो नाम प्यारा लगा, उसने भगवान को वहीं नाम दे दिया, और उन्होंने वहीं रख लिया. इसी तरह भजने में भी पांबदी नहीं है जिसको जो अच्छा लगे, सोते-उठते बस नाम ही लेता रहे । क्या जाएगा उस नाम को लेने में एक

एक सेठजी थे, भगवान का दिया हुआ सब कुछ था उनके पास धन-दौलत, रूपया-पैसा था । और उनके पास सोना बहुत था, इतना था कि वो बाटते फिरते थे, अब एक दिन सेठजी गाव के लोगों को सोना बाट रहे थे, सब लोग आते जाते और लेते जाते, पर सोना खत्म ही नहीं होता था. उसका खजाना खाली ही नहीं होता था।

अब एक संत वहा से निकले, तो सेठजी ने कहा - कि आप भी ले लीजिए, आप जो दर-दर भिक्षा माग रहे है, इसकी जरूरत नहीं पडेगी आपको, आराम से आपका गुजर बसर हो जाएगा, संत ने कहा की मुझे नहीं चाहिये,

फिर सेठजी को गुस्सा आया कि मै इनको दे रहा हू, पर ये ले नहीं रहे है । उन्होनें फिर कहा संत से, कि आप ले लेगें तो आपका क्या चला जाएगा, आपके भले की ही बात तो कह रहा हू, संत समझ गए कि इसको अपने रूपए पैसे का अहंकार है ।

फिर संत ने बहुत देर बाद कहा - कि ठीक है और एक तुलसी का पत्ता लिया, और उस पर भगवान का नाम लिख दिया राम. और सेठ से कहा कि इसके बराबर मुझे सोना दे दो, तो सेठ को हॅसी आ गई, कि इस पत्ते में कितना सोना आएगा,

सेठ ने एक तराजू पर वो पत्ता रखा और दूसरे तराजू पर सोना रखा और वो रखता जा रहा है पर उस पत्ते के बराबर सोना नहीं हो पा रहा उसने अपना सारा सोना रख दिया फिर भी उस पत्ते के बराबर सोना नहीं हो पाया.

तराजू का पलडा ज्यों का त्यों रहा तो सेठ संत के चरणों में गिरा और बोला कि आप मुझें बताए कि आपनें इस पत्तें में ऐसा क्या लिखा कि मेरा सोना इस की बराबरी नहीं कर पाया तो संत ने कहा कि इसमें दुनिया का सबसे बडा खजाना है भगवान का नाम. तुम इसे कम मत समझना, हम संतो के लिए ये दुनिया में सबसे बडा सहारा है

तों ये जो भगवान का नाम है वो व्यक्ति को तारने वाला है व्यक्ति अगर अपनी भलाई चाहे तो बडें से बडा साधन नही आ रहा समझ में तो वो ये नाम ही ले सकता है. क्योकि “कलयुग केवल नाम अधारा सुमर-सुमर नर उतरही पारा” कलयुग में केवल भगवान का नाम ही व्यक्ति ले ले वहीं बहुत है ।

एक संत थे तो वो रोज गीता का पाठ किया करते थे तो वो रोज गीता का एक पाठ राधारानी को सुनाया करते थे, और उनको अपर्ण करते थे, रोज बडे प्रेम, भाव से करते थे, भगवत गीता में उनकी श्रद्धा थी,

तो सुनाते-सुनाते उनकी उम्र बीत गई, एक दिन ऐसा आया कि उनकी आखों की ज्योति चली गई, अंधे हो गए, तो रोने लगे, कि भगवान आपने मेरी आखों की रोशनी छीन ली, तो एक छोटा-सा बालक आया और कहता है, कि बाबा तुम्हारी आखें चली गई इसलिए रो रहे हो?

तो वो कहते है - कि नहीं, मे इसलिए रो रहे हूँ कि मै राधा जी को अब गीता कैसे सुनाउगा, मेरी उम्र बीत गई, मै रोज गीता का एक पाठ राधा रानी को सुनाता हू। मेरा अब नियम टूट जाएगा तो वो बालक कहता है, कि बाबा मै एक पटटी दे रहा हू, इसे आप अपनी आखों से बाधॅ लो, तो बाबा कहते है - कि इससे क्या होगा तो वो कहते है कि आप बाधों तो पहले, तो बाबा पटटी आखों से बाधते है ।

तो वो बालक साक्षात भगवान कृष्ण थे, अब संत ने अपनी आखों से वो पटटी बाध ली, जब वो सुबह उठे तो बडा चमत्कार हो गया उनकी आखों की ज्योंति वापिस आ गई, उन्हें सबकुछ दिखाई देने लगा जैसा पहला दिखाई देता था तो संत ने सोचा - ऐसी कौन-सी औषिधी, उस बालक ने पटटी ने बाध दी, कि रात भर में मुझे दिखने लगा तो संत ने वो पटटी खोली तो उसमें केवल राधा रानी का नाम लिखा था।

तो संत समझ गए कि ये हमारे राधा जी के नाम का कमाल है जो आखों की ज्योति को वापिस ला सकती है, तो वो स्वंय क्या नहीं कर सकती है । उनका नाम कितना महान है जो एक बार प्रेंम से श्री राधे कहता है उसका जीवन तर जाता है ।

राधा रानी जी का नाम की गहराई में जाकर देखे तो , राधा राधा राधा, बार-बार कहने पर एक शब्द सुनाई देता है, आधार आधार, राधा नाम जो व्यक्ति को एक राह देता है, दुनिया मे सभी भगवान के अपने मंत्र है, पर राधा जी का कोई मंत्र नहीं है ?

क्योंकि उनका नाम ही अपने आप में महामंत्र है । उनका नाम जो एक बार ले,ले उसे अपने जीवन में कुछ भी करने की जरूरत नहीं है ।

रामायण का प्रसंग है, कि जब भगवान राम अपनी लीला समाप्त करके अपने धाम को जा रहे थे तो उन्हेांने सरयू नदी में समाधि ली थी,

शरीर सहित अपने धाम को वो गए, और अयोध्या की जनता भी उनके साथ गई थी पर उस समय भगवान के साथ हनुमान जी नहीं गए, सब लोग साथ में गए तो भगवान ने कहा कि हनुमान सब लोग मेरे धाम को जा रहे है ।

तुम नहीं चलोगे? तो हनुमान जी ने कहा- कि प्रभु वहा क्या आपका नाम है? भजन, कथा है? आपके धाम में, तो भगवान हॅसें और बोले कि ये नाम तो सिर्फ मृत्युलोक मे है, वहा ये सब कुछ नहीं है ।

वहा मै हू साक्षात, तो हनुमान जी ने कहा - फिर मै वहा जाकर क्या करूगा? तो भगवान बोले - वहा मै तो हू? हनुमान जी कहते है पर आपका नाम नहीं है?

भगवान ने राम और कृष्ण अवतार में कितने राक्षसों को अपने हाथ से मारा, पर उनको धाम नहीं मिला उन्हें भक्ति नहीं मिली, उनका उद्धार तो हुआ, तो भगवान आपका नाम नहीं मिला,

तो प्रभु मुझे वहा नहीं जाना जहा आप है, पर आपका नाम नहीं है, तो भगवान ने कहा - कि हनुमान जब तक ये पृथ्वी है तब तक आप यहा रहेगें , जहा भगवान का नाम लिया जाता है, वहा हनुमान जी होते है ।

तुलसीदास जी ने कहा है - कि “प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया” प्रभु का मतलब चाहे राम हो या कृष्ण हो कोई भी नाम हो, वो शक्ति, वो भगवान, चाहे राधा का नाम हो शिव का नाम हो
जैसे नदिया तो बहुत है, रास्ते अलग अलग है, पर सब सागर में मिलती है।

तो सिर्फ नाम के लिए हनुमान जी यहीं रह गए, जब राम जी का राजतिलक हुआ तो सीता जी ने अपने गले की माला हनुमान जी को दी, पुरुस्कार के रूप् में,

तो हनुमान जी उसके एक-एक मोती को तोडने लगे. और तोड़ तोड़ कर फेकते जा रहे है तो सब ने पूछा - कि आप ये क्या कर रहे है?इतनी सुन्दर माला आप क्यों तोड़ रहे है।

तो उन्होने कहा - कि मै देख रहा हू, कि इसमें मेरे प्रभु का नाम है कि नहीं, पर इसमें मुझे नाम नहीं दिखाई दे रहा है। जिस वस्तु में प्रभु का नाम नहीं है, मेरी माता सीता का नाम नहीं है, वो मेरे किसी का काम की नहीं है।,वो चाहे अमूल्य हीरा ही क्यों न हो,

फिर अंत में सबने कहा - कि ये माला तो तोड दी, आपने, पर क्या आपके अंदर भगवान है । तो उन्हो ने दो पल का समय भी नहीं लगाया, और अपना सीना चीर के दिखाया, तो सबको राम और सीता के दर्शन हुए ,

वहीं नाम उनके अंदर दिखने लगा, तो एक भक्त के लिए भगवान का नाम ही सब कुछ है और भगवान ने अपने से ज्यादा शक्ति अपने नाम में भर दी है ये जो सतसंग में भगवान का कीर्तन कराते है, वो इसीलिए कराते है कि व्यक्ति का पूरा दिन बीत जाता है ।

उसे पता ही नहीं होता कि उसने आज नाम लिया है कि नहीं, ऐसे ही दिन बीतते जाते है । कम से कम एक बार भगवान का नाम तो ले सकता है नाम ही लेले यहीं बहुत है।

नाम में बहुत शक्ति है, जिसने इसको भजा है उसे इसका अनुभव हुआ है । इसमें क्या शक्ति है ये तो जो इस नाम में उतरा उसे ही भगवान मिल जाते है उनके नाम में ही वो परम शक्ति है इसलिए इस नाम की बहुत महिमा है।
जय श्री रामPosted at 14 Nov 2018 by admin
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