जय सियाराम जय जय सियाराम ! विघ्न विनाशक जय हनुमान !! “ प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । राम लखन सीत.....
 
हनुमान को वरदान
जय सियाराम जय जय सियाराम ! विघ्न विनाशक जय हनुमान !!

“ प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । राम लखन सीता मन बसिया ।।“

श्रीहनुमानजी संयोगकाल में भगवान् श्रीराम की सर्वांगीण सेवा करते हैं तथा वियुक्त होने पर, उनके भजन-चिंतन में ही डूबे रहते हैं—उनमें नित्य-युक्त रहते हैं | इनके चिंतन में भी अद्भुत विलक्षणता है | पतिव्रता पत्नी तो केवल स्मरण-चिंतन करके रह जाती है; परन्तु ये तो -

“ प्रभु चरित्र सुनिवे को रसिया ” हैं |

-- भगवान् के चरित्र और गुणों के सुनने और कहने में इतना रस लेते हैं, जिसकी कोई सीमा नहीं | इन्होंने ऐसा शरीर धारण कर रखा है और भगवान् के साथ सम्बन्ध भी ऐसा ही जोड़ लिया है कि जहां कहीं , जिस समय भी श्रीराम-कथा होती है , वहाँ ये स्वच्छन्द प्रकट हो जाते हैं और कथा श्रवण में अनिर्वचनीय माधुर्य-रस की अनुभूति करते हैं |

हनुमान जी की वियोग-रुचि भी निराली ही है | लौकिक अथवा पारमार्थिक पुरुष कहीं भी अपने इष्ट का वियोग नहीं चाहते –जैसे पतिव्रता पत्नी, पति का और भक्त, भगवान् का |
किन्तु हनुमानजी की बात इन सब से विलक्षण है | जब भगवान् स्वधाम को पधारने लगे, तब हनुमान जी ने यही वरदान माँगा कि –“ भगवन् ! मुझे यहीं पृथ्वीलोक में निवास करने की आज्ञा देने की कृपा करें | जब तक आपकी अनपायनी,परमपावनी कथा इस पृथ्वी पर होती रहेगी, तब तक मैं यहाँ रहकर परम प्रेम से इसका श्रवण कर्ता रहूँगा |”

यावद् रामकथा वीर, चरिष्यति महीतले |
तावच्छरीरे वत्स्यन्तु प्राणा मम न शंशय: ||

.................(वा०रा०७|४०|१७)

{कल्याण-श्रीहनुमान अंक}
Posted at 14 Nov 2018 by admin
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