पात्रता के आभाव में सांसारिक जीवन में किसी को शायद ही कुछ विशेष उपलब्ध हो पाता हो। अपना सगा होत.....
 
पात्रता
पात्रता के आभाव में सांसारिक जीवन में किसी को शायद ही कुछ विशेष उपलब्ध हो पाता हो। अपना सगा होते हुऐ भी एक पिता मूर्ख गैर जिम्मेदार पुत्र को अपनी विपुल संपत्ति नहीं सौंपता। कोई भी व्यक्ति निर्धारित कसौटियों पर खरा उतरकर ही विशिष्ट स्तर की सफलता अर्जित कर सकता है। मात्र मांगते रहने से कुछ नहीं मिलता, हर उपलब्धि के लिए उसका मूल्य चुकाना पड़ता है। बाजार में विभिन्न तरह की वस्तुएं दुकानों में सजी होती है, पर उन्हें कोई मुफ्त में कहां प्राप्त कर पाता है? पात्रता के आधार पर ही शिक्षा, नौकरी, व्यवसाय आदि क्षेत्रों में भी विभिन्न स्तर की भौतिक उपलब्धियां हस्तगत करते सर्वत्र देखा जा सकता है। अध्यात्म में भी यही सिध्दांत लागू होता है। भौतिक क्षेत्र की तुलना में अध्यात्म के प्रतिफल कई गुना अधिक महत्वपूर्ण, सामर्थ्यवान और चमत्कारी है। किन्हीं - किन्हीं महापुरुषों को देख एवं सुन कर हर व्यक्ति के मुंह में पानी भर आता है तथा उन्हें प्राप्त करने के लिए मन ललचाता है, पर अभीष्ट स्तर का आध्यात्मिक पुरूषार्थ न कर पाने के कारण उस ललक की आपूर्ति नहीं हो पाती। पात्रता के आभाव में अधिकांश को दिव्य आध्यात्मिक विभूतियों से वंचित रह जाना पड़ता है, जबकि पात्रता विकसित हो जाने पर बिना मांगे ही वे साधक पर बरसती है। उन्हें किसी प्रकार का अनुनय विनय नहीं करना पड़ता है। दैवी शक्तियां परीक्षा तो लेती है, पर पात्रता की कसौटी पर खरा सिध्द होने वालों को मुक्त हस्त से अनुदान भी देती है।Posted at 15 Nov 2018 by admin
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