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भगवान के प्रति विशुद्ध अनन्य प्रेम
राधे राधे प्रेम का साधारण स्वरुप यह है—एक भगवान् के सिवा अन्य किसी में किसी समय भी आसक्ति न हो, प्रेम की मग्नता में भगवान् के सिवा अन्य किसी का ज्ञान ही न रहे। जहाँ-जहाँ मन जाय वहीं भगवान् दृष्टिगोचर हों। यों होते-होते अभ्यास बढ़ जानेपर अपने-आप की विस्मृति होकर केवल एक भगवान् ही रह जायँ। यही विशुद्ध अनन्य प्रेम है। परमेश्वर में प्रेम करने का हेतु केवल परमेश्वर या उनका प्रेम ही हो—प्रेम के लिए ही प्रेम किया जाय, अन्य कोई हेतु न रहे। मान-बड़ाई, प्रतिष्ठा और इस लोक तथा परलोक के किसी भी पदार्थ की इच्छा की गन्ध भी साधक के मन में न रहे, त्रैलोक्य के राज्य के लिए भी उसका मन कभी न ललचावे। स्वयं भगवान् प्रसन्न होकर भोग्य-पदार्थ प्रदान करने के लिए आग्रह करें तब भी न ले। इस बात के लिए यदि भगवान् रूठ जायँ तो भी परवा न करे। अपने स्वार्थ की बातें सुनते ही उसे अतिशय वैराग्य और उपारामता हो। भगवान् की ओर से विषयों का प्रलोभन मिलनेपर मन में पश्चात्ताप होकर यह भाव उदय हो कि ‘अवश्य ही मेरे प्रेम में कोई दोष है, मेरे मनमें सच्चा विशुद्ध भाव होता और इन स्वार्थ की बातों को सुनकर यथार्थ में मुझे क्लेश होता तो भगवान् इनके लिए मुझे कभी न ललचाते।’ विनय, अनुरोध और भय दिखलाने पर भी परमात्मा के प्रेम के सिवा किसी भी हालत में दूसरी वस्तु स्वीकार न करे, अपने प्रेम-हठ पर अटल-अचल रहे। वह यही समझता रहे कि भगवान् जबतक मुझे नाना प्रकार के विषयों का प्रलोभन देकर ललचा रहे हैं और मेरी परीक्षा ले रहे हैं, तबतक मुझमें अवश्य ही विषयासक्ति है। सच्चा-प्रेम होता तो एक अपने प्रेमास्पद को छोड़कर दूसरी बात भी मैं नहीं सुन सकता। विषयों को देख, सुन और सहन कर रहा हूँ। इससे यह सिद्ध है कि मैं सच्चे-प्रेम का अधिकारी नहीं हूँ, तभी तो भगवान् मुझे लोभ दिखा रहे हैं। उत्तम तो यह था कि मैं विषयों की चर्चा सुनते ही मूर्छित होकर गिर पड़ता। ऐसी अवस्था नहीं होती, इसलिए निःसंदेह मेरे हृदय में कहीं-न-कहीं विषयवासना छिपी हुई है। यह है विशुद्ध प्रेम के ऊँचे साधन का स्वरुप।

ऐसा विशुद्ध प्रेम होनेपर जो आनन्द होता है कि उसकी महिमा अकथनीय है। ऐसे प्रेम का वास्तविक महत्त्व कोई परमात्मा का अनन्य प्रेमी ही जानता है। प्रेम की साधारणतः तीन संज्ञाएँ है—गौण, मुख्य और अनन्य। जैसे नन्हे बछड़े को छोड़कर गौ वन में चरने जाती है, वहाँ घास चरती है, उस गौ का प्रेम घास में गौण है; बछड़े में मुख्य है और अपने जीवन में अनन्य है, बछड़े के लिए घास का एवं जीवन के लिए वह बछड़े का भी त्याग कर सकती है। इसी प्रकार उत्तम साधक सांसारिक कार्य करते हुए भी अनन्य-भाव से परमात्मा का चिन्तन किया करते हैं। साधारण भगवत्प्रेमी साधक अपना मन परमात्मा में लगाने की कोशिश करते हैं; परन्तु अभ्यास और आसक्तिवश भजन-ध्यान करते समय भी उनका मन विषयों में चला ही जाता है। जिनका भगवान् में मुख्य-प्रेम है वे हर समय भगवान् को स्मरण रखते हुए समस्त कार्य करते हैं और जिनका भगवान् में अनन्य-प्रेम हो जाता है उनको तो समस्त चराचर विश्व एक वासुदेवमय ही प्रतीत होने लगता है। ऐसे महात्मा बड़े दुर्लभ हैं (गीता ७। १९)।

इस प्रकार अनन्य प्रेमी भक्तों में कई तो प्रेम में इतने गहरे डूब जाते हैं कि वे लोकदृष्टि में पागल-से दीख पड़ते हैं। किसी-किसी की बालकवत् चेष्टा दिखायी देती है। उनके सांसारिक कार्य छूट जाते हैं। कई ऐसी प्रकृति के भी प्रेमी पुरुष होते हैं जो अनन्य प्रेम में निमग्न रहनेपर महान भागवत श्रीभरतजी की भांति या भक्तराज हनुमान जी की भांति सदा ही ‘रामकाज’ करने को तैयार रहते हैं। ऐसे भक्तों के सभी कार्य लोकहितार्थ होते हैं। ये महात्मा एक क्षण के लिए भी परमात्मा को नहीं भुलाते, न भगवान् ही उन्हें कभी भुला सकते हैं। भगवान् ने कहा ही है—
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।।
(गीता ६। ३०)

जो भगवान् का भक्त बनना चाहता है, उसे सबसे पहले अपना हृदय शुद्ध करना चाहिये और नित्य एकान्त में भगवान् से यह कातर प्रार्थना करनी चाहिये कि ‘हे भगवन् ! ऐसी कृपा करो जिससे मेरे हृदय में तुम्हें हर घड़ी हाजिर देखकर तनिक-सी पापवासना भी उठने और ठहरने न पावे ! तदन्तर उस निर्मल हृदय-देश में तुम अपना स्थिर आसन जमा लो और मैं पल-पल में तुम्हे निरख-निरखकर निरतशय आनन्द में मग्न होता रहूँ !’

श्रोता : जब तक क्रिया होगी, तबतक तो दुःखी होते रहेंगे !

स्वामीजी : भले ही दुःखी हो जाओ या सुखी हो जाओ, पर दुःख में भी आप वही रहते हो, सुख में भी आप वही रहते हो । सुख-दुःख तो होते हैं, पर आप रहते हो । साफ और सीधी बात है ! यह अन्वेषण है, निर्माण नहीं है । संसार का काम देरी से होता है, उसमें समय लगता है, पर इसमें समय नहीं लगता । आज मैंने जो बात कही है, उसको समझने में क्या वर्ष लगता है ? हाँ, आप मान लोगे कि समय लगेगा तो जरूर समय लगेगा; क्योंकि आप और हम भगवान्‌रूपी कल्पवृक्ष के नीचे हैं । अगर आप मान लें कि ये राग-द्वेषादि मेरे में हैं ही नहीं तो समय लगने की क्या बात है ? कही और चट मानी ! सीधी बात है । सत्संग में आनेवाले भाई-बहनों की कई बातें मैंने सुनी हैं । जो पहले रोते थे, कुछ दिन सत्संग में आनेके बाद उनका रोना बन्द हो गया ! तात्पर्य है कि सत्संग की बातों में एक ताकत है । यह कोई तमाशा नहीं है । परन्तु आप तो कमर कसकर तैयार हैं कि कुछ भी कहो, हम तो नहीं मानेंगे ! अब बताओ, मैं क्या करूँ ? आपको नहीं जँचती हो तो शंका करो । आप कहते हैं कि हमारेपर असर पड़ जाता है । इन्द्रियाँ और उनके विषयों का सम्बन्ध होते ही असर पड़ता है । किसी के राग-द्वेष ज्यादा होते हैं, किसी के कम होते हैं । सबके अलग-अलग संस्कार हैं, अलग-अलग अभ्यास है । परन्तु असर पड़नेपर भी ‘राग-द्वेष हमारे में हैं’‒यह आपने किस आधारपर माना ? इनको आप अपने में मानोगे तो कहनेवाला कितना ही जोर लगा ले, आपमें रत्तीमात्र भी फर्क नहीं पड़ेगा । चोर-डाकू तो जबर्दस्ती करते हैं, उनको आप निमन्त्रण दे दो तो फिर वे सवार हो ही जायेंगे ! ऐसे ही आपने राग-द्वेष को अपने में मान लिया, उनको निमन्त्रण दे दिया तो अब वे जायँगे नहीं ।

श्रोता : मृत्यु के बाद राग-द्वेष के संस्कार तो रह ही जाते हैं !

स्वामीजी : मृत्यु ही क्या, चौरासी लाख योनियाँ और नरक भोग लो तो भी राग-द्वेष मिटेंगे नहीं; क्योंकि इनको आपने अपने में मान लिया, अब आप मिटो तो ये मिटें ! आप नित्य परमात्मा के अंश हो; अतः आप जिसको पकड़ोगे, वह भी नित्य दीखने लग जायगा ! आग में ठीकरी रख दो, कंकड़ रख दो, लकड़ी रख दो, कोयला रख दो, सब चमकने लगेंगे । ऐसे ही आप जिसको अपने में मान लोगे, वह चमकने लग जायगा । राग-द्वेष नित्य नहीं हैं, पर आप नित्य हो; अतः आप राग-द्वेष को अपने में मान लोगे तो वे भी नित्य दीखने लग जायँगे।

भगवान् के मिलने के बहुत-से उपायों में से सर्वोत्तम उपाय है ‘सच्चा प्रेम’। उसी को शास्त्रकारों ने अव्यभिचारिणी भक्ति, भगवान् में अनुरक्ति, प्रेमा भक्ति और विशुद्ध भक्ति आदि नामों से कहा है।

जब सत्संग, भजन, चिंतन, निर्मलता, वैराग्य, उपरति, उत्कट इच्छा और परमेश्वरविषयक व्याकुलता क्रम से होती है तब भगवान् में सच्चा विशुद्ध प्रेम होता है।

शोक तो इस बात का है कि बहुत-से भाइयों को तो भगवान् के अस्तित्व में विश्वास नहीं है। कितने भाइयों को यदि विश्वास है तो भी, तो वे क्षणभंगुर नाशवान विषयों के मिथ्या सुखमें लिप्त रहने के कारण उस प्राणप्यारे के मिलने के प्रभाव को और महत्त्व को ही नहीं जानते। यदि कोई कुछ सुन-सुनाकर तथा कुछ विश्वास करके उसके प्रभाव को कुछ जान भी लेते हैं तो अल्प चेष्टा से ही सन्तुष्ट होकर बैठ जाते हैं या थोड़े–से साधनों में ही निराश-से हो जाया करते हैं। द्रव्य-उपार्जन के बराबर भी परिश्रम नहीं करते।

बहुत-से भाई कहा करते हैं कि हमने बहुत चेष्टा की परन्तु प्राणप्यारे परमेश्वर के दर्शन नहीं हुए। उनसे यदि पूछा जाय कि क्या तुमने फाँसी के मामले से छूटने की तरह भी कभी संसार की जन्म-मरण-रूपी फाँसी से छुटने की चेष्टा की ? घृणास्पद, निंदनीय स्त्री के प्रेम में वशीभूत होकर उसके मिलने की चेष्टा के समान भी कभी भगवान् से मिलने की चेष्टा की ? यदि नहीं, तो फिर यह कहना कि भगवान् नहीं मिलते, सर्वथा व्यर्थ है।

जो मनुष्य शर-शय्यापर शयन करते हुए पितामह भीष्म के सदृश भगवान् के ध्यान में मस्त होते हैं, भगवान् भी उनके ध्यान में उसी तरह मग्न हो जाते हैं। गीता अ० ४ श्लोक ११ में भी भगवान् ने कहा है—

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्थैव भजाम्यहम्।

‘हे अर्जुन ! जो मुझको जैसे भजते हैं मैं भी उनको वैसे ही भजता हूँ।’

भगवान् के निरंतर नामोच्चार के प्रभाव से जब क्षण-क्षण में रोमांच होने लगते हैं, तब उसके सम्पूर्ण पापों का नाश होकर उसको भगवान् के सिवा और कोई वस्तु अच्छी नहीं लगती। विरह-वेदना से अत्यंत व्याकुल होने के कारण नेत्रोंसे अश्रुधारा बहने लग जाती है तथा जब वह त्रैलोक्य के ऐश्वर्य को लात मारकर गोपियों की तरह पागल हुआ विचरता है और जलसे बाहर निकाली हुई मछली के सामान भगवान् के लिए तड़पने लगता है, उसी समय आनंदकंद प्यारे श्यामसुंदर की मोहिनी मूर्ति का दर्शन होता है। यही है उस भगवान् से मिलने का सच्चा उपाय।

यदि किसी को भी भगवान् के मिलने की सच्ची इच्छा हो तो उसे चाहिए कि वह रुक्मिणी, सीता और व्रजबालाओं की तरह सच्चे प्रेमपूरित हृदय से भगवान् से मिलने के लिए विलाप करे।Posted at 23 Apr 2020 by admin
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