एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः।। अर्.....
 
गीता में सगुण-निर्गुण उपासना
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः।।

अर्जुन बोलेः 'जो अनन्यप्रेमी भक्तजन पूर्वोक्त प्रकार से निरन्तर आपके भजन-ध्यान में लगे रहकर आप सगुणरूप परमेश्वर को।

और दूसरे जो केवल अविनाशी सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म को ही अतिश्रेष्ठ भाव से भजते हैं-उन दोनों प्रकार के उपासकों में अति उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?'

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते में युक्ततमा मताः।।

श्री भगवान बोलेः 'मुझमें मन को एकाग्र करके निरन्तर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझ सगुणरूप परमेश्वर को भजते हैं, वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं।'

अर्जुन प्रश्न करते है कि सगुण साकार का उपासक श्रेष्ठ है कि निर्गुण निराकार का उपासक श्रेष्ठ है? यह केवल अर्जुन का ही प्रश्न नहीं है।

आज भी मानव के मन में ये प्रश्न उठते रहते हैं कि साकार भगवान की उपासना ठीक है कि निराकार की उपासना ठीक है? यह प्रश्न तो ऐसा हैः अमृत के सागर का स्वाद ठीक है कि अमृत के आचमन का स्वाद ठीक है? स्वाद दोनों का एक है।

सुवर्ण के बड़े पर्वत का कस और एक टुकड़े का कस, ये दोनों एक प्रकार के होते हैं, ऐसे ही खण्ड और अखण्ड दोनों के उपासकों को रस आता हैखण्डवाला प्रारम्भ है और अखण्डवाला अंत है।

लेकिन प्रश्न उपासना का हैः निर्गुण निराकार की उपासना श्रेष्ठ है कि सगुण साकार की उपासना श्रेष्ठ है?

अक्षर की उपासना श्रेष्ठ है कि क्षर की उपासना श्रेष्ठ है? अक्षर माने जो क्षर न होता हो, परिवर्तित न होता हो, बदलता न हो।

उस अक्षर निर्गुण की उपासना श्रेष्ठ है कि रूपलावण्य और माधुर्य से भरे हुए लीला-पुरुषोत्तम, मर्यादा पुरुषोत्तम इष्टदेव के श्रीविग्रह स्वरूप का चिन्तन-भजन श्रेष्ठ है?

सच पूछो तो हर व्यक्ति की अपनी क्षमता, अपनी योग्यता होती है।

आप आश्रम में बैठे हैं। आपको यदि नदी के उस पार जाना हो तो नाव ठीक है और शहर में जाना हो तो स्कूटर उत्तम है।

नदी पार करने में स्कूटर का काम नहीं और शहर में जाने के लिए नाव उपयोगी नहीं।

सूरत से सिरोही जाना हो तो बस उत्तम है और दिल्ली जाना हो तो ट्रेन उत्तम है। यहाँ से अमेरिका जाना हो तो हवाई जहाज उत्तम है।

आपके पास पर्याप्त धन है तो हवाई जहाज ठीक है। अन्यथा स्टीमर आपके लिए उत्तम है। हर व्यक्ति की अपनी-अपनी योग्यता होती है।

साइकिल कार की गति से नहीं भाग सकती और कार साइकिल की तरह सँकरी गलियों में नहीं चलायी जाती।

ऐसे ही जिसके चित्त की जितनी तीव्रता हो, जितनी क्षमता हो, ग्रहणशक्ति हो, तड़प हो उसके लिए उस प्रकार का साधन उत्तम माना गया है।

साधनों के बारे में जिनको वाद-विवाद है वे साधन को प्राधान्य देते हैं और साधनकर्त्ता को गौण मानते हैं, उनके लिए साधक के जीवन की कोई कीमत नहीं।

वास्तव में साधनकर्त्ता की योग्यता को ध्यान में रखते हुए साधन का निर्णय होना चाहिए, सब साधन अपनी-अपनी जगह पर उत्तम हैं, श्रेष्ठ हैं।

एक माँ के चार बेटे हैं। स्कूल-कालेज में जाने वाले बेटे को जलेबी दूध में भिगोकर देती है, उस बेटे को मस्तिष्क का काम करना है इसलिए उसको दूध, घी, मक्खन, बादाम आदि जरूरी है।

दूसरा बेटा हल चलाने खेत में जाता है, माँ उसके लिए मोटी रोटी बना देती है। साथ में अचार और प्याज रख देती है। गरम गरम लू चल रही है, अतः प्याज उसके लिए उत्तम है।
तीसरे बच्चे ने जुलाब के लिए एनीमा लिया है। उसके लिए पतली खिचड़ी तैयार है।

चौथा बच्चा सबसे छोटा है। उसका हाजमा बिल्कुल कमजोर है। माँ उसको जलेबी नहीं देती, रोटी और प्याज नहीं देती, पतली खिचड़ी भी नहीं देती। उसके लिए बकरी का हल्का दूध ही उत्तम है।

माँ तो एक है, सबको पुष्ट करने की भावना है फिर भी चारों बेटों की अलग-अलग योग्यता के अनुसार अलग-अलग खुराक देती है।

ऐसे ही माँ की भी माँ और बाप के भी बाप जो परमात्मा है वे तो एक और अद्वितिय हैं और हम उनके लिए बच्चों जैसे हैं।

हमारे चित्त की अलग-अलग योग्यताओं के अनुसार साधन-सामग्री अलग-अलग है, हम सबको आत्मानंद की तृप्ति तो चाहिए ही।

जैसे उन बेटों को अपने प्राणों की भूख मिटानी है वैसे हम लोगों को, सुख के लिए तड़पते हुए जीवों को परम सुख प्राप्त करके मन की भूख मिटानी है।Posted at 23 Apr 2020 by admin
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