मनुष्य का स्वभाव है कि वो भगवान के बारे मे सबकुछ स्थूल रूपी 5 इंद्रियों से देखना चाहता है । लेकिन.....
 
मनुष्य नास्तिक और कुतर्की क्यो होता है?
मनुष्य का स्वभाव है कि वो भगवान के बारे मे सबकुछ स्थूल रूपी 5 इंद्रियों से देखना चाहता है । लेकिन यह संभव नहीं है । जैसे आप आप इन आंखो से अणु या परमाणु को देख नहीं सकते है वैसे ही हम इस बुद्धि से भगवान के सिधान्त को समझ नहीं सकते है । मनुष्य इन स्थूल रूपी इंद्रियों से देख नहीं पाता है तो कुतर्की हो जाता है वो नास्तिक हो जाता है । वो समझता है कि इस संसार मे भगवान नाम की कोई चीज़ ही नहीं है । जो दिखाई दे रहा है उसी को प्रकृति का रूप समझकर नास्तिक हो जाता है । तथा अपना विनाश और ज्यादा बड़े रूप शुरू कर देता । जिसको भगवान का डर नहीं होता है वो मनुष्य और ज्यादा नीच कर्म करना प्रारम्भ कर देता है ।

भगवान को समझने के लिए मनुष्य को तपस्या के द्वारा बुद्धि और 5 इंद्रियों को महान बनाना चाहिए । जब आपकी इंद्रियाँ और बुद्धि सूक्ष्म हो जाएगी तो आप भगवान को समझना शुरू कर पाओगे ।

चित 5 प्रकार के होते है
ये 5 प्रकार के चित हमारे जन्म के साथ ही पैदा होते है । इन चितों के अनुसार ही हमारा कर्म निश्चित हो जाता है । कहते है होनहार विरमान के होत चीकने पात । जिसका चित उन्नत होता है वो बालक भक्त प्रह्लाद या बालक ध्रुव की तरह ज्ञान वान हो जाता है ।
1- मूढ़ अवस्था का चित -
यह चित तमोगुण प्रधान होता है । ऐसे चित नीच मनुष्यो के होते है जो काम ,क्रोध , लोभ और मोह मे फसे रहते है । इनकी प्रव्रति अज्ञान , अधर्म , राग द्वेष और अनिश्चिता मे रहती है । ये लोग नास्तिक और कुतर्की होते है । जैसे राजा कंस और दुर्योधन
2- क्षिप्त अवस्था का चित -
यह चित रजोगुणी होता है । ऐसे चित वाले मनुष्य कभी भगवान को मानते है तो कभी भगवान को गालियां देते है । ऐसे लोग हमेशा द्वन्ध मे फसे रहते है । इसको अगर अच्छा गुरु मिल जाये तो पूर्ण आस्तिक हो जाते है । जैसे वीर अर्जुन
3- विक्षिप्त अवस्था का चित -
यह चित सतोगुणी होता है । ऐसे चित वाले मनुष्य निष्काम कर्म करने वाले , काम , क्रोध , लोभ और मोह से दूर रहते है । ये पूर्ण रूप से आस्तिक होते है इनका भगवान मे पूर्ण विश्वास होता है । जैसे राजा युधिष्टर
4- एकाग्र अवस्था का चित -
ऐसे चित वाले मनुष्य हमेशा एक ही चीज़ परम ब्रह्मा को सोचते रहते है । ऐसे लोग योगी बन जाते है । तथा समाधि मे लीन हो जाते है । जैसे बालक प्रह्लाद और बालक ध्रुव
5- निरुद्ध अवस्था का चित -
ऐसे चित वाले मनुष्य बहुत उच्च कोटी की आत्मा वाले होते है । ये बहुत यश प्राप्त करने के बाद वैराग्य मे चले जाते है । जैसे महात्मा बुद्ध राजा जनक और महाराज विश्वामित्र ।
इसलिए चित पर किसी का अधिकार नहीं है यह तो सिर्फ उन्नत कर्म करके ठीक किया जा सकता है । इसलिए यह सब पूर्वजन्म का खेल होता है । इसको इस जन्म मे सुधार सकते हो ।Posted at 15 Nov 2018 by admin
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