मंत्र परमात्मा का नाम है, वाचक है, सम्बोधन है, नाम-जप से मिलनेवाली स्थिति है। परमात्मा का बोध करा.....
 
मंत्र क्या है?
मंत्र परमात्मा का नाम है, वाचक है, सम्बोधन है, नाम-जप से मिलनेवाली स्थिति है।

परमात्मा का बोध करानेवाले किसी दो-ढाई अक्षर के नाम को चार श्रेणियों से जपा जाता है, आरम्भ बैखरी से है, इससे उन्नत क्रमश: मध्यमा, पश्यन्ती और परा की श्रेणियाँ हैं।

वायु से भी तीव्र गति से चलनेवाला मन परावाणी के प्रवेशकाल में सब ओर से सिमटकर नाम के अन्तराल में स्थान पा जाता है, तब यह साधारण-सा नाम मंत्र की संज्ञा पा जाता है, मंत्र एक अवस्था है, ‘मन अंतर स मंत्र’-जिससे अपने अन्तराल में मन स्थिर हो जाय, मंत्र है।

मन विषयों से कभी तृप्त नहीं होता ‘जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई।’ (मानस, ६/१०१/१)।

विषयों में विचरते हुए यह मन कभी स्थिर नहीं होगा, नाम को मंत्र बनाने के लिए श्रद्धा के साथ प्रभु के नाम का जप करें।

श्रद्धा के बिना तो कुछ होता ही नहीं और इसका सार्थक प्रयोग मंत्रजप में है, सृष्टि में अन्यत्र कहीं नहीं।

लोक-व्यवहार में माता-पिता, गुरुजनों या उच्चाधिकारियों के प्रति श्रद्धा का प्रदर्शन देखने को मिलता है जिसके मूल में स्वार्थ ही प्रधान है, पत्नी इसीलिए पति में श्रद्धा रखती है किन्तु स्वार्थ पूर्ति में विघ्न आते ही श्रद्धा तिरोहित हो जाती है।

वास्तविक श्रद्धा परमात्मा या सद्गुरु के प्रति ही होती है; क्योंकि ‘हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी।।’ (रामचरितमानस, ७/४६/५)

भगवान श्रीकृष्ण ने ‘गीता’ में कहा–

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह।।
(१७/२८)

अर्जुन! बिना श्रद्धा के होमा हुआ हवन, दिया दान, तपा तप– सब व्यर्थ चला जाता है, जैसे कुछ हुआ ही नहीं और ‘श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानंतत्पर: संयतेन्द्रिय:।’ (५/३९)

परमात्मा के प्रति सर्मिपत उस ज्ञान को प्राप्त कर लेता है जिसे पाने के बाद कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता, इसलिए प्रभुनाम के जप में श्रद्धा प्रथम अनिवार्य शर्त है।

मंत्र शारीरिक विकारों के शमन में सहायक है। स्वस्थ शरीर के लिए मन का निरोग रहना आवश्यक है मंत्र मानसिक विकारों की मनोचिकित्सा है।

यह मन को समेटकर प्रभु की ओर प्रवाहित करता है जिससे शारीरिक, मानसिक समस्त दु:खों से सदा-सदा के लिए छुटकारा मिल जाता है।

मंत्रजप भजनसुमिरन का एक अंग है जिससे नैतिक मूल्यों की वृद्धि के साथ किसी राष्ट्र के उज्ज्वल चरित्र का निर्माण भी होता है।

सृष्टि में जप का एक ही नियत विधान है इसलिए सबका प्रिय एक ही जप है, एक परमात्मा के प्रति श्रद्धा और उनको जो सीधा पुकारे, उस किसी एक नाम का जप।

ईश्वर-पथ की आधी दूरी तक प्रभु का कोई भी नाम ठीक है किन्तु अन्त में जप के लिए केवल एक नाम ‘ओम्’ है।

‘ओ’ अर्थात् वह अविनाशी परमात्मा, ‘अहं’ अर्थात् आप स्वयं! इस प्रकार ‘ओम्’ से वह प्रभु ध्वनित होते हैं जिनका निवास आपके हृदय में है। ‘ओम्’ जप का आदि नाम है और भगवान के श्रीमुख से सीधा प्रसारित हुआ है।

ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृत:।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिता:पुरा।।
(गीता, १७/२३)

अर्जुन! ओम्, तत् और सत् परमात्मा के नाम हैं जो परब्रह्म परमात्मा के मुख से प्रसारित हुए हैं। इसी के द्वारा यज्ञ, वेद और ब्राह्मण रचे गये। ब्राह्मण जन्मता नहीं, ब्राह्मण एक संरचना है।

ओम् भी परमात्मा के मुख से प्रसारित हुआ है। आदि मंत्र वही है। सृष्टि में प्रथम प्रकट होनेवाला शास्त्र गीता है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, इस अविनाशी योग को मैंने सृष्टि के आदि में सूर्य से कहा। सूर्य ने महाराज मनु से कह, मनु महाराज ने स्मृति-परम्परा से इसे इक्ष्वाकु से कहा।

इक्ष्वाकु से रार्जिषयों ने जाना। वह लुप्त हो चला तो मैं इसे तेरे प्रति कह रहा हूँ (गीता, ४/१)। इस आदि शास्त्र गीता में भी भगवान ने ओम् जपने का निर्देश दिया।

मनु दीर्घजीवी थे, उन्होंने एक प्रलय देखा था, भगवान ने उनकी परीक्षा ली, संतुष्ट होकर उन्होंने कहा- मनु, तुम्हारी सृष्टि को मैं बचा लूँगा।

एक नौका में सृष्टि के बीज रख लो, प्रलय आने पर मैं मत्स्य रूप में आऊँगा, मेरे सिर पर एक सींग होगा, उस सींग से नाव को सुदृढ़ रस्सी से बाँध देना।

नाव उत्ताल तरंगों पर चलने लगी तो मत्स्य भगवान के रूप में परिर्वितत हो गया और उससे वेद उच्चरित होने लगे।

प्रलय का अन्त होते-होते मनु ने चार वेदों को एकत्र कर लिया जिसे सुनने के कारण मनु ने उनका नाम ‘श्रुति’ रखा।

ये वेद गीता के ही विस्तार हैं और ओम् शब्द पर आधारित हैं, इस प्रकार ओम् आदि नाम है, तत् का अर्थ है वह परमात्मा और सत् अर्थात् वही एक सत्य है, अन्य कुछ नहीं।

तीनों नामों का अर्थ एक ही है। इससे आप समझ ही गये होंगे कि हमने भी ओम् का ही जप किया है।

दुनिया में सभी दु:खों से बचने का ही प्रयास कर रहे हैं किन्तु दु:ख बढ़ता ही जाता है, (राजा दुखिया, परजा दुखिया ) दु:खों का निवारण मात्र परमात्मा की प्राप्ति से है।

जिसकी साधना मंत्रजप से आरम्भ होती है, भगवत्पथ के चार क्रमोन्नत सोपान नाम, रूप, लीला और धाम हैं, आप जब नाम जपना आरम्भ करेंगे तब रूप का क्रमोन्नत स्तर मिल जायेगा।

‘सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें।
आवत हृदयँ सनेह बिसेषें।।’ (रामचरितमानस, १/२०/६)

विशेष स्नेह की डोर लग जायेगी तो हृदय में स्वरूप आ जायेगा, उसी का ध्यान करना है, जहाँ रूप पकड़ने की क्षमता आयी तहाँ लीला समझ में आने लगेगी कि भगवान कण-कण में कैसे व्याप्त हैं, कैसे ज्योतिर्मय हैं, कैसे योगक्षेम करते हैं, कैसे मनुष्यों की आपूर्ति करते हैं।

इस प्रकार उनकी विभूतियों का प्रसारण होने लगता है, उस निर्देशन में चलते हुए जहाँ लीलाधारी का स्पर्श हुआ, जहाँ बैठकर वह संचालन कर रहे हैं, तहाँ धाम अर्थात् स्थिति प्राप्त कर भगवद्दर्शन और प्रवेश मिल जाता है।

साधना के ये चारों क्रमोन्नत सोपान हैं जिनमें मंत्र-जप का सर्वप्रथम स्थान है, क्रमश: स्तर उठता जायेगा, दु:ख पीछे छूटते जायेंगे, सहज सुखराशि प्रभु हैं उनमें स्थान मिलता जायेगा।

दुनिया ‘दु:खालयमशाश्वतम्’ (गीता, ८/१५) दु:खों का घर है। कभी यह तो कभी वह सुखद प्रतीत होता है, वाह्य अन्य तरीकों से यह कमी कभी पूर्ण नहीं होगी !!!!
जय श्री कृष्ण !!!Posted at 15 Nov 2018 by admin
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