भारतीय समाज मर्यादाओं में जीने वाला संसार का सबसे श्रेष्ठ समुदाय है, जो जन्म से लेकर मृत्यु तक .....
 
भारतीय समाज (संस्कार और परंपराए)
भारतीय समाज मर्यादाओं में जीने वाला संसार का सबसे श्रेष्ठ समुदाय है, जो जन्म से लेकर मृत्यु तक संस्कारों और परंपराओं में बंधा हुआ है।

यही हमारी पहचान और खूबी है, यही हमारा सबसे बड़ा आभूषण है। विवाह हमारी संस्कृति का सबसे उजला पक्ष है।

पाश्चात्य संस्कृति में विवाह को एग्रीमेंट, कांटेक्ट या डील कहा जाता है, जो 7 दिन, 7 सप्ताह या 7 माह में ही बिखर जाते हैं, जबकि भारत भूमि में विवाहित सात जन्मों का पवित्र बंधन माना गया है, रुक्मिणी विवाह नारी के कल्याण और मंगल भाव का सूचक है।

भक्ति, भगवान और भक्त को मिलाने का सहज माध्यम है, लेकिन केवल माला जपने या तिलक-छापा लगा लेने से ही कोई व्यक्ति भक्त नहीं बन जाता।

जप-तप, साधना, पूजा-आराधना भी भक्ति के ही स्वरूप हैं। सच्ची भक्ति वह होती है जिसमें पवित्र मन एवं निर्मल बुद्धि से हम भगवान को अपना मानें, मैं भगवान का हूं और भगवान मेरे हैं, यह दृृढ़ विश्वास भक्ति का पहला लक्षण है।

पाखंड और प्रदर्शन से की गई भक्ति फलीभूत नहीं हो सकती। श्रद्धा-विश्वास भक्ति के दो अनिवार्य तत्व हैं।

भक्ति से क्रोध पर नियंत्रण रखना चाहिए, क्रोध आने पर ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है, तनाव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है, इसलिए सदा शांत रहें, भगवान के सामने जब भी जाएं, आंखें खोलकर जाएं, अकेले में बैठें तो आंखें बंद कर ध्यान करें।

जीवन की विभिन्न समस्याओं में मौन का प्रयोग बहुत कारगर सिद्ध होता है, मौन मन को एकाग्र करता है, इसके प्रयोग से अंतर्मन में स्थित सत्य और विवेक के उन आदर्शों को अपनाने में सहायता मिलती है, जो शब्दों के कोलाहल में अमूमन दब से जाते हैं।

कहा जाता है कि सुख-दुख इंसान के कर्मों के फल हैं, वह जैसा बीज बोता है उसे वैसा ही फल मिल जाता है, वास्तु, अध्यात्म और ज्योतिष आदि में सफल व सुखी जीवन के सूत्र इसीलिए बनाए गए हैं ताकि मनुष्य शुभ काम करे और उसे शुभ फल प्राप्त हो।

अनजाने में किए गए कुछ कार्य उसके दुख का कारण भी बन सकते हैं, सभी शास्त्र ऐसे कार्यों से दूर रहने का उपदेश देते हैं। Posted at 23 Apr 2020 by Admin
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