मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन एवं मानव समाज में सुख-शाँति की परिस्थितियां किस आधार पर बनेंगी यदि इस .....
 
मनुष्यता (मानवता)
मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन एवं मानव समाज में सुख-शाँति की परिस्थितियां किस आधार पर बनेंगी यदि इस प्रश्न का संक्षिप्त सा उत्तर दिया जाये, तो वह होगा मनुष्य में मनुष्यता विकास से।

इसी को प्रकारांतर से व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास भी कह सकते हैं। व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का तात्पर्य मात्र शारीरिक स्वस्थता एवं बौद्धिक प्रखरता के युग्म को मानना भूल होगी।

इसका सही व स्वस्थ स्वरूप सामाजिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों को व्यक्तित्व में विकसित करने से प्रकट होता है।

मानवी समाज में व्यक्ति के भिन्न-भिन्न स्तर दिखाई देते हैं, एक से काय-कलेवर के होते हुए भी गुण, कर्म स्वभाव का अंतर ही एक की अपनी अलग पहचान बना देता है।

मानवी मूल्यों की अवहेलना कर उलटी राह पर चलने वाले नर पशु, नर पिशाच की श्रेणी में गिनें जाते हैं। तो साँस्कृतिक एवं सामाजिक आदर्शों के अनुरूप जीवन पद्धति पर चलने वाले महा-मानव की श्रेणी में जा विराजते हैं।

मनोवैज्ञानिकों के अन्दर जिज्ञासा बराबर बनी रही है कि परिपक्व व्यक्ति की पहचान क्या है?उसके सही लक्षण क्या हैं?

व्यक्ति की परिपक्वता, अपने गुणों के विस्तार एवं कमियों को खुले दृष्टिकोण से स्वीकार कर सुधारने की वृत्ति के साथ आती है।

एक परिपक्व व्यक्ति के जीवन दर्शन में एकरूपता का समावेश होता है, उसके अन्तस् में मानव मात्र के कल्याण की भावना विकसित होती है, जिसके आधार पर वह समता, सौहार्द, सहयोग तथा मैत्री पूर्ण व्यवहार करता दिखाई देता है।

हर व्यक्ति आत्म सिद्धि प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर है, यही उसकी समस्त क्रियाओं की अभिप्रेरणा है। किन्तु जब तक व्यक्ति अपने में सादगी, शालीनता, सच्चरित्रता जैसे आध्यात्मिक गुणों का विकास नहीं कर लेता उसके व्यक्तित्व में परिपक्वता और सर्वांगीण उन्नति नहीं आती।

आत्म सिद्धि उसके बाद का अगला चरण है, इस प्रकार का व्यक्तित्व जीवन और समाज के यथार्थ को भली भाँति ग्रहण करता है, उसके जीवन में अधिक सहजता होती है।

वह जीवन की समस्याओं को तटस्थ होकर समझता है और उनका समाधान ढूँढ़ता है, स्वयं समस्याओं से प्रभावित नहीं होता।

ऐसे व्यक्तित्व की परिकल्पना में और गीता के समत्व भाव से युक्त पुरुष में कोई अंतर नहीं है। Posted at 23 Apr 2020 by Admin
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