यदि मनुष्य नश्वर हैं तो हम अनंत अस्तित्व, ज्ञान और आनंद की इच्छा क्यों रखते हैं? अस्तित्व, ज्ञा.....
 
अस्तित्व, ज्ञान और आनंद
यदि मनुष्य नश्वर हैं तो हम अनंत अस्तित्व, ज्ञान और आनंद की इच्छा क्यों रखते हैं?

अस्तित्व, ज्ञान और आनंद की विशेषताओं से रहित मनुष्य, अनंतकाल तक पूर्ण ज्ञान और पूर्ण आनंद प्राप्त करने के लिए, तार्किक रूप से इस दुनिया में जीने की इच्छा व्यक्त नहीं कर सकता है।

भौतिक शरीर के अस्तित्व के अलावा आप सीधे मन, बुद्धि और विकृत अहंकार का अस्तित्व भी महसूस कर सकते हैं, हम एक सीमित प्रकृति के हैं, हमारी मानसिक और बौद्धिक क्षमता भी सीमित है।

विकृत अहंकार का अस्तित्व विशेष विचारों की उपस्थिति से माना जा सकता है जैसे कि वह इस या उस देश का निवासी है; वह दूसरी जाति का है; यह वह भाषा बोलता है या वह व्यक्ति इस या उस समूह के लोगों में से एक है- जो भी हो।

यह सवाल उठाया जा सकता है कि भौतिक शरीर की मृत्यु के बाद क्या किसी भी तरह कि राष्ट्रीयता, धार्मिक या भाषा समूहों का अस्तित्व बरक़रार रहता है।

वास्तव में यहाँ यह पूछना प्रासंगिक हो सकता है कि क्या सब कुछ नष्ट हो जाता है? या मन, बुद्धि और विकृत अहंकार वाले किसी सूक्ष्म शरीर का अस्तित्व कायम रहता है।
या इससे भी आगे एक शाश्वत शरीर का अस्तित्व,मनुष्य अच्छे और बुरे, शाश्वत और गैर शाश्वत के बीच फर्क कर पाने के गुण के कारण जीवित प्राणियों में सबसे श्रेष्ठ है।

भौतिक शरीर जन्म और मृत्यु की पकड़ में है और साथ ही साथ कई अन्य कमियों के अधीन भी, यह भौतिक शरीर को गैर शाश्वत के रूप में पेश करता है।

यदि यह भौतिक शरीर गैर शाश्वत है तो शरीर की इंद्रियों को भी गैर शाश्वत होनी चाहिए और जो कुछ भी गैर शाश्वत इंद्रियों द्वारा प्राप्त होता है उसे भी गैर शाश्वत होना चाहिए।

इसलिए यदि कोई शाश्वत इकाई मौजूद है भी तो उसे हमारे शरीर की गैर शाश्वत इंद्रियों की समझ से परे होना चाहिए।

महाभारत में अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्राप्त था, जिससे वह कृष्ण के चकित कर देने वाले विश्वरूप अवतार को देख पाए थे, जब कृष्ण ने अपना विराट रूप दिखाया था उस समय कुरुक्षेत्र में हजारों लोग मौजूद थे।

लेकिन यह अवतार केवल अर्जुन को ही क्यों नज़र आया था? ईश्वर अनंत है; उसके बारे में सब कुछ अनंत है, उसने अनगिनत प्रजातियों को किसी योजना के तहत बनाया है।

यदि हम यह स्वीकार करते हैं कि मनुष्य को उसकी इंद्रियों, मन या बुद्धि के आधार पर जाना जा सकता है तो यह एक मानसिक रूप से या बौद्धिक रूप से मनगढ़ंत बात होगी, यह वास्तविकता नहीं हो सकती।

क्योंकि, यदि वास्तविकता में तथ्य शामिल हैं तो उसकी मौजूदगी हमेशा बनी रहेगी, सच क्या है? हम क्यों शाश्वत होने की कामना करते हैं? हम क्यों आनंद का अनुभव करने या जानने के लिए उत्सुक रहते हैं?

हम परमेश्वर का एक हिस्सा हैं तो हम कुछ हद तक परमेश्वर ही हैं, वह सच्चिदानंद (परमेश्वर) है जो तीन शब्दों ‘सत्’ यानी सत्य ‘चित्’ यानी चेतना और ‘आनंद’ के योग से बना है।

गीता में कृष्ण हमें बताते हैं कि हम वास्तव में केवल एक आत्मा हैं, इस आत्मा को ही सच्चिदानंद कहा जाता है, हमें इस सीमित शरीर को अपनी असली पहचान जानने के लिए दिया गया है।

हमारा कर्तव्य अस्थायी आनंद के बाद लालायित न होकर शाश्वत आनंद प्राप्त करना है,हमें सच्चिदानंद का सेवक बनकर अपनी असली पहचान को जानने के लिए नए तरीके खोजने चाहिए।

हम परमात्मा का हिस्सा हैं। इसलिए उसकी सेवा करना यह हमारा प्रथम उद्देश्य है या हमें कार्य इस प्रकार करने चाहिए जिससे उन्हें खुशी मिले। Posted at 23 Apr 2020 by Admin
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