प्रभु के साथ हमारा व्यवहार वैसा ही होना चाहिए जैसा स्त्री का अपने पति के साथ। जैसे स्त्री अपने प.....
 
भक्ती
प्रभु के साथ हमारा व्यवहार वैसा ही होना चाहिए जैसा स्त्री का अपने पति के साथ। जैसे स्त्री अपने प्रेम और हावभाव से पति को मोहित कर लेती है, वैसे ही हमें भगवान् को अपने प्रेम और आचरण से मोहित कर लेना चाहिये। ()

भगवान का सखा भक्त अपना हदय खोलकर भगवान के सामने रख देता है यानी छल - कपट का सर्वथा त्यागी होता है, सुख -दुःख में वह भगवान की ही सत्- सम्मति चाहता है, भगवान को ही अपना समझता है और अपने घर - द्वार, धन -दौलत सबपर उस सखारूप भगवान का ही निरंकुश अधिकार समझता है। उससे उसका प्रेम स्वाभाविक ही होता है। ()

शास्त्रों में यहाँ तक लिखा है कि पापी-से-पापी मनुष्य भी उतने पाप नहीं कर सकता, जितने पापा का नाश करने की शक्ति भगवन्नाम में है ! वह शक्ति ‘हे मेरे नाथ ! हे मेरे प्रभु !’ इसपुकार में है। इसमें शब्द तो बाहर की वाणी से, क्रिया से निकलते हैं, पर आह भीतर से, स्वयं से निकलती है। भीतर से जो आवाज निकलती है, उसमें एक ताकत होती है। वह ताकत उसकी होती है, जिसको वहपुकारता है। जैसे, बच्चा रोता है और माँ को पुकारता है तो उसका माँ के साथ भीतर से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है, इसलिये माँ ठहर नहीं सकती, दूसरा काम कर नहीं सकती। इसी तरह सच्चे हृदय से भगवन्नाम का उच्चारण करने से भगवान् ठहर नहीं सकते, उनके सब काम छूट जाते हैं ! तात्पर्य है कि भगवन्नाम के जप में एक अलौकिक विलक्षण ताकत है, जिससे जीव का बहुत जल्दी कल्याण हो जाता है। ()

प्रश्न - कभी तो ऐसा मालूम होता है कि हृदय में प्रेम है और कभी ऐसा मालूम होता है कि हृदय सुना है, प्रेम नहीं है। यह क्या है ?
उत्तर - आश्चर्य की बात तो यह है कि मनुष्य संसार पर जितना भरोसा करता है, उतना भगवान् पर नहीं करता। संसार पर भरोसा करके बहुत बार धोखा खाया है। भगवान् पर भरोसा करनेवाले को कभी धोखा नहींहुआ। मनुष्य स्वयं अलग रहकर अपने मन, बुद्धि और इंद्रियों को भगवान् में लगाना चाहता है। भूल यहीं से होती है। प्रेम का सम्बन्ध साधक से है, उसकी बुद्धि, मन व इंद्रियों से नहीं है। परम प्रियतम प्रभु को ही अपना मानें, उसी पर विश्वास करें और उसी से प्रेम करें। मनुष्य अनित्यवस्तुओं से सुख की आशा करके उनमें आसक्त हो गया है। इससे ही वह ईश्वर-प्रेम से विमुख हो गया है। Posted at 15 Nov 2018 by Admin
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