अधिकांश लोग इस भौतिक जगत् से इतना अधिक आसक्त हैं कि उन्हें उन सुखों को प्राप्त करने के अतिरिक्त .....
 
देवताओं की पूजा की उपेक्षा मात्र कृष्ण ही पूजनीय क्यों हैं?
अधिकांश लोग इस भौतिक जगत् से इतना अधिक आसक्त हैं कि उन्हें उन सुखों को प्राप्त करने के अतिरिक्त कुछ और नहीं चाहिए। और वे इन सुखों को शीघ्र से शीघ्र प्राप्त करने हेतु कुछ भी कर सकते हैं। उनकी स्थिति उस छोटे बच्चे के समान है जो दूर की न सोचते हुए पढ़ाई नहीं करता और पूरा समय खेल-कूद में ही व्यतीत कर देता है। वह अभी के सुख का ही सोचता है और अपने भविष्य के बारे में नहीं।

शास्त्रों की तुलना कल्पवृक्ष से की गई है जो भी उनकी शरण में आता है वे उसकी इच्छा को पूरी करते हैं।

अधिकांश लोग धर्म का पालन ही अपनी अनेक भौतिक इच्छाओं की पूर्ति हेतु करते हैं।

यदि शास्त्र भौतिकवादी लोगों को उनकी भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के अवसर प्रदान नहीं करेंगे तो ये लोग अपनी इच्छाओं की पूर्ति बिना किसी रुकावट के करेंगे ही जैसे कि आजकल के अधिकांश लोग कर रहे हैं।

वे किसी शास्त्र या नियमों को नहीं मानते और इस कारण अनेक पाप करते रहते हैं और इस कारणवश उनका भविष्य घोर अंधकार में पड़ जाता है और उन्हें नीचे की योनियों एवं नर्क में अनेक कष्ट भोगने पड़ते हैं।

दूसरी ओर जब कोई शास्त्रों के अनुसार देवताओं की पूजा करते हुए अपनी इच्छाओं की पूर्ति करता है तो वह धीरे-धीरे तप एवं दान का अभ्यास करता है और इस कारण वह अहं (शारीरिक चेतना) एवं मम (मिथ्या स्वामित्व) की भावना से मुक्त होने लगता है।
उदाहरणतः जब कोई इन्द्र देव को आहूति हेतु मंत्र का उच्चारण करता है तो वह कहता है – इन्द्राय स्वाहः इदं न मम् – यह मेरा नहीं है, इसे मैं इन्द्र को अर्पित करता हुँ।

इस प्रकार जब वह अनेक यज्ञ करता रहता है तो धीरे-धीरे वह शारीरिक भौतिक चेतना से ऊपर उठने लगता है।
साथ ही साथ जब देवताओं की उपासना के लिए मंत्रोच्चारण होता है तो उसके प्रारम्भ एवं अन्त में विष्णु के नामों का भी उच्चारण होता है। और धीरे-धीरे उसे इसका भी बहुत लाभ मिलता है।

भगवान् विष्णु के नामों के बार-बार उच्चारण से देवताओं के उपासकों की आध्यात्मिक चेतना धीरे-धीरे जागृत होने लगती है और अनेक जन्मों के उपरान्त वे परम भगवान् श्रीकृष्ण की शरण स्वीकार करते हैं।

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ।। (भगवद्गीता ७१९)
अनेक जन्मों के उपरान्त जिसे वास्तव में ज्ञान प्राप्त होता है, मुझे सब कारणो का कारण समझकर मेरी शरण में आता है। एेसा व्यक्ति बहुत ही दुर्लभ है।

तो इस प्रकार शास्त्र प्रत्येक व्यक्ति को देवताओं की पूजा द्वारा भी भगवान् की ओर आने में ही सहायता करते हैं। किन्तु इस प्रकार की यात्रा में भगवान् तक पहुँचने में अनेक जन्म लग जाते हैं और यदि कोई इसी जन्म में भगवान् के शुद्ध भक्तों की शरण लेता है तो वह शीघ्र ही भगवान् के चरण कमलों तक पहुँच जाता है। Posted at 15 Nov 2018 by admin
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