ShivPuraan in hindi kathaa chepter 10 (श्रीशिवमहापुराण- दसवाँ अध्याय: पाँच कृत्यों का प्रतिपादन, प्रणव एवं पञ्चाक्षर-मन्त्र की महत्ता, ब्रह्मा-विष्णु द्वारा भगवान शिव की स्तुति तथा उनका अन्तर्धान), page:2
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: दसवाँ अध्याय

पाँच कृत्यों का प्रतिपादन, प्रणव एवं पञ्चाक्षर-मन्त्र की महत्ता, ब्रह्मा-विष्णु द्वारा भगवान शिव की स्तुति तथा उनका अन्तर्धान : पृष्ठ 2


तथा रुद्रमहेशाभ्यामन्यत्कृत्यद्वयं परम्।
अनुग्रहाख्यं केनापि लब्धुं नैव हि शक्यते॥११॥
इस प्रकार मेरी विभूतिस्वरुप 'रुद्र' और 'महेश्वर' मे दो अन्य उत्तम कृत्य- संहार और तिरोभाव मुझसे प्राप्त किये है। परन्तु अनुग्रह नामक कृत्य दुसरा कोई नहीं पा सकता।
तत्सर्वं पौर्विकं कर्म युवाभ्यां कालविस्मृतम्।
न तद्रुद्र महेशाभ्यां विस्मृतं कर्म तादृशम्॥१२॥
रुद्र और महेश्वर अपने कर्मों को भुले नहीं है। इसलिये मैने उनके इये अपनी समानता प्रदान की है।
रूपे वेशे च कृत्ये च वाहने चासने तथा।
आयुधादौ च मत्साम्यमस्माभिस्तत्कृते कृतम्॥१३॥
वे रुप, वेष, कृत्य, वाहन, आसन और आयुध आदि मे मेरे समान ही हैं।
मद्ध्यानविरहाद्वत्सौ मौढ्यं वामेवमागतम्।
मज्ज्ञाने सति नैवं स्यान्मानं रूपे महेशवत्॥१४॥
तस्मान्मज्ज्ञानसिद्ध्यर्थं मंत्रमोंकारनामकम्।
इतः परं प्रजपतं मामकं मानभंजनम्॥१५॥
उपादिशं निजं मंत्रमोंकारमुरुमंगलम्।
ओंकारो मन्मुखाज्जज्ञे प्रथमं मत्प्रबोधकः॥१६॥
वाचको ऽयमहं वाच्यो मंत्रो ऽयं हि मदात्मकः।
तदनुस्मरणं नित्यं ममानुस्मरणं भवेत्॥१७॥
मैने पूर्वकाल मे अपने स्वरुपभूत मन्त्र का उपदेश किया है, जो ओंकार के रुप मे प्रसिद्ध है। वह महामंड्गलकारी मन्त्र है। सबसे पहले मेरे मुख से ओंकार (ॐ) प्रकट हुआ, जो मेरे स्वरुप का बोध कराने वाला है। ओंकार वाचक है और मैं वाच्य हुँ। यह मन्त्र मेरा ही स्वरुप है। प्रतिदिन ओंकार का निरन्तर स्मरण करने से मेरा ही सदा स्मरण होता है।
अकारौत्तरात्पूर्वमुकारः पश्चिमाननात्।
मकारो दक्षिणमुखाद्बिंदुः प्राङ्मुखतस्तथा॥१८॥
नादो मध्यमुखादेवं पञ्चधा ऽसौ विजृंभितः।
एकीभूतः पुनस्तद्वदोमित्येकाक्षरो भवेत्॥१९॥
मेरे उत्तरवर्ती मुख से अकार का, पश्चिम मुख से उकार का, दक्षिण मुख से मकार का, पुर्ववर्ती मुख से बिन्दु का तथा मध्यवर्ती मुख से नाद का प्राकट्य हुआ। इस प्रकार पाँच अवयवों से युक्त ओंकार का विस्तार हुआ है। इन सभी अवयवों से एकीभूत होकर यह प्रणव 'ॐ' नामक एक अक्षर हो गया।
नामरूपात्मकं सर्वं वेदभूतकुलद्वयम्।
व्याप्तमेतेन मंत्रेण शिवशक्त्योश्च बोधकः॥२०॥
यह नाम-रुपात्मक सारा जगत तथा वेद उत्पन्न स्त्री-पुरुष वर्ग रुप दोनो कुल इस प्रणव मन्त्र मे व्याप्त है। यह मन्त्र शिव और शक्ति दोनों का बोधक है।
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