ShivPuraan in hindi kathaa chepter 10 (श्रीशिवमहापुराण- दसवाँ अध्याय: पाँच कृत्यों का प्रतिपादन, प्रणव एवं पञ्चाक्षर-मन्त्र की महत्ता, ब्रह्मा-विष्णु द्वारा भगवान शिव की स्तुति तथा उनका अन्तर्धान), page:3
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: दसवाँ अध्याय

पाँच कृत्यों का प्रतिपादन, प्रणव एवं पञ्चाक्षर-मन्त्र की महत्ता, ब्रह्मा-विष्णु द्वारा भगवान शिव की स्तुति तथा उनका अन्तर्धान : पृष्ठ 3


अस्मात्पञ्चाक्षरं जज्ञे बोधकं सकलस्यतत्।
आकारादिक्रमेणैव नकारादियथाक्रमम्॥२१॥
इसी से पञ्चाक्षर-मन्त्र की उत्पत्ति हुई है, जो मेरे सकल रुप का बोधक है। वह आकारादि क्रम से व मकारादि क्रम से क्रमशः प्रकाश मे आया है। ('ॐ नमः शिवाय' यह पञ्चाक्षर-मन्त्र है।)
अस्मात्पञ्चाक्षराज्जाता मातृकाः पञ्चभेदतः।
तस्माच्छिरश्चतुर्वक्त्रात्त्रिपाद्गाय त्रिरेव हि॥२२॥
इस पञ्चाक्षर-मन्त्र से मातृका के वर्ण प्रकट हुए है, जो पाँच भेदवाले है। (अ, इ, उ, ॠ, ॡ - ये पाँच मूलभूत स्वर है तथा व्यञ्जन भी पाँच-पाँच वर्णों से युक्त पाँच वर्ग वाले हैं।) उसी से शिरोमंत्र सहित त्रिपदा गायत्री का प्रकट्य हुआ है।
वेदः सर्वस्ततो जज्ञे ततो वै मंत्रकोटयः।
तत्तन्मंत्रेण तत्सिद्धिः सर्वसिद्धिरितो भवेत्॥२३॥
उस गायत्री से सम्पुर्ण वेद प्रकट हुए है और उन वेदों से करोड़ो मन्त्र निकले हैं। उन-उन मन्त्रों से भिन्न-भिन्न कर्यों की सिद्धि होती है; परंतु इस प्रणव एवं पञ्चाक्षर से सम्पुर्ण मनोरथों की सिद्धि होती है।
अनेन मंत्रकंदेन भोगो मोक्षश्च सिद्ध्यति।
सकला मंत्रराजानः साक्षाद्भोगप्रदाः शुभाः॥२४॥
इस मन्त्र समुदाय से भोग और मोक्ष दोनो सिद्ध होते है। मेरे सकल स्वरुप से सम्बन्ध रखने वाले सभी मंत्रराज साक्षात् भोग प्रदान करने वाले और शुभकारक (मोक्षप्रद) है।
नंदिकेश्वर उवाच
पुनस्तयोस्तत्र तिरः पटं गुरुः प्रकल्प्य मंत्रं च समादिशत्परम्।
निधाय तच्छीर्ष्णि करांबुजं शनैरुदङ्मुखं संस्थितयोः सहांबिकः॥२५॥
नन्दिकेश्वर कहते हैं — तदन्तर जगदम्बा पार्वती के साथ बैठे हुए गुरुवर महादेवजी ने उत्तरानिमुख बैठे हुए ब्रह्मा और विष्णु को पर्दा करने वाले वस्त्र से आच्छादित करके उनके मस्तक पर अपना करकमल रखकर धीरे-धीरे उच्चारण करके उन्हे उत्तम मन्त्र का उपदेश किया।
त्रिरुच्चार्याग्रहीन्मंत्रं यंत्रतंत्रोक्तिपूर्वकम्।
शिष्यौ च तौ दक्षिणायामात्मानं च समर्पयत्॥२६॥
प्रबद्धहस्तौ किल तौ तदंतिके तमेव देवं जगतुर्जगद्गुरुम्॥२७॥
मन्त्र-तन्त्र मे बताई हुई विधि के पालन-पुर्वक तीन बार मन्त्र का उच्चारण करके भगवान शिव ने उन दोनो शिष्यौ को मन्त्र की दीक्षा दी। फिर उन शिष्यौ ने गुरु-दक्षिणा के रुप मे अपने आप को ही समर्पित कर दिया और दोनो हाथ जोड़कर उनके समीप खड़े हो उन देवेश्वर जगद्गुरु का स्तवन किया।
ब्रह्माच्युतावूचतुः
नमो निष्कलरूपाय नमो निष्कलतेजसे।
नमः सकलनाथाय नमस्ते सकलात्मने॥२८॥
नमः प्रणववाच्याय नमः प्रणवलिंगिने।
नमः सृष्ट्यादिकर्त्रे च नमः पञ्चमुखायते॥२९॥
पञ्चब्रह्मस्वरूपाय पञ्च कृत्यायते नमः।
आत्मने ब्रह्मणे तुभ्यमनंतगुणशक्तये॥३०॥
सकलाकलरूपाय शंभवे गुरवे नमः।
ब्रह्मा और विष्णु बोले — प्रभो! आप निष्कल-स्वरुप है, आपको नमस्कार है। आप निष्कल तेज से प्रकाशित होते है, आपको नमस्कार है। आप सबके स्वामी है, आपको नमस्कार है। आप सर्वात्मा को नमस्कार है अथवा 'सकल-स्वरुप' आप महेश्वर को नमस्कार है। आप प्रणव-लिड़ग वाले है, आपको नमस्कार है। सृष्टि पालन, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह करने वाले है, आपको नमस्कार है। आपके पाँच मुख है, आप परमेश्वर को नमस्कार है। परब्रह्म स्वरुप पाँच कृत्य वाले आपको नमस्कार है। आप सबके आत्मा है, ब्रह्म है। आपने गुण और शक्तियाँ अनन्त है, आपको नमस्कार है। आपके सकल और निष्कल दो रुप है। आप सद्गुरु और शम्भु है, आपको नमस्कार है।
इति स्तुत्वा गुरुं पद्यैर्ब्रह्मा विष्णुश्च नेमतुः॥३१॥
इन पद्यों द्वारा अपने गुरु महेश्वर की स्तुति करके ब्रह्मा और विष्णु ने उनके चरणों मे प्रणाम किया।
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