ShivPuraan in hindi kathaa chepter 10 (श्रीशिवमहापुराण- दसवाँ अध्याय: पाँच कृत्यों का प्रतिपादन, प्रणव एवं पञ्चाक्षर-मन्त्र की महत्ता, ब्रह्मा-विष्णु द्वारा भगवान शिव की स्तुति तथा उनका अन्तर्धान), page:4
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: दसवाँ अध्याय

पाँच कृत्यों का प्रतिपादन, प्रणव एवं पञ्चाक्षर-मन्त्र की महत्ता, ब्रह्मा-विष्णु द्वारा भगवान शिव की स्तुति तथा उनका अन्तर्धान : पृष्ठ 4


ईश्वर उवाच
वत्सकौ सर्वतत्त्वं च कथितं दर्शितं च वाम्।
जपतं प्रणवं मंत्रं देवीदिष्टं मदात्मकम्॥३२॥
ज्ञानं च सुस्थिरं भाग्यं सर्वं भवति शाश्वतम्।
आर्द्रायां च चतुर्दश्यां तज्जाप्यं त्वक्षयं भवेत्॥३३॥
महेश्वर बोले —वत्स जो प्रणव मंत्र का जप करता है, उसका ज्ञान व भाग्य बढता जाता है। 'आर्द्रा' नक्षत्र से युक्त चतुर्दशी को प्रणव का जप किया जाय तो वह अक्षय फल देने वाला होता है।
सूर्यगत्या महार्द्रायामेकं कोटिगुणं भवेत्।
मृगशीर्षांतिमो भागः पुनर्वस्वादिमस्तथा॥३४॥
आर्द्रासमः सदा ज्ञेयः पूजाहोमादितर्पणे।
दर्शनं तु प्रभाते च प्रातःसंगवकालयोः॥३५॥
सुर्य की संक्रान्ति से युक्त महा-आर्द्रा नक्षत्र मे एक बार किया हुआ प्रणव जप कोटीगुने (हजारगुना) जप का फल देता है। 'मृगशीरा' नक्षत्र का अन्तिम भाग तथा 'पुनर्वसु' का आदि भाग पूजा, होम और तर्पण आदि के लिये सदा आर्द्रा के समान ही होता है-यह जानना चहिये। मेरा या मेरे लिङ्ग का दर्शन प्रभात-काल मे ही-प्रातः और संगव (मध्याह्न के पुर्व) काल मे करना चाहिये।
चतुर्दशी तथा ग्राह्या निशीथव्यापिनी भवेत्।
प्रदोषव्यापिनी चैव परयुक्ता प्रशस्यते॥३६॥
मेरे दर्शन-पूजन के लिये चतुर्दशी तिथि निशिथव्यापिनी अथवा प्रदोषव्यापिनी लेनी चाहिये; क्योकि परवर्तिनी तिथि से संयुक्त चतुर्दशी की ही प्रशंसा की जाती है।
लिंगं बेरं च मेतुल्यं यजतां लिंगमुत्तमम्।
तस्माल्लिंगं परं पूज्यं बेरादपि मुमुक्षुभिः॥३७॥
पूजा करने वालों के लिये मेरी मूर्ति तथा लिङ्ग दोनो समान है, फिर भी मूर्ति की अपेक्षा लिङ्ग का स्थान ऊँचा है। इसलिये मुमुक्षु पुरुषों को चाहिये कि वे वेर (मुर्ति) से भी श्रेष्ठ लिङ्ग का ही पूजन करें।
लिंगमोंकारमंत्रेण बेरं पञ्चाक्षरेण तु।
स्वयमेव हि द्रव्यैः प्रतिष्ठाप्यं परैरपि॥३८॥
पूजयेदुपचारैश्च मत्पदं सुलभं भवेत्।
इति शास्य तथा शिष्यौ तत्रैवांऽतर्हितः शिवः॥३९॥
लिङ्ग का ॐकार मंत्रों से और वेर का पञ्चाक्षर मंत्र से पूजन करना चाहिये। शिवलिङ्ग की स्वयँ ही स्थापना करके अथवा दुसरे से भी स्थापना करवाकर उत्तम द्रव्यमय उपचारों से पूजा करनी चाहिये। इससे मेरा पद सुलभ हो जाता है।
इस प्रकार उन दोनों शिष्यों को उपदेश देकर भगवान शिव वहीं अन्तर्धान हो गये।
इति श्रीशिवमहापुराणे विद्येश्वरसंहितायां दशमो ऽध्यायः
॥ श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता का "पाँच कृत्यों का प्रतिपादन, प्रणव एवं पञ्चाक्षर-मन्त्र की महत्ता, ब्रह्मा-विष्णु द्वारा भगवान शिव की स्तुति तथा उनका अन्तर्धान" नामक यह दसवाँ अध्याय सम्पुर्ण हुआ ॥
ग्यारहवाँ अध्याय: शिव-लिङ्ग की स्थापना, उसके लक्षण और पूजन की विधि का वर्णन तथा शिव-पद की प्राप्ति कराने वाले सत्कर्मों का विवेचन
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