ShivPuraan in hindi kathaa chepter 11 (श्रीशिवमहापुराण- ग्यारहवाँ अध्याय: शिव-लिग्ड़ की स्थापना, उसके लक्षण और पूजन की विधि का वर्णन तथा शिव-पद की प्राप्ति कराने वाले सत्कर्मों का विवेचन), page:1
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: ग्यारहवाँ अध्याय

शिव-लिङ्ग की स्थापना उसके लक्षण और पूजन की विधि का वर्णन तथा शिव-पद की प्राप्ति कराने वाले सत्कर्मों का विवेचन : पृष्ठ 1


ऋषय ऊचुः
कथं लिंगं प्रतिष्ठाप्यं कथं वातस्य लक्षणम्।
कथं वा तत्समभ्यर्च्यं देशे काले च केन हि।।१।।
ॠषियों ने पुछा —सूतजी! शिव-लिङ्ग की स्थापना कैसे करनी चाहिये? उसका लक्षण क्या है? तथा उसकी पूजा कैसे करनी चाहिये, किस देश-काल मे करनी चाहिये और किस द्रव्य के द्वारा उसका निर्माण होना चाहिये?।।1॥
सूत उवाच
युष्मदर्थं प्रवक्ष्यामि बुद्ध्यतामवधानतः।
अनुकूले शुभे काले पुण्ये तीर्थे तटे तथा।।२।।
सूतजी ने कहा — मै तुम लोगो के लिये इस विषय का वर्णन करता हुँ। ध्यान देकर सुनो और समझो। अनुकुल एवं शुभ समय मे किसी पवित्र तिर्थ मे नदी आदि के तट पर अपनी रुचि के अनुसार॥2॥
यथेष्टं लिंगमारोप्यं यत्र स्यान्नित्यमर्चनम्।
पार्थिवेन तथाप्येनं तैजसेन यथारुचि।।३।।
ऐसी जगह पर शिव-लिङ्ग की स्थापना करनी चाहिये जहाँ नित्य पूजन हो सके। पार्थिव द्रव्य से, जलमय द्रव्य से अथवा तेजस पदार्थ से अपनी रुचि के अनुसार॥3॥
कल्पलक्षणसंयुक्तं लिंगं पूजाफलं लभेत्।
सर्वलक्षणसंयुक्तं सद्यः पूजाफलप्रदम्।।४।।
कल्पोक्त लक्षणों से युक्त शिव-लिङ्ग का निर्माण करके उसकी पूजा करने से उपासक को उस पूजा का पूरा-पूरा फल प्रप्त होता है। सम्पुर्ण शुभ लक्षणों से युक्त शिव-लिङ्ग की यदि पूजा कि जाय तो वह तत्काल पूजा का फल देने वाला होता है॥4॥
चरे विशिष्यते सूक्ष्मं स्थावरे स्थूलमेव हि।
सलक्षणं सपीठं च स्थापयेच्छिवनिर्मितम्।।५।।
यदि चल-प्रतिष्ठा करनी हो तो उसके लिये छोटा-सा शिव-लिङ्ग अथवा विग्रह श्रेष्ट माना जाता है और यदि अचल-प्रतिष्ठा करनी हो स्थुल शिव-लिङ्ग अथवा विग्रह अच्छा माना गया है॥5॥
मंडलं चतुरस्रं वा त्रिकोणमथवा तथा।
खट्वांगवन्मध्यसूक्ष्मं लिंगपीठं महाफलं।।६।।
उत्तम लक्षणों से युक्त शिव-लिङ्ग की पीठ सहित स्थापना करनी चाहिये। शिव पीठ मण्डलाकार (गोल), चौकोर, त्रिकोण अथवा खाट के पाये की भाँति ऊपर-नीचे मोटा और बीच मे पतला होना चाहिये। ऐसा लिङ्ग-पीठ महान फल देने वाला होता है॥6॥
प्रथमं मृच्छिलादिभ्यो लिगं लोहादिभिः कृतम्।
येन लिंगं तेन पीठं स्थावरे हि विशिष्यते।।७।।
पहले मिट्टी से, प्रस्तर आदि से अथवा लोहे आदि से शिव-लिङ्ग का निर्माण करना चाहिये। जिस द्रव्य से शिव-लिङ्ग का निर्माण हो, उसी से उसका पीठ भी बनाना चाहिये। यही स्थावर (अचल-प्रतिष्ठा वाले) शिव-लिङ्ग की विशेष बात है॥7॥
लिंगं पीठं चरे त्वेकं लिंगं बाणकृतं विना।
लिंगप्रमाणं कर्तृ-णां द्वादशांगुलमुत्तमम्।।८।।
चर (चल-प्रतिष्ठा वाले) शिव-लिङ्ग मे भी लिङ्ग और पीठ का एक ही उपादान होना चाहिये। किन्तु बाण-लिङ्ग के लिये यह नियम नहीं है। लिङ्ग की लम्बाई निर्माणकर्ता या स्थापना करने वाले यजमान के बारह अंगुल के बराबर होनी चाहिये। ऐसे ही शिव-लिङ्ग को उत्तम कहा गया है॥8॥
न्यूनं चेत्फलमल्पं स्यादधिकं नैव दूष्यते।
कर्तुरेकांगुलन्यूनं चरेपि च तथैव हि।।९।।
इससे कम लम्बाई हो तो फल मे कमी आ जाती है, अधिक हो तो कोई दोष की बात नहीं है। चर लिङ्ग मे भी वैसा ही नियम है। उसकी लम्बाई कम-से-कम कर्ता के एक अंगुल के बराबर होनी चाहिये। उससे छोटा होने पर अल्प फल मिलता है, किन्तु उससे अधिक होना कोई दोष की बात नहीं है।॥9॥
आदौ विमानं शिल्पेन कार्यं देवगणैर्युतम्।
तत्र गर्भगृहे रम्ये दृढे दर्पणसंनिभो भूषिते।।१०।।
यजमान को चाहिये कि वह पहले शिल्प-शास्त्र के अनुसार एक निमान या देवालय बनवाये, जो देवगणों कि मुर्तियों से अलंकृत हो। उसका गर्भगृह बहुत ही सुन्दर, सुदृढ और दर्पण के समान स्वच्छ हो।
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