ShivPuraan in hindi kathaa chepter 11 (श्रीशिवमहापुराण- ग्यारहवाँ अध्याय: शिव-लिग्ड़ की स्थापना, उसके लक्षण और पूजन की विधि का वर्णन तथा शिव-पद की प्राप्ति कराने वाले सत्कर्मों का विवेचन), page:2
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: ग्यारहवाँ अध्याय

शिव-लिङ्ग की स्थापना उसके लक्षण और पूजन की विधि का वर्णन तथा शिव-पद की प्राप्ति कराने वाले सत्कर्मों का विवेचन : पृष्ठ 2


नवरत्नैश्च दिग्द्वारे च प्रधानकैः।
नीलं रक्तं च वै दूर्यं श्यामं मारकतं तथा।।११।।
मुक्ताप्रवालगोमेदवज्राणि नवरत्नकम्।
मध्ये लिंगं महद्द्रव्यं निक्षिपेत्सहवैदिके।।१२।।
उसे नौ प्रकार के रत्नों से विभुषित किया गया हो। उसमे पुर्व और पश्चिम दिशा मे दो मुख्य द्वार हो। जहाँ शिव-लिङ्ग कि स्थापना करनी हो, उस स्थान के गर्त मे नीलम, लाल वैदुर्य, श्याम मरकत, मोती, मुँगा, गोमेद और हीरा इन नौ रत्नों को तथा अन्य महत्वपुर्ण द्रव्यों को मन्त्रों के साथ छोड़ें।
संपूज्य लिंगं सद्याद्यैः पञ्चस्थाने यथाक्रमम्।
अग्नौ च हुत्वा बहुधा हविषास कलं च माम्।।१३।।
सद्योजात आदि पाँच वैदिक मंत्रों द्वारा शिव-लिङ्ग का पाँच स्थानो मे क्रमशः पूजन करके अग्नि मे हविष्य कि अनेक आहुतियाँ दे और परिवार सहित मेरी करके गुरु-स्वरुप आचार्य को धन से तथा भाई-बन्धुओं को मनचाही वस्तुओं से सन्तुष्ट करें। याचकों को जड़ (सुवर्ण, गृह एवं भू-सम्पत्ति) तथा चेतन (गौ आदि) वैभव प्रदान करें।
पाँच वैदिक मंत्रों:
1) ॐ सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः।
2) भत्रे भवेनातिभवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः।
3) ॐ वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः।
4) श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः।
5) सर्वभूतदमनाय नमो मनोरथाय नमः।
अभ्यर्च्य गुरुमाचार्यमर्थैः कामैश्च बांधवम्।
दद्यादैश्वर्यमर्थिभ्यो जडमप्यजडं तथा।।१४।।
स्थावर-जंगम सभी जीवों को यत्न-पूर्वक संतुष्ट करके एक गड़ढे मे सुवर्ण तथा नौ प्रकार के रत्न भरकर सद्योजातादि वैदिक मंत्रों का उच्चारण करके परम कल्याणकारी महादेवजी का ध्यान करे।
स्थावरं जंगमं जीवं सर्वं संतोष्य यत्नतः।
सुवर्णपूरिते श्वभ्रे नवरत्नैश्च पूरिते।।१५।।
तत्पश्चात नादघोष से युक्त महामन्त्र ॐकार का उच्चारण करके उक्त गड़ढे मे शिव-लिङ्ग कि स्थापना करके उसे पीठ से संयुक्त करें। इस प्रकार पीठयुक्त लिङ्ग की स्थापना करके उसे नित्य-लेप (दीर्घकाल तक टिके रहने वाले मसाले) से जोड़कर स्थिर करे। इसी प्रकार वहाँ परम सुन्दर वेर (मुर्ति) की भी स्थापना करनी चाहिये।
सद्यादि ब्रह्म चोच्चार्य ध्यात्वा देवं परं शुभम्।
उदीर्य च महामंत्रमोंकारं नादघोषितम्।।१६।।
लिंगं तत्र प्रतिष्ठाप्य लिगं पीठेन योजयेत्।
लिंगं सपीठं निक्षिप्य नित्यलेपेन बंधयेत्।।१७।।
सारांश यह कि भूमि-संस्कार आदि की सारी विधि जैसी लिङ्ग प्रतिष्ठा के लिये कही गयी है, वैसी ही वेर (मुर्ति) प्रतिष्ठा के लिये भी समझनी चाहिये। अन्तर इतना ही है कि लिङ्ग प्रतिष्ठा के लिये प्रणव मंत्र के उच्चारण का विधान है, परन्तु वेर की प्रतिष्ठा पञ्चाक्षर-मन्त्र (ॐ नमः शिवाय)।
एवं बेरं च संस्थाप्यं तत्रैव परमं शुभम्।
पञ्चाक्षरेण बेरं तु उत्सवार्थं वहिस्तथा।।१८।।
बेरं गुरुभ्यो गृह्णीयात्साधुभिः पूजितं तु वा।
एवं लिंगे च बेरे च पूजा शिवपदप्रदा।।१९।।
जहाँ लिङ्ग की प्रतिष्ठा हुई है, वहाँ भी उत्सव के लिये बाहर सवारी निकालने आदि के लिये वेर (मुर्ति) को रखना आवश्यक है। वेर को बाहर से भी लिया जा सकता है। उसे गुरुजनों से ग्रहण करें। बाह्य वेर वही लेने योग्य है, जो साधु पुरुषों द्वारा पूजित हो। इस प्रकार लिङ्ग मे और वेर मे भी की हुई महादेवजी की पूजा शिव-पद प्रदान करने वाली होती है।
पुनश्च द्विविधं प्रोक्तं स्थावरं जंगमं तथा।
स्थावरं लिंगमित्याहुस्तरुगुल्मादिकं तथा।।२०।।
जंगमं लिंगमित्याहुः कृमिकीटादिकं तथा।
स्थावरस्य च शुश्रूषा जंगमस्य च तर्पणम्।।२१।।
स्थावर और जंगम के भेद से लिङ्ग दो प्रकार का कहा गया है। वृक्ष, लता आदि को स्थावर लिङ्ग कहते है और कृमि-कीट आदि को जंगम लिङ्ग। स्थावर लिङ्ग को सींचने आदि के द्वारा सेवा करनी चाहिये और जंगम लिङ्ग को आहार एवं जल आदि देकर तृप्त करना उचित है।
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