ShivPuraan in hindi kathaa chepter 11 (श्रीशिवमहापुराण- ग्यारहवाँ अध्याय: शिव-लिग्ड़ की स्थापना, उसके लक्षण और पूजन की विधि का वर्णन तथा शिव-पद की प्राप्ति कराने वाले सत्कर्मों का विवेचन), page:3
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: ग्यारहवाँ अध्याय

शिव-लिङ्ग की स्थापना उसके लक्षण और पूजन की विधि का वर्णन तथा शिव-पद की प्राप्ति कराने वाले सत्कर्मों का विवेचन : पृष्ठ 3


तत्तत्सुखानुरागेण शिवपूजां विदुर्बुधाः।
पीठमंबामयं सर्वं शिवलिंगं च चिन्मयम्।।२२।।
यथा देवीमुमामंके धृत्वा तिष्ठति शंकरः।
तथा लिंगमिदं पीठं धृत्वा तिष्ठति संततम्।।२३।।
उन स्थावर-जंगम जीवों को सुख पहुँचाने मे अनुरक्त होना भगवान शिव का पूजन है, ऐसा विद्वान पुरुष मानते है। यों चराचर जीवों को ही भगवान शंकर के प्रतीक मानकर उनका पूजन करना चाहिये।
एवं स्थाप्य महालिंगं पूजयेदुपचारकैः।
नित्यपूजा यथा शक्तिध्वजादिकरणं तथा।।२४।।
इस तरह महालिङ्ग की स्थापना करके विविध उपचारों द्वारा उसका पूजन करें। अपनी शक्ति के अनुसार नित्य पूजा करनी चाहिये तथा देवालय के पास ध्वजारोपण करना चाहिये।
इति संस्थापयेल्लिंगं साक्षाच्छिवपदप्रदम्।
अथवा चरलिंगं तु षोडशैरुपचारकैः।।२५।।
शिव-लिङ्ग साक्षात् शिव का पद प्रदान करने वाला है। अथवा चर लिङ्ग मे षोडषोपचार द्वारा यथोचित रीति से क्रमशः पूजन करे। यह पूजन भी शिव-पद प्रदान करने वाला है।
पूजयेच्च यथान्यायं क्रमाच्छिवपदप्रदम्।
आवाहनं चासनं च अर्घ्यं पाद्यं तथैव च।।२६।।
तदंगाचमनं चैव स्नानमभ्यंगपूर्वकम्।
वस्त्रं गंधं तथा पुष्पं धूपं दीपं निवेदनम्।।२७।।
नीराजनं च तांबूलं नमस्कारो विसर्जनम्।
अथवा ऽर्घ्यादिकं कृत्वा नैवेद्यां तं यथाविधि।।२८।।
अथाभिषेकं नैवेद्यं नमस्कारं च तर्पणम्।
यथाशक्ति सदाकुर्यात्क्रमाच्छिवपदप्रदम्।।२९।।
आवाहन, आसन, अर्ध्य, पाद्य, पाद्याग्ड़ आचमन, अभ्यग्ड़-पूर्वक स्नान, वस्त्र एवं यज्ञोपवीत, गन्ध, पुष्प, धुप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल समर्पण, नीराजन, नमस्कार और विसर्जन ये सोलह उपचार हैं। अथवा अर्ध्य से लेकर नैवेद्य तक विधिवत पूजन करे। अभिषेक, नैवेद्य, नमस्कार और तर्पण ये सब यथाशक्ति नित्य करें। इस तरह किया हुआ शिव का पूजन शिव-पद की प्राप्ति कराने वाला होता है।
अथवा मानुषे लिंगेप्यार्षे दैवे स्वयंभुवि।
स्थापिते ऽपूर्वके लिंगे सोपचारं यथा तथा।।३०।।
पूजोपकरणे दत्ते यत्किंचित्फलमश्नुते।
प्रदक्षिणानमस्कारैः क्रमाच्छिवपदप्रदम्।।३१।।
अथवा किसी मनुष्य के द्वारा स्थापित शिव-लिङ्ग मे, ॠषियों द्वारा स्थापित शिव-लिङ्ग मे, देवताओं द्वारा स्थापित शिव-लिङ्ग मे, अपने-आप प्रकट हुए स्वयंभू शिव-लिङ्ग मे, तथा अपने नूतन स्थापित किये शिव-लिङ्ग मे भी उपचार समर्पण-पुर्वक जैसे-तैसे पूजन करने से या पूजन की सामग्री देने से भी मनुष्य ऊपर जो कूछ कहा गया है, वह सारा फल प्राप्त कर लेता है।
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