ShivPuraan in hindi kathaa chepter 11 (श्रीशिवमहापुराण- ग्यारहवाँ अध्याय: शिव-लिग्ड़ की स्थापना, उसके लक्षण और पूजन की विधि का वर्णन तथा शिव-पद की प्राप्ति कराने वाले सत्कर्मों का विवेचन), page:4
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: ग्यारहवाँ अध्याय

शिव-लिङ्ग की स्थापना उसके लक्षण और पूजन की विधि का वर्णन तथा शिव-पद की प्राप्ति कराने वाले सत्कर्मों का विवेचन : पृष्ठ 4


लिंगं दर्शनमात्रं वा नियमेन शिवप्रदम्।
मृत्पिष्टगोशकृत्पुष्पैः करवीरेण वा फलैः।।३२।।
क्रमशः परिक्रमा और नमस्कार करने से भी शिव-लिङ्ग, शिव-पद की प्राप्ति कराने वाला होता है। यदि नियम-पुर्वक शिव-लिङ्ग का दर्शनमात्र कर लिया जाये तो वह भी कल्याणप्रद होता है।
गुडेन नवनीतेन भस्मनान्नैर्यथारुचि।
लिंगं यत्नेन कृत्वांते यजेत्तदनुसारतः।।३३।।
अंगुष्ठादावपि तथा पूजामिच्छंति केचन।
लिंगकर्मणि सर्वत्र निषेधोस्ति न कर्हिचित्।।३४।।
सर्वत्र फलदाता हि प्रयासानुगुणं शिवः।
अथवा लिंगदानं वा लिंगमौल्यमथापि वा।।३५।।
मिट्टी, आटा, गाय के गोबर, फुल, कनेर पुष्प, फल, गुड़, मक्खन, भस्म अथवा अन्न से भी अपनी रुचि के अनुसार शिवलिङ्ग बनाकर तदनुसार उसका पूजन करें।
श्रद्धया शिवभक्ताय दत्तं शिवपदप्रदम्।
अथवा प्रणवं नित्यं जपेद्दशसहस्रकम्।।३६।।
संध्ययोश्च सहस्रं वा ज्ञेयं शिवपदप्रदम्।
जपकाले मकारांतं मनःशुद्धिकरं भजेत्।।३७।।
अथवा प्रतिदिन दस हजार प्रणव मंत्र का जप करें अथवा दोनो संध्याओं के समय एक-एक सहस्त्र प्रणव का जप किया करे। यह क्रम भी शिव-पद कि प्राप्ति कराने वाला होता है, ऐसा जानना चाहिये।
समाधौ मानसं प्रोक्तमुपांशु सार्वकालिकम्।
समानप्रणवं चेमं बिंदुनादयुतं विदुः।।३८।।
जपकाल मे मकारान्त प्रणव का उच्चारण मन कि शुद्धि करने वाला होता है। समाधि मे मानसिक जप का विधान है तथा अन्य सब समय भी उपांशु जप ही करना चाहिये। नाद और बिन्दु से युक्त ओंकार के उच्चारण को विद्वान पुरुष 'समानप्रणव' कहते है।
मंत्राक्षरों को इतने धीमे स्वर मे उच्चारण करे कि उसे दुसरा कोई सुन न सके। ऐसे जप को 'उपांशु जप' कहते है।
अथ पञ्चाक्षरं नित्यं जपेदयुतमादरात्।
संध्ययोश्च सहस्रं वा ज्ञेयं शिवपदप्रदम्।।३९।।
यदि प्रतिदिन आदर-पुर्वक दस हजार पञ्चाक्षर-मंत्र का जप किया जाय अथवा दोनों संध्याओं के समय एक-एक सहस्त्र का भी जप किया जाय तो उसे शिव-पद कि प्राप्ति कराने वाला समझना चाहिये।
प्रणवेनादिसंयुक्तं ब्राह्मणानां विशिष्यते।
दीक्षायुक्तं गुरोर्ग्राह्यं मंत्रं ह्यथ फलाप्तये।।४०।।
कुंभस्नानं मंत्रदीक्षां मातृकान्यासमेव च।
ब्राह्मणः सत्यपूतात्मा गुरुर्ज्ञानी विशिष्यते।।४१।।
ब्राह्मणों के लिये आदि मे प्रणव से युक्त पञ्चाक्षर-मंत्र अच्छा बताया गया है। कलश से किया हुआ स्नान, मंत्र की दीक्षा, मातृकाओं का न्यास, सत्य से पवित्र अन्तःकरण वाला ब्राह्मण तथा ज्ञानी गुरु-इन सबको उत्तम माना गया है।
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