ShivPuraan in hindi kathaa chepter 11 (श्रीशिवमहापुराण- ग्यारहवाँ अध्याय: शिव-लिग्ड़ की स्थापना, उसके लक्षण और पूजन की विधि का वर्णन तथा शिव-पद की प्राप्ति कराने वाले सत्कर्मों का विवेचन), page:5
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: ग्यारहवाँ अध्याय

शिव-लिङ्ग की स्थापना उसके लक्षण और पूजन की विधि का वर्णन तथा शिव-पद की प्राप्ति कराने वाले सत्कर्मों का विवेचन : पृष्ठ 5


द्विजानां च नमःपूर्वमन्येषां च नमोन्तकम्।
स्त्रीणां च क्वचिदिच्छंति नमो तं च यथाविधि।।४२।।
द्विजों के लिये 'नमः शिवाय' के उच्चारण का विधान है। द्विजेतरों के लिये अन्त मे नमः पद के प्रयोग की विधि है अर्थात वे 'शिवाय नमः' इस मंत्र का उच्चारण करें। स्त्रियों के लिये भी कहीं-कहीं विधिपूर्वक नमोऽन्त उच्चारण का ही विधान है अर्थात वे 'शिवाय नमः' का ही जप करें।
विप्रस्त्रीणां नमः पूर्वमिदमिच्छंति केचन।
पञ्चकोटिजपं कृत्वा सदा शिवसमो भवेत्।।४३।।
कोई-कोई ॠषि ब्राह्मण की स्त्रियों के लिये नमः पूर्वक शिवाय के जप की अनुमति देते हैं अर्थात वे 'नमः शिवाय' का जप करें। पञ्चाक्षर-मंत्र का पाँच करोड़ जप करके मनुष्य भगवान सदा-शिव के समान हो जाता है।
एकद्वित्रिचतुःकोट्याब्रह्मादीनां पदं व्रजेत्।
जपेदक्षरलक्षंवा अक्षराणां पृथक्पृथक्।।४४।।
अथवाक्षरलक्षं वा ज्ञेयं शिवपदप्रदम्।
सहस्रं तु सहस्राणां सहस्रेण दिनेन हि।।४५।।
एक, दो, तीन अथवा चार करोड़ का जाप करने से मनुष्य क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा महेश्वर का पद प्राप्त करता है। अथवा मंत्र मे जितने अक्षर है, उनका पृथक-पृथक एक-एक लाख जाप करें अथवा समस्त अक्षरों का एक साथ ही जितने अक्षर हो उतने लाख जप करें। इस तरह के जप को शिवपद कि प्राप्ति कराने वाला समझना चाहिये।
जपेन्मंत्रादिष्टसिद्धिर्नित्यं ब्राह्मणभोजनात्।
अष्टोत्तरसहस्रं वै गायत्रीं प्रातरेव हि।।४६।।
ब्राह्मणस्तु जपेन्नित्यं क्रमाच्छिवपदप्रदान्।
वेदमंत्रांस्तु सूक्तानि जपेन्नियममास्थितः।।४७।।
एकं दशार्णं मंत्रं च शतोनं च तदूर्ध्वकम्।
अयुतं च सहस्रं च शतमेकं विना भवेत्।।४८।।
यदि एक हजार दिनों मे प्रतिदिन एक हजार जप के क्रम से पञ्चाक्षर-मंत्र का दस लाख जप पूर्ण कर लिया जाय और प्रतिदिन ब्राह्मण भोजन कराया जाय तो उस मंत्र से अभिष्ट कार्य की सिद्धि होने लगती है। ब्राह्मण को चाहिए की वह प्रतिदिन प्रातःकाल एक हजार आठ बार गायत्री का जप करें। ऐसा करने पर गायत्री क्रमशः शिवपद प्रदान करने वाली होती है। वेद मंत्रों और और वैदिक सुक्तों का भी नियम पूर्वक जप करना चाहिये।
वेदपारायणं चैव ज्ञेयं शिवपदप्रदम्।
अन्यान्बहुतरान्मंत्राञ्जपेदक्षरलक्षतः।।४९।। एकाक्षरांस्तथा मंत्राञ्जपेदक्षरकोटितः।
ततः परं जपेच्चैव सहस्रं भक्तिपूर्वकम्।।५०।।
वेदों का पारायण भी शिवपद की प्राप्ति कराने वाला है, ऐसा जानना चाहिए। अन्यान्य जो बहुत से मंत्र है, उनका भी भक्तिपूर्वक जितने अक्षर हो, उतने लाख जप करें।
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