ShivPuraan in hindi kathaa chepter 11 (श्रीशिवमहापुराण- ग्यारहवाँ अध्याय: शिव-लिग्ड़ की स्थापना, उसके लक्षण और पूजन की विधि का वर्णन तथा शिव-पद की प्राप्ति कराने वाले सत्कर्मों का विवेचन), page:6
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: ग्यारहवाँ अध्याय

शिव-लिङ्ग की स्थापना उसके लक्षण और पूजन की विधि का वर्णन तथा शिव-पद की प्राप्ति कराने वाले सत्कर्मों का विवेचन : पृष्ठ 6


एवं कुर्याद्यथाशक्ति क्रमाच्छिव पदं लभेत्।
नित्यं रुचिकरं त्वेकं मंत्रमामरणांतिकम्।।५१।।
जपेत्सहस्रमोमिति सर्वाभीष्टं शिवाज्ञया।
पुष्पारामादिकं वापि तथा संमार्जनादिकम्।।५२।।
इस प्रकार जो यथाशक्ति जप करता है, वह क्रमशः शिव-पद (मोक्ष) प्राप्त कर लेता है। अपनी रुचि के अनुसार किसी एक मंत्र को अपनाकर मृत्यु-पर्यन्त प्रतिदिन उसका जप करना चाहिये अथवा 'ओम् (ॐ)' मंत्र का प्रतिदिन एक सहस्त्र जप करना चाहिये। ऐसा करने पर भगवान शिव की आज्ञा से सम्पूर्ण मनोरथों की सिद्धि होती है। जो मनुष्य भगवान शिव के लिये फुलवाड़ी या बगीचे लगाता है।
शिवाय शिवकार्याथे कृत्वा शिवपदं लभेत्।
शिवक्षेत्रे तथा वासं नित्यं कुर्याच्च भक्तितः।।५३।।
तथा शिव के सेवाकार्य के लिये मन्दिर मे झाड़ने-बुहारने आदि की व्यवस्था करता है, वह इस पुण्य कर्म को करके शिव-पद प्राप्त कर लेता है। भगवान शिव के जो काशी आदि क्षेत्र है, उनमे भक्तिपूर्वक नित्य निवास करें।
जडानामजडानां च सर्वेषां भुक्तिमुक्तिदम्।
तस्माद्वासं शिवक्षेत्रे कुर्यदामरणं बुधः।।५४।।
वह जड़, चेतन सभी को भोग और मोक्ष देने वाला होता है। अतः विद्वान पुरुष को भगवान शिव के क्षेत्र मे आमरण निवास करना चाहिये।
लिंगाद्धस्तशतं पुण्यं क्षेत्रे मानुषके विदुः।
सहस्रारत्निमात्रं तु पुण्यक्षेत्रे तथार्षके।।५५।।
दैवलिंगे तथा ज्ञेयं सहस्रारत्निमानतः।
धनुष्प्रमाणसाहस्रं पुण्यं क्षेत्रे स्वयं भुवि।।५६।।
शिव के इन पुण्य क्षेत्रों मे स्थित मानव द्वारा स्थापित किये हुए शिवलिङ्ग अथवा स्वयं प्रकट हुए (स्वयंभु) शिवलिङ्ग का पुजन आदि करने से मनुष्यों के सहस्त्र जन्मो के पाप नष्ट हो जाते है।
पुण्यक्षेत्रे स्थिता वापी कूपाद्यपुष्कराणि च।
शिवगंगेति विज्ञेयं शिवस्य वचनं यथा।।५७।।
तत्र स्नात्वा तथा दत्त्वा जपित्वा हि शिवं व्रजेत्।
शिवक्षेत्रं समाश्रित्य वसेदामरणं तथा।।५८।।
पुण्य-क्षेत्र मे स्थित बावड़ी, कुआँ और पोखरें आदि को शिव-गंगा समझना चाहिए। भगवान शिव का ऐसा ही वचन है। वहाँ स्नान, दान और जप करके मनुष्य भगवान शिव को प्राप्त कर लेता है। अतः मृत्यु-पर्यन्त शिव के क्षेत्र का आश्रय लेकर रहना चाहिए।
दाहं दशाहं मास्यं वा सपिंडीकरणं तु वा।
आब्दिकं वा शिवक्षेत्रे क्षेत्रे पिंडमथापि वा।।५९।।
जो शिव के क्षेत्र मे अपने किसी मृत सम्बन्धी का दाह, दशाह, मासिक श्राद्ध, सपिण्डीकरण अथवा वार्षिक श्राद्ध करता है अथवा कभी भी शिव के क्षेत्र मे अपने पितरों को पिण्ड देता है।
सर्वपाप विनिर्मुक्तः सद्यः शिवपदं लभेत्।
अथवा सप्तरात्रं वा वसेद्वा पञ्चरात्रकम्।।६०।।
त्रिरात्रमेकरात्रं वा क्रमाच्छिवपदं लभेत्।
स्ववर्णानुगुणं लोके स्वाचारात्प्राप्नुते नरः।।६१।।
वह तत्काल सभी पापों से मुक्त हो जाता है और अन्त मे शिव-पद को पाता है। अथवा शिव के क्षेत्र मे सात, पाँच, तीन या एक ही रात निवास कर ले। ऐसा करने से भी क्रमशः शिव कि प्राप्ती होती है। लोक मे अपने-अपने वर्ण के अनुरुप सदाचार का पालन करने से भी मनुष्य शिव-पद को प्राप्त कर लेता है।
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