ShivPuraan in hindi kathaa chepter 11 (श्रीशिवमहापुराण- ग्यारहवाँ अध्याय: शिव-लिग्ड़ की स्थापना, उसके लक्षण और पूजन की विधि का वर्णन तथा शिव-पद की प्राप्ति कराने वाले सत्कर्मों का विवेचन), page:7
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: ग्यारहवाँ अध्याय

शिव-लिङ्ग की स्थापना उसके लक्षण और पूजन की विधि का वर्णन तथा शिव-पद की प्राप्ति कराने वाले सत्कर्मों का विवेचन : पृष्ठ 7


वर्णोद्धारेण भक्त्या च तत्फलातिशयं नरः।
सर्वं कृतं कामनया सद्यः फलमवाप्नुयात्।।६२।।
लोक मे अपने-अपने वर्ण के अनुरुप सदाचार का पालन करने से भी मनुष्य शिवपद को प्राप्त कर लेता है। वर्णानुकुल आचरण से तथा भक्ति-भाव से वह अपने सत्कर्म का अतिशय फल पाता है, कामना-पूर्वक किये हुवे अपने कर्म के अभीष्ट फल को वह शिघ्र ही पा लेता है। निष्काम-भाव से किया हुआ सारा कर्म साक्षात शिव पद की प्राप्ति कराने वाला होता है।
सर्वं कृतमकामेन साक्षाच्छिवपदप्रदम्।
प्रातर्मध्याह्नसायाह्नमहस्त्रिष्वेकतः क्रमात्।।६३।।
दिन के तीन विभाग होते है- प्रातः, मध्याह्न और सायाह्न्। इन तीनो मे क्रमशः एक-एक प्रकार के कर्म का सम्पादन किया जाता है।
प्रातर्विधिकरं ज्ञेयं मध्याह्नं कामिकं तथा।
सायाह्नं शांतिकं ज्ञेयं रात्रावपि तथैव हि।।६४।।
प्रातःकाल को शास्त्र-विहित नित्य-कर्म के अनुष्ठान का समय जानना चाहिये। मध्याह्नकाल सकाम-कर्म के लिये उपयोगी है तथा सायं-काल शान्ती-कर्म के लिये उपयोगी है, ऐसा जानना चाहिये। इसी प्रकार रात्री मे भी समय का विभाजन किया गया है।
कालो निशीथो वै प्रोक्तोमध्ययामद्वयं निशि।
शिवपूजा विशेषेण तत्काले ऽभीष्टसिद्धिदा।।६५।।
रात के चार प्रहरों मे जो बीच के दो प्रहर है, उन्हे निशीथ-काल कहा गया है। विशेषतः उसी काल मे की हुई भगवान शिव की पूजा अभीष्ट फल को देने वाली होती है।
एवं ज्ञात्वा नरः कुर्वन्यथोक्तफलभाग्भवेत्।
कलौ युगे विशेषेण फलसिद्धिस्तु कर्मणा।।६६।।
ऐसा जानकर कर्म करने वाला मनुष्य यथोक्त फल का भागी होता है। विशेषतः कलियुग मे कर्म से ही फल की सिद्धि होती है।
उक्तेन केनचिद्वापि अधिकारविभेदतः।
सद्वृत्तिः पापभीरुश्चेत्ततत्फलमवाप्नुयात्।।६७।।
अपने-अपने अधिकार के अनुसार ऊपर कहे गये किसी भी कर्म के द्वारा शिवाराधना करने वाला पुरुष यदी सदाचारी है और पाप से डरता है तो ऊन सभी कर्मों का पूरा-पूरा फल प्राप्त कर लेता है।
ऋषय ऊचुः
अथ क्षेत्राणि पुण्यानि समासात्कथयस्व नः।
सर्वाः स्त्रियश्च पुरुषा यान्याश्रित्य पदं लभेत्।।६८।।
सूत योगिवरश्रेष्ठ शिवक्षेत्रागमांस्तथा।
सूत उवाच
शृणुत श्रद्धया सर्वक्षेत्राणि च तदागमान्।।६९।।
ॠषियों ने कहा —सूतजी! पुण्यक्षेत्र कौन-कौन-से है, जिनका आश्रय लेकर सभी स्त्री-पुरुष शिव-पद प्राप्त कर लें यह हमे संक्षेप मे बताईये।
सूतजी ने कहा —श्रद्धा के साथ सभी पुण्य-क्षेत्रों का वर्णन सुनो।
।। इति श्रीशिवमहापुराणे विद्येश्वरसंहितायां एकदशोऽध्यायः ।।
॥श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता का "शिव-लिङ्ग की स्थापना उसके लक्षण और पूजन की विधि का वर्णन तथा शिव-पद की प्राप्ति कराने वाले सत्कर्मों का विवेचन" नामक यह ग्यारहवाँ अध्याय सम्पुर्ण हुआ
बारहवाँ अध्याय: मोक्षदायक पुण्यक्षेत्रों का वर्णन, कालविशेष मे विभिन्न नदियों के जल मे स्नान के उत्तम फल का निर्देश तथा तीर्थों मे पाप से बचे रहने की चेतावनी
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