ShivPuraan in hindi kathaa chepter 13 (श्रीशिवमहापुराण- तेरहवाँ अध्याय: सदाचार, शौचाचार, स्नान, भस्मधारण, संध्या-वंदन, प्रणव-जप, गायत्री-जप, दान, न्यायतः धनोपार्जन तथा अग्निहोत्र आदि की विधि एवं महिमा का वर्णन), page:1
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: तेरहवाँ अध्याय

सदाचार, शौचाचार, स्नान, भस्मधारण, संध्या-वंदन, प्रणव-जप, गायत्री-जप, दान, न्यायतः धनोपार्जन तथा अग्निहोत्र आदि की विधि एवं महिमा का वर्णन : पृष्ठ 1


ऋषय ऊचुः
सदाचारं श्रावयाशु येन लोकाञ्जयेद्बुधः।
धर्माधर्ममयान्ब्रूहि स्वर्गनारकदांस्तथा॥१॥
ॠषियों ने कहा — सूतजी! अब आप हमे शीघ्र ही सदाचार सुनाइये, जिससे विद्वान पुरुष पुण्य लोको पर विजय पाता है। स्वर्ग प्रदान करने वाले धर्ममय आचार तथा नरक का कष्ट देने वाले अधर्ममय आचारों का भी वर्णन किजिये।
सूत उवाच
सदाचारयुतो विद्वान्ब्राह्मणो नाम नामतः।
वेदाचारयुतो विप्रो ह्येतैरेकैकवान्द्विजः॥२॥
सूतजी बोले — सदाचार का पालन करने वाला विद्वान ही वास्तव मे 'ब्राह्मण' कहलाता नाम धारण करने का अधिकारी है। जो केवल वेदोक्त आचार का पालन करने वाला एवं वेद का अभ्यासी है, उस ब्राह्मण की 'विप्र' संज्ञा होती है। सदाचार, वेदाचार तथा विद्या-इनमे से एक-एक गुण से ही युक्त होने पर उसे द्विज कहते है।
अल्पाचारोल्पवेदश्च क्षत्रियो राजसेवकः।
किंचिदाचारवान्वैश्यः कृषिवाणिज्यकृत्तया॥३॥
जिसमे स्वरुपमात्र ही आचार का पालन देखा जाता है, जिसने वेदाध्ययन भी बहुत कम किया है तथा जो राजा का सेवक (पुरोहित, मंत्री आदि) है, उसे क्षत्रिय-ब्राह्मण कहते है।
शूद्रब्राह्मण इत्युक्तः स्वयमेव हि कर्षकः।
असूयालुः परद्रोही चंडालद्विज उच्यते॥४॥
जो ब्राह्मण कृषी तथा वाणिज्य कर्म करने वाला है और कुछ-कुछ आचार का भी पालन करता है, वह 'वैश्य-ब्राह्मण' कहा गया है।जो दुसरो के दोष देखने वाला और परद्रोही है, उसे 'चाण्डाल-द्विज' कहते है।
पृथिवीपालको राजा इतरेक्षत्रिया मताः।
धान्यादिक्रयवान्वैश्य इतरो वणिगुच्यते॥५॥
उसी तरह क्षत्रियों मे जो भी पृथ्वि का पालन करता है वह 'राजा' है। दुसरे लोग 'राज्यतत्वहीन क्षत्रिय' माने गये है। वैश्यों मे भी जो धान्य आदि वस्तुओं का क्रय-विक्रय करता है, वह 'वैश्य' कहलाता है दुसरों को 'वाणिक' कहते है।
ब्रह्मक्षत्रियवैश्यानां शुश्रूषुः शूद्र उच्यते।
कर्षको वृषलो ज्ञेय इतरे चैव दस्यवः॥६॥
जो ब्रह्मणों, क्षत्रियों तथा वैश्यों की सेवा मे लगा रहता है, वही वास्तव मे 'शुद्र' कहलाता है। जो शुद्र हल जोतने का कार्य करता है उसे 'वृषल' समझना चाहिये। सेवा, शिल्प और कर्षन से भिन्न वृत्ति का आश्रय लेने वाले शुद्र 'दस्यु' कहलाते है।
सर्वो ह्युषःप्राचीमुखश्चिन्तयेद्देवपूर्वकान्।
धर्मानर्थांश्च तत्क्लेशानायं च व्ययमेव च॥७॥
आयुर्द्वेषश्च मरणं पापं भाग्यं तथैव च।
व्याधिः पुष्टिस्तथा शक्तिः प्रातरुत्थानदिक्फलम्॥८॥
इन सभी वर्णों के मनुष्यों को चाहिये की वे ब्रह्म-मुहुर्त मे उठकर पूर्वाभिमुख हो सबसे पहले देवताओ का, फिर धर्म का, अर्थ का तथा उसकी प्राप्ति के लिये उठाये जाने वाले क्लेशों का तथा आय और व्यय का भी चिन्तन करे।
निशांत्यायामोषा ज्ञेया यामार्धं संधिरुच्यते।
तत्काले तु समुत्थाय विण्मूत्रे विसृजेद्द्विजः॥९॥
रात के पिछले प्रहर जो उषःकाल जानना चाहिये। उस अन्तिम प्रहर का जो आधा या मध्यभाग है, उसे संधी कहते है। उस संधिकाल मे उठकर द्विज को मल-मुत्र आदि का त्याग करना चाहिए।
गृहाद्दूरं ततो गत्वा बाह्यतः प्रवृतस्तथा।
उदण्मुखः समाविश्य प्रतिबंधेऽन्यदिण्मुखः॥१०॥
घर से दुर जाकर बाहर से अपने शरिर को ढके रखकर दिन मे उत्तराभिमुख बैठकर मल-मुत्र का त्याग करे। यदि उत्तराभिमुख बैठने मे कोई रुकावट हो तो दूसरी दिशा की और मुख करके बैठे।
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