ShivPuraan in hindi kathaa chepter 14 (श्रीशिवमहापुराण- चौदहवाँ अध्याय: अग्नियज्ञ, देवयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ आदि का वर्णन, भगवान शिव के द्वारा सातों वारों का निर्माण तथा उनमें देवाराधना से विभिन्न प्रकार के फलों की प्राप्ति का कथन), page:1
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: चौदहवाँ अध्याय

अग्नियज्ञ, देवयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ आदि का वर्णन, भगवान शिव के द्वारा सातों वारों का निर्माण तथा उनमें देवाराधना से विभिन्न प्रकार के फलों की प्राप्ति का कथन : पृष्ठ 1


ऋषय ऊचुः
अग्नियज्ञदेवयज्ञं ब्रह्मयज्ञं तथैव च।
गुरुपूजां ब्रह्मतृप्तिं क्रमेण ब्रूहि नः प्रभो॥१॥
ॠषियों ने कहा — प्रभो! अग्नियज्ञ, देवयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, गुरुपूजा तथा ब्रह्मतृप्ति का हमारे समक्ष क्रमशः वर्णन किजिए।
सूत उवाच
अग्नौ जुहोति यद्द्रव्यमग्नियज्ञः स उच्यते।
ब्रह्मचर्याश्रमस्थानां समिदाधानमेव हि॥२॥
सूतजी बोले — महर्षियों! गृहस्थ पुरुष अग्नि मे सायंकाल और प्रातःकाल जो चावल आदि द्रव्य की आहुति देता है, उसी को अग्नियज्ञ कहते है। जो ब्रह्मचर्य आश्रम मे स्थित है, उन ब्रह्मचारियों के लिये समिधा का आधान ही अग्नियज्ञ है, वे समिधा का ही अग्नि मे हवन करें।
समिदग्रौ व्रताद्यं च विशेषयजनादिकम्।
प्रथमाश्रमिणामेवं यावदौपासनं द्विजाः॥३॥
ब्राह्मणों! ब्रह्मचर्य आश्रम मे निवास करने वाले द्विजो का जब तक विवाह न हो जाय और वे औपासनाग्नि की प्रतिष्ठा न करले, तब तक उनके लिये अग्नि मे समिधा की आहुति, व्रत आदि का पालन तथा विशेष यजन आदि ही कर्तव्य है (यही उनके लिये अग्नियज्ञ है)।
आत्मन्यारोपिताग्नीनां वनिनां यतिनां द्विजाः।
हितं च मितमेध्यान्नं स्वकाले भोजनं हुतिः॥४॥
औपासनाग्निसंधानं समारभ्य सुरक्षितम्।
कुंडे वाप्यथ भांडे वा तदजस्रं समीरितम्॥५॥
द्विजो! जिन्होने बाह्य अग्नि को विसर्जित करके अपने आत्मा मे ही अग्नि का आरोप कर लिया है, ऐसे वानप्रस्थियों और सन्यासियों के लिये यही हवन या अग्नियज्ञ है कि वे विहित समय पर हितकर, परिमित और पवित्र अन्न का भोजन कर लें।
अग्निमात्मन्यरण्यां वा राजदैववशाद्ध्रुवम्।
अग्नित्यागभयादुक्तं समारोपितमुच्यते॥६॥
संपत्करी तथा ज्ञेया सायमग्न्याहुतिर्द्विजाः।
आयुष्करीति विज्ञेया प्रातः सूर्याहुतिस्तथा॥७॥
ब्रह्मणों! सायंकाल अग्नि के लिये दी हुई आहुति सम्पत्ति प्रदान करने वाली होती है, ऐसा जानना चाहिए और प्रातः काल सूर्यदेव को दी हुई आहुति आयु की वृद्धि करने वाली होती है, यह बात अच्छी तरह समझ ल्रेनी चाहिये।
अग्नियज्ञो ह्ययं प्रोक्तो दिवा सूर्यनिवेशनात्।
इंद्रादीन्सकलान्देवानुद्दिश्याग्नौ जुहोतियत्॥८॥
दिन मे अग्निदेव सूर्यदेव मे ही प्रविष्ट हो जाते है। अतः प्रातः काल सूर्यदेव को दी हुई आहुति भी अग्नियज्ञ के ही अन्तर्गत है। इस प्रकार यह अग्नियज्ञ का वर्णन किया गया है। इन्द्र आदि समस्त देवताओं के उद्देश्य से अग्नि मे जो आहुति दी जाती है, उसे देवयज्ञ समझना चाहिए।
देवयज्ञं हि तं विद्यात्स्थालीपाकादिकान्क्रतून्।
चौलादिकं तथा ज्ञेयं लौकिकाग्नौ प्रतिष्ठितम्॥९॥
स्थालीपाक आदि यज्ञों को देवयज्ञ ही मानना चाहिए। लौकिक अग्नि मे प्रतिष्ठित जो चूड़ाकरण आदि संस्कार-निमित्तक हवन-कर्म है, उन्हे भी देवयज्ञ के अन्तर्गत जानना चाहिए।
ब्रह्मयज्ञं द्विजः कुर्याद्देवानां तृप्तये सकृत्।
ब्रह्मयज्ञ इति प्रोक्तो वेदस्याऽध्ययनं भवेत्॥१०॥
अब ब्रह्मयज्ञ का वर्णन सूनो। द्विजो को चाहिए की वह देवताओं की तृप्ति के लिये निरन्तर ब्रह्मयज्ञ करे। वेदो का जो नित्य अध्ययन या स्वाध्याय होता है, उसी को ब्रह्मयज्ञ कहा गया है।
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