ShivPuraan in hindi kathaa chepter 14 (श्रीशिवमहापुराण- चौदहवाँ अध्याय: अग्नियज्ञ, देवयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ आदि का वर्णन, भगवान शिव के द्वारा सातों वारों का निर्माण तथा उनमें देवाराधना से विभिन्न प्रकार के फलों की प्राप्ति का कथन), page:2
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: चौदहवाँ अध्याय

अग्नियज्ञ, देवयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ आदि का वर्णन, भगवान शिव के द्वारा सातों वारों का निर्माण तथा उनमें देवाराधना से विभिन्न प्रकार के फलों की प्राप्ति का कथन : पृष्ठ 2


नित्यानंतरमासोयं ततस्तु न विधीयते।
अनग्नौ देवयजनं शृणुत श्रद्धयादरात्॥११॥
प्रातः नित्यकर्म के अनन्तर सायंकाल तक ब्रह्मयज्ञ किया जा सकता है। उसके बाद रात मे इसका विधान नहीं है। अग्नि के बीना देवयज्ञ कैसे होता सम्पन्न होता है , इसे तुम लोग श्रद्धा से और आदर-पुर्वक सुनो।
आदिसृष्टौ महादेवः सर्वज्ञः करुणाकरः।
सर्वलोकोपकारार्थं वारान्कल्पितवान्प्रभुः॥१२॥
सृष्टी के आरम्भ में सर्वज्ञ, दयालु और सर्व समर्थ महादेवजी ने सम्स्त लोकों के उपकार के लिये वारों की कल्पना की।
संसारवैद्यः सर्वज्ञः सर्वभेषजभेषजम्।
आदावारोग्यदं वारं स्ववारं कृतवान्प्रभुः॥१३॥
वे भगवान शिव संसार रुपी रोग को दुर करने के लिये वैद्य है। सबके ज्ञाता तथा समस्त औषधों के भी औषध है। उन भगवान ने पहले अपने वार की कल्पना की, जो आरोग्य प्रदान करने वाला है।
संपत्कारं स्वमायाया वरं च कृतवांस्ततः।
जनने दुर्गतिक्रांते कुमारस्य ततः परम्॥१४॥
तत्पश्चात अपनी माया शक्ति का वार बनाया, जो सम्पत्ति प्रदान करने वाला है। जन्मकाल मे दुर्गति ग्रस्त बालक कि रक्षा के लिये उन्होने कुमार के वार कि कल्पना की।
आलस्यदुरितक्रांत्यै वारं कल्पितवान्प्रभुः।
रक्षकस्य तथा विष्णोर्लोकानां हितकाम्यया॥१५॥
तत्पश्चात सर्व समर्थ महादेवजी ने आलस्य और पाप की निवृत्ति तथा समस्त लोकों का हित करने की इच्छा से लोक रक्षक भगवान विष्णु का वार बनाया।
पुष्ट्यर्थं चैव रक्षार्थं वारं कल्पितवान्प्रभुः।
आयुष्करं ततो वारमायुषां कर्तुरेव हि॥१६॥
इसके बाद सबके स्वामी भगवान शिव ने पुष्टि और रक्षा के लिये आयुःकर्ता त्रिलोकसृष्टा परमेष्ठी ब्रह्मा का आयुष्कारक वार बनाया।
त्रैलोक्यसृष्टिकर्तुर्हि ब्रह्मणः परमेष्ठिनः।
जगदायुष्यसिद्ध्यर्थं वारं कल्पितवान्प्रभुः॥१७॥
आदौ त्रैलोक्यवृद्ध्यर्थं पुण्यपापे प्रकल्पिते।
तयोः कर्त्रोस्ततो वारमिंद्रस्य च यमस्य च॥१८॥
जिससे सम्पुर्ण जगत के आयुष्य की सिद्धी हो सके। इसके बाद तिनो लोकों की वृद्धि के लिये पहले पुण्य-पाप की रचना हो जाने पर उनके करने वाले लोगों को शुभाशुभ फल देने के लिये भगवान शिव ने इन्द्र और यम के वारों का निर्माण किया।
भोगप्रदं मृत्युहरं लोकानां च प्रकल्पितम्।
आदित्यादीन्स्वस्वरूपान्सुखदुःखस्य सूचकान्॥१९॥
ये दोनो वार क्रमशः भोग देने वाले तथा लोगो के मृत्यु भय को दुर करने वाले है। इसके बाद सुर्यादि सात ग्रहों को, जो अपने ही स्वरुपभूत तथा प्राणियों के लिये सुख-दुःख के सूचक है, भगवान शिव ने उपर्युक्त सात वारों का स्वामी निश्चित किया।
वारेशान्कल्पयित्वादौ ज्योतिश्चक्रेप्रतिष्ठितान्।
स्वस्ववारे तु तेषां तु पूजा स्वस्वफलप्रदा॥२०॥
वे सब के सब ग्रह-नक्षत्रों के ज्योतिर्मय मण्डल मे प्रतिष्ठित है। शिव के वार या दिन के स्मामी सूर्य है। शक्ति सम्बन्धि वार के स्वामी सोम है। कुमार सम्बन्धि दिन के अधिपति मंगल है। विष्णुवार के स्वामी बुध है। ब्रह्माजी के वार के अधिपति बृहस्पति है। इन्द्रवार के स्वामी शुक्र और यमवार के स्वामी शनैश्चर है। अपने-अपने वार मे कि हुई उन देवताओं की पूजा उनके अपने-अपने फल देने वाली होती है।
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