ShivPuraan in hindi kathaa chepter 14 (श्रीशिवमहापुराण- चौदहवाँ अध्याय: अग्नियज्ञ, देवयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ आदि का वर्णन, भगवान शिव के द्वारा सातों वारों का निर्माण तथा उनमें देवाराधना से विभिन्न प्रकार के फलों की प्राप्ति का कथन), page:3
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: चौदहवाँ अध्याय

अग्नियज्ञ, देवयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ आदि का वर्णन, भगवान शिव के द्वारा सातों वारों का निर्माण तथा उनमें देवाराधना से विभिन्न प्रकार के फलों की प्राप्ति का कथन : पृष्ठ 3


आरोग्यं संपदश्चैव व्याधीनां शांतिरेव च।
पुष्टिरायुस्तथा भोगो मृतेर्हानिर्यथाक्रमम्॥२१॥
सूर्य आरोग्य और चन्द्रमा सम्पत्ति के दाता है। मङ्गल व्याधियों का निवारण करने है। शुक्र भोग देते है और शनैश्वर मृत्यु का निवारण करते है।
वारक्रमफलं प्राहुर्देवप्रीतिपुरःसरम्।
अन्येषामपि देवानां पूजायाः फलदः शिवः॥२२॥
ये सात वारों के क्रमशः फल बताये गये है, जो उन-उन देवताओं की प्रीति से प्राप्त होते हैं। अन्य देवताओं की भी पूजा का फल देने वाले भगवान शिव ही है।
देवानां प्रीतये पूजापञ्चधैव प्रकल्पिता।
तत्तन्मंत्रजपो होमो दानं चैव तपस्तथा॥२३॥
देवताओं की प्रसन्नता के लिये पूजा की पाँच प्रकार की ही पद्धति बनायी गयी है। 'समबन्धित देवताओं के मन्त्रों का जप' यह पहला प्रकार है, 'उनके लिये होम करना' दुसरा, 'दान करना' तिसरा, 'तपस्या करना' चौथा प्रकार है।
स्थंडिले प्रतिमायां च ह्यग्नौ ब्राह्मणविग्रहे।
समाराधनमित्येवं षोडशैरुपचारकैः॥२४॥
तथा 'किसी वेदी पर, प्रतिमा पर, अग्नि मे अथवा ब्राह्मण के शरीर मे आराध्य देवता की भावना करके सोलह उपचारों से पूजा या आराधना करना पाँचवा प्रकार है।
उत्तरोत्तरवैशिष्ट्यात्पूर्वाभावे तथोत्तरम्।
नेत्रयोः शिरसो रोगे तथा कुष्ठस्य शांतये॥२५॥
आदित्यं पूजयित्वा तु ब्राह्मणान्भोजयेत्ततः।
दिनं मासं तथा वर्षं वर्षत्रयमथवापि वा॥२६॥
इनके पूजा के उत्तरोत्तर आधार श्रेष्ठ है। पूर्व-पूर्व के उत्तरोत्तर आधार का अवलम्बन करना चाहिए। दोनों नेत्रों तथा मस्तक के रोग मे और कुष्ठरोग की शांति के लिये भगवान सूर्य की पूजा करके ब्रह्मणों को भोजन कराये। तद्नतर एक दिन, एक मास, एक वर्ष अथवा तिन वर्ष तक लगातार ऐसा साधन करना चाहिए।
प्रारब्धं प्रबलं चेत्स्यान्नश्येद्रोगजरादिकम्।
जपाद्यमिष्टदेवस्य वारादीनां फलं विदुः॥२७॥
इससे यदि प्रबल प्रारब्ध का निर्माण हो जाय तो रोग एवं जरा आदि रोगों का नाश हो जाता है। इष्ट देव के नाममन्त्रों का जप आदि साधन बार-बार आदि के अनुसार फल देते है।
पापशांतिर्विशेषेण ह्यादिवारे निवेदयेत्।
आदित्यस्यैव देवानां ब्राह्मणानां विशिष्टदम्॥२८॥
रविवार को सूर्यदेव के लिये, अन्य देवताओं के लिये तथा ब्राह्मणों के लिये विशिष्ट वस्तु अर्पित करेँ। यह साधन विशिष्ट फल देने वाला होता है तथा इसके द्वारा विशेषरुप से पापों की शान्ति होती है।
सोमवारे च लक्ष्म्यादीन्संपदर्थं यजेद्बुधः।
आज्यान्नेन तथा विप्रान्सपत्नीकांश्च भोजयेत्॥२९॥
काल्यादीन्भौम वारे तु यजेद्रोगप्रशांतये।
माषमुद्गाढकान्नेन ब्रह्मणांश्चैव भोजयेत्॥३०॥
सोमवार को विद्वान पुरुष सम्पत्ति की प्राप्ति के लिये लक्ष्मी आदि की पूजा करे तथा सपत्नीक ब्राह्मणों को घृतपक्क अन्न का भोजन कराये। मङ्गलवार को रोगों की शान्ति के लिये काली आदि की पूजा करे तथा उड़द, मुँग एवं अरहर की दाल आदि से युक्त अन्न ब्रह्मणों को भोजन कराये।
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