ShivPuraan in hindi kathaa chepter 14 (श्रीशिवमहापुराण- चौदहवाँ अध्याय: अग्नियज्ञ, देवयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ आदि का वर्णन, भगवान शिव के द्वारा सातों वारों का निर्माण तथा उनमें देवाराधना से विभिन्न प्रकार के फलों की प्राप्ति का कथन), page:5
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: चौदहवाँ अध्याय

अग्नियज्ञ, देवयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ आदि का वर्णन, भगवान शिव के द्वारा सातों वारों का निर्माण तथा उनमें देवाराधना से विभिन्न प्रकार के फलों की प्राप्ति का कथन : पृष्ठ 5


तस्माद्वै देवयजनं सर्वाभीष्टफलप्रदम्।
समंत्रकं ब्राह्मणानामन्येषां चैव तांत्रिकम्॥४१॥
इससे सिद्ध है कि देवताओं का यजन सम्पुर्ण अभिष्ठ वस्तुओं को देने वाला है। ब्राह्मणों का देव यजन कर्म वैदिक मन्त्रों के साथ होना चाहिये। (यहाँ 'ब्राह्मण' शब्द क्षत्रिय और वैश्य का भी उपलक्षण है।) शुद्र आदि दुसरों का देवयज्ञ तान्त्रिक विधि से होना चाहिये।
यथाशक्त्यानुरूपेण कर्तव्यं सर्वदा नरैः।
सप्तस्वपि च वारेषु नरैः शुभफलेप्सुभिः॥४२॥
शुभ फल की इच्छा रखने वाले मनुष्यों को सातो ही दिन अपनी शक्ति के अनुसार सदा देवपूजन करना चाहिये।
दरिद्रस्तपसा देवान्यजेदाढ्यो धनेन हि।
पुनश्चैवंविधं धर्मं कुरुते श्रद्धया सह॥४३॥
निर्धन मनुष्य तपस्या (व्रत आदि के कष्ट-सहन) द्वारा और धनी धन के द्वारा देवताओं की आराधना करें। वह बार-बार श्रद्धा-पुर्वक इस तरह के धर्म का अनुष्ठान करता है।
पुनश्च भोगान्विविधान्भुक्त्वा भूमौ प्रजायते।
छायां जलाशयं ब्रह्मप्रतिष्ठां धर्मसंचयम्॥४४॥
सर्वं च वित्तवान्कुर्यात्सदा भोगप्रसिद्धये।
कालाच्च पुण्यपाकेन ज्ञानसिद्धिः प्रजायते॥४५॥
बारंबार पुण्यलोको मे नाना प्रकार के फल भोगकर पुनः इस पृथ्वि पर जन्म ग्रहण करता है। धनवान पुरुष सदा भोग सिद्धी के लिये मार्ग मे वृक्षादि लगाकर लोगो के लिये छाया कि व्यवस्था करें। जलाशय (कुँआ, बावली और पोखरे) बनवाये। वेद-शास्त्रों की प्रतिष्ठा के लिये पाठशालाओं का निर्माण करवाये तथा अन्यान्य प्रकार से भी धर्म का संग्रह करता रहे। धनी को यह सब कार्य सदा ही करते रहना चाहिये। समयानुसार पुण्यकर्मों के परिपाक से अन्तःकरण शुद्ध होने पर ज्ञान की सिद्धि हो जाती है।
य इमं शृणुतेऽध्यायं पठते वा नरो द्विजाः।
श्रवणस्योपकर्ता च देवयज्ञफलं लभेत्॥४६॥
द्विजों! जो इस अध्याय को सुनता पढता अथवा सुनने की व्यवस्था करता है, उसे देवयज्ञ का फल प्राप्त होता है।
॥ इति श्रीशिवमहापुराणे विद्येश्वरसंहितायां चतुर्दशोऽध्यायः ॥
॥ श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता का "अग्नियज्ञ, देवयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ आदि का वर्णन, भगवान शिव के द्वारा सातों वारों का निर्माण तथा उनमें देवाराधना से विभिन्न प्रकार के फलों की प्राप्ति का कथन" नामक यह चौदहवाँ अध्याय सम्पुर्ण हुआ ॥
पंद्रहवाँ अध्याय: देश, काल, पात्र और दान आदि का विचार
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