ShivPuraan in hindi kathaa chepter 15 (श्रीशिवमहापुराण- पंद्रहवाँ अध्याय: देश, काल, पात्र और दान आदि का विचार), page:1
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: पंद्रहवाँ अध्याय

देश, काल, पात्र और दान आदि का विचार : पृष्ठ 1


ऋषय ऊचुः
देशादीन्क्रमशो ब्रूहि सूत सर्वार्थवित्तम्।
सूत उवाच
शुद्धं गृहं समफलं देवयज्ञादिकर्मसु॥१॥
ॠषियों ने कहा — समस्त पदार्थों के ज्ञाताओं मे श्रेष्ठ सूतजी! अब आप क्रमशः देश, काल आदि का वर्णन करें।
सूतजी बोले — महर्षियों! देवयज्ञ आदि कर्मों मे अपना शुद्ध गृह समान फल देने वाला होता है अर्थात अपने घर मे किये हुए देवयज्ञ आदि शास्त्रोक्त फल को सममात्रा मे देने वाले होते है।
ततो दशगुणं गोष्ठं जलतीरं ततो दश।
ततो दशगुणं बिल्वतुलस्यश्वत्थमूलकम्॥२॥
गोशाला का स्थान घर की अपेक्षा दसगुना फल देता है। जलाशय का तट उससे दसगुना महत्त्व रखता है तथा जहाँ बेल, तुलसी एवं पीपल वृक्ष का मूल निकट हो, वह स्थान जलाशय के तट से भी दसगुना फल देता है।
ततो देवालयं विद्यात्तीर्थतीरं ततो दश।
ततो दशगुणं नद्यास्तीर्थनद्यास्ततो दश॥३॥
सप्तगंगानदीतीरं तस्या दशगुणं भवेत्।
गंगा गोदावरी चैव कावेरी ताम्रपर्णिका॥४॥
सिंधुश्च सरयू रेवा सप्तगंगाः प्रकीर्तिताः।
ततोऽब्धितीरं दश च पर्वताग्रे ततो दश॥५॥
देवालय को उससे भी दसगुने महत्त्व का स्थान जानना चाहिये। देवालय से भी दसगुना महत्त्व रखता है तीर्थभूमि का तट। उससे दसगुना श्रेष्ठ है नदि का किनारा। उससे दसगुना उत्कृष्ट है तीर्थनदि का तट और उससे भी दसगुना महत्त्व रखता है सप्तगंगा नामक नदियों का तीर्थ। गंगा, गोदावरी, कावेरी, ताम्रपर्णी, सिन्धु, सरयु और नर्मदा - इन सात नदियों को सप्तगंगा कहा गया है। समुद्र के तट का स्थान इससे भी दसगुना पवित्र माना गया है और पर्वत के शिखर का प्रदेश समुद्र तट से भी दसगुना पवित्र माना गया है।
सर्वस्मादधिकं ज्ञेयं यत्र वा रोचते मनः।
कृते पूर्णफलं ज्ञेयं यज्ञदानादिकं तथा॥६॥
सबसे महत्त्व का स्थान उसे मानना चाहिये जहाँ मन लग जाये। यहाँ तक देश का वर्णन हुआ है, अब काल का तारतम्य बताया जाता है - सत्ययुग मे यज्ञ, दान आदि कर्म पूर्ण फल देने वाले होते है, ऐसा जानना चाहिये।
त्रेतायुगे त्रिपादं च द्वापरेऽर्धं सदा स्मृतम्।
कलौ पादं तु विज्ञेयं तत्पादोनं ततोर्धके॥७॥
त्रेतायुग मे उसका तीन चौथाई फल मिलता है। द्वापर मे सदा आधे ही फल की प्राप्ति कही गयी है। कलियुग मे एक चौथाई ही फल की प्राप्ति समझनी चाहिये और आधा कलियुग बितने पर उस चौथाई फल मे से भी चतुर्थांश कम हो जाता है।
शुद्धात्मनः शुद्धदिनं पुण्यं समफलं विदुः।
तस्माद्दशगुणं ज्ञेयं रविसंक्रमणे बुधाः॥८॥
शुद्ध अन्तःकरण वाले पुरुष को शुद्ध एवं पवित्र दिन सम फल देने वाला होता है। विद्वान ब्राह्मणों! सूर्य-संक्रान्ति के दिन किया हुआ सत्कर्म पूर्वोक्त शुद्ध दिन की अपेक्षा दसगुना फल देने वाला होता है, यह जानना चाहिये।
विषुवे तद्दशगुणमयने तद्दश स्मृतम्।
तद्दश मृगसंक्रांतौ तच्चंद्रग्रहणे दश॥९॥
उससे भी दसगुना अधिक महत्त्व उस कर्म का है, जो विषुव नामक योग मे किया जाता है। दक्षिणायन आरम्भ होने के दिन अर्थात कर्क की संक्रान्ति मे किये हुए पुण्य-कर्म का महत्त्व विषुव योग मे किये कर्म से दसगुना महत्त्व का माना गया है। उससे भी दसगुना मकर-संक्रान्ति मे और उससे भी दसगुना चन्द्रग्रहण मे किये हुए पुण्य का महत्त्व है। विषुव योग : ज्योतिष के अनुसार वह समय जब कि सूर्य विषुवृत्त रेखा पर पहुँचता है और दिन तथा रात दोनों बराबर होते है। यह योग वर्ष मे दो बार आता है - एक सौर चैत्रमास की नवमी तिथि या अंग्रेजी तारीख 21 मार्च को और दुसरा सौर आश्विन की नवमी तिथि या अंग्रेजी तारीख 22 सितम्बर को।
ततश्च सूर्यग्रहणे पूर्णकालोत्तमे विदुः।
जगद्रूपस्य सूर्यस्य विषयोगाच्च रोगदम्॥१०॥
अतस्तद्विषशांत्यर्थं स्नानदानजपां चरेत्।
विषशांत्यर्थकालत्वात्स कालः पुण्यदः स्मृतः॥११॥
सूर्यग्रहण का समय सबसे उत्तम है। उसमे किये गये पूण्य-कर्म का फल चंद्रग्रहण से भी अधिक और पूर्णमात्रा मे प्राप्त होता है। इस बात को विज्ञ पूरुष जानते है। जगतरुपी सूर्य का राहूरुपी विष से संयोग होता है, इसलिये सूर्यग्रहण का समय रोग प्रदान करने वाला होता है। अतः उस विष की शांति के लिये उस समय स्नान, दान और जप करें। यह काल विष की शान्ति के लिये उपयोगी होने के कारण पुण्यप्रद माना गया है।
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