ShivPuraan in hindi kathaa chepter 15 (श्रीशिवमहापुराण- पंद्रहवाँ अध्याय: देश, काल, पात्र और दान आदि का विचार), page:2
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: पंद्रहवाँ अध्याय

देश, काल, पात्र और दान आदि का विचार : पृष्ठ 2


जन्मर्क्षे च व्रतांते च सूर्यरागोपमं विदुः।
महतां संगकालश्च कोट्यर्कग्रहणं विदुः॥१२॥
तपोनिष्ठा ज्ञाननिष्ठा योगिनो यतयस्तथा।
पूजायाः पात्रमेते हि पापसंक्षयकारणम्॥१३॥
जन्म-नक्षत्र के दिन तथा व्रत की पूर्ति के दिन का समय सूर्यग्रहण के समान ही समझा जाता है। परंतु महापुरुषों के सङ्ग का काल करोड़ों सूर्यग्रहण के समान है, ऐसा ज्ञानी पुरुष जानते-मानते है। तपोनिष्ठ योगी और ज्ञाननिष्ठ यति- ये पूजा के पात्र है; क्योंकि ये पापों के नाश मे कारण होते है।
चतुर्विंशतिलक्षं वा गायत्र्या जपसंयुतः।
ब्राह्मणस्तु भवेत्पात्रं संपूर्णफलभोगदम्॥१४॥
जिसने चौबीस लाख गायत्री का जप कर लिया हो, वह ब्राह्मण भी पूजा का उत्तम पात्र है। वह सम्पूर्ण फलों और भोगों को देने मे समर्थ है।
पतनात्त्रायत इति पात्रं शास्त्रे प्रयुज्यते।
दातुश्च पातकात्त्राणात्पात्रमित्यभिधीयते॥१५॥
जो पतन से त्राण करता अर्थात नरक मे गिरने से बचाता है, उसके लिये उसके लिये इसी गुण के कारण शास्त्र मे 'पात्र' शब्द का प्रयोग होता है। यह दाता का पातक से त्राण करने के कारण 'पात्र' कहलाता है;
गायकं त्रायते पाताद्गायत्रीत्युच्यते हि सा।
यथाऽर्थहिनो लोके ऽस्मिन्परस्यार्थं न यच्छति॥१६॥
अर्थवानिह यो लोके परस्यार्थं प्रयच्छति।
स्वयं शुद्धो हि पूतात्मा नरान्सत्रातुमर्हति॥१७॥
इसीलिये वह गायत्री कहलाती है। जैसे इस लोक मे जो धनहीन है वह दुसरों को धन नहीं दे सकता पर जो यहाँ धनवान है वही दुसरों को धन दे सकता है, उसी प्रकार जो स्वयं शुद्ध एवं पवित्रात्मा है, वही दुसरे मनुष्यों का त्राण या उद्धार कर सकता है।
गायत्रीजपशुद्धो हि शुद्धब्राह्मण उच्यते।
तस्माद्दाने जपे होमे पूजायां सर्वकर्मणि॥१८॥
दानं कर्तुं तथा त्रातुं पात्रं तु ब्राह्मणोर्हति।
अन्नस्य क्षुधितं पात्रं नारीनरमयात्मकम्॥१९॥
जो गायत्री का जप करके शुद्ध हो गया है, वही शुद्ध ब्राह्मण कहलाता है। इसलिये दान, जप, होम और पूजा सभी कर्मों के लिये वही शुद्ध पात्र है।
ब्राह्मणं श्रेष्ठमाहूय यत्काले सुसमाहितम्।
तदर्थं शब्दमर्थं वा सद्बोधकमभीष्टदम्॥२०॥
ऐसा ब्राह्मण ही दान तथा रक्षा करने की पात्रता रखता है। स्त्री हो या पुरूष- जो भी भूखा हो, वही अन्नदान का पात्र है।
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