ShivPuraan in hindi kathaa chepter 15 (श्रीशिवमहापुराण- पंद्रहवाँ अध्याय: देश, काल, पात्र और दान आदि का विचार), page:5
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: पंद्रहवाँ अध्याय

देश, काल, पात्र और दान आदि का विचार : पृष्ठ 5


क्षत्रियाणां विशां चैव शौर्यवाणिज्यकार्जितम्।
उत्तमं द्रव्यमित्याहुः शूद्राणां भृतकार्जितम्॥४१॥
क्षत्रियों का शौर्य से कमाया हुआ, वैश्यों का व्यापार से कमाया हुआ और शुद्रों का सेवावृत्ति से प्राप्त किया हुआ धन भी उत्तम द्रव्य कहलाता है।
स्त्रीणां धर्मार्थिनां द्रव्यं पैतृकं भर्तृकं तथा।
गवादीनां द्वादशीनां चैत्रादिषु यथाक्रमम्॥४२॥
धर्म कि ईच्छा रखने वाली स्त्रियों को जो धन पिता व पति से मिला हुआ हो उनके लिये वह धन उत्तम द्रव्य है। गौ आदि बारह वस्तुओं का चैत्र आदि बारह मास मे निम्न प्रकार क्रमशः दान करना चाहिये।
संभूय वा पुण्यकाले दद्यादिष्टसमृद्धये।
गोभूतिलहिरण्याज्यवासोधान्यगुडानि च॥४३॥
रौप्यं लवणकूष्मांडे कन्याद्वादशकं तथा।
गोदानाद्दत्तगव्येन गोमयेनोपकारिणा॥४४॥
गौ, भूमि, तिल, सुवर्ण, घी, वस्त्र, धान्य, गुड़, चाँदी, नमक, कौंहड़ा और कन्या - ये ही वे बारह वस्तुएँ है। इनमे गौदान से कायिक, वाचिक और मानसिक पापों का निवारण तथा कायिक आदि पुण्यकर्मों की पुष्टि होती है।
धनधान्याद्याश्रितानां दुरितानां निवारणम्।
जलस्नेहाद्याश्रितानां दुरितानां तु गोजलैः॥४५॥
आश्रीतों को धन धान्य आदि प्रदान करने तथा जल आदि पिलाना से पापों का निवारण होता है।
कायिकादित्राणां तु क्षीरदध्याज्यकैस्तथा।
तथा तेषां च पुष्टिश्च विज्ञेया हि विपश्चिता॥४६॥
मक्खन, दही आदि वस्तुवों का दान कायिक आदि पिड़ाओं मुक्ति दिलाकर पुष्टि प्रदान करता है, बुद्धिमान लोग ऐसा जानते है।
भूदानं तु प्रतिष्ठार्थमिह चाऽमुत्र च द्विजाः।
तिलदानं बलार्थं हि सदा मृत्युजयं विदुः॥४७॥
ब्राह्मणों! भूमि का दान इहलोक मे प्रतिष्ठा (आश्रय) की प्राप्ति कराने वाला है। तिल का दान बल वर्धक एवं मृत्यु का निवारक होता है।
हिरण्यं जाठराग्नेस्तु वृद्धिदं वीर्यदं तथा।
आज्यं पुष्टिकरं विद्याद्वस्त्रमायुष्करं विदुः॥४८॥
सुवर्ण का दान जठराग्नि को बढाने वाला तथा वीर्यदायक है। घी का दान पुष्टिकारक होता है। वस्त्र का दान आयु की वृद्धि कराने वाला होता है, ऐसा जानना चाहिये।
धान्यमन्नं समृद्ध्यर्थं मधुराहारदं गुडम्।
रौप्यं रेतोभिवृद्ध्यर्थं षड्रसार्थं तु लावणम्॥४९॥
धान्य का दान अन्न-धन की समृद्धि मे कारण होता है। गुड़ का दान मधुर भोजन की प्राप्ति कराने वाला होता है। चाँदि के दान से वीर्य की वृद्धी होती है। नमक का दान षडरस भोजन की प्राप्ती कराता है।
सर्वं सर्वसमृद्ध्यर्थं कूष्मांडं पुष्टिदं विदुः।
प्राप्तिदं सर्वभोगानामिह चाऽमुत्र च द्विजाः॥५०॥
सब प्रकार का दान सारी समृद्धि की सिद्धि के लिये होता है। विज्ञ पुरुष कूष्मांड के दान को पुष्टिदायक मानते है।
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