ShivPuraan in hindi kathaa chepter 15 (श्रीशिवमहापुराण- पंद्रहवाँ अध्याय: देश, काल, पात्र और दान आदि का विचार), page:6
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: पंद्रहवाँ अध्याय

देश, काल, पात्र और दान आदि का विचार : पृष्ठ 6


यावज्जीवनमुक्तं हि कन्यादानं तु भोगदम्।
पनसाम्रकपित्थानां वृक्षाणां फलमेव च॥५१॥
कदल्याद्यौषधीनां च फलं गुल्मोद्भवं तथा।
माषादीनां च मुद्गानां फलं शाकादिकं तथा॥५२॥
मरीचिसर्षपाद्यानां शाकोपकरणं तथा।
यदृतौ यत्फलं सिद्धं तद्देयं हि विपश्चिता॥५३॥
कन्यादान आजीवन भोग देने वाला कहा गया है। ब्राह्मणों! वह लोक और परलोक मे भी सम्पुर्ण भोगो की प्राप्ती कराने वाला है। कटहल, आम आदि वृक्ष के फल तथा कदली वृक्ष आदि औषधी वाले वृक्ष लगाना भी आने वाली अनेक विपत्तीयों से छुटकारा दिलाता है।
श्रोत्रादींद्रियतृप्तिश्च सदा देया विपश्चिता।
शब्दादिदशभोगार्थं दिगादीनां च तुष्टिदा॥५४॥
विद्वान पुरुष को चाहिये की जिन वस्तुओं से श्रवण आदि इनद्रिओं की तृप्ति होति है, उनका सदा दान करे। श्रोत्र आदि दस इनद्रियों के जो शब्द आदि दस विषय है, उनका दान किया जाय तो वे भोगों की प्राप्ती कराते है तथा दिशा आदि इन्द्रिय देवताओं को संतुष्ट करते है।
वेदशास्त्रं समादाय बुद्ध्वा गुरुमुखात्स्वयम्।
कर्मणां फलमस्तीति बुद्धिरास्तिक्यमुच्यते॥५५॥
वेद और शास्त्र को गुरुमुख से ग्रहण करके गुरु के उपदेश से अथवा स्वयं ही बोध प्राप्त करने के पश्चात जो बुद्धि का निश्चय होता है कि 'कर्मों का फल अवश्य मिलता है' इसी को उच्चकोटि की आस्तिकता कहते है।
बंधुराजभयाद्बुद्धिश्रद्धा सा च कनीयसी।
सर्वाभावे दरिद्रस्तु वाचा वा कर्मणा यजेत्॥५६॥
भाई-बन्धु अथवा राजा के भय से जो आस्तिकताबुद्धि या श्रद्धा होती है, वह कनिष्ठ श्रेणी की आस्तिकता है। जो सर्वथा दरिद्र है, इसलिये जिसके पास समस्त वस्तुओं का अभाव है, वह वाणी अथवा कर्म (शरीर) द्वारा यजन करे।
वाचिकं यजनं विद्यान्मंत्रस्तोत्रजपादिकम्।
तीर्थयात्राव्रताद्यं हि कायिकं यजनं विदुः॥५७॥
मन्त्र, स्त्रोत्र और जप आदि को वाणी द्वारा किया गया यजन समझना चाहिये तथा तीर्थयात्रा और व्रत आदि को विद्वान पुरुष शारीरिक यजन मानते है।
येन केनाप्युपायेन ह्यल्पं वा यदि वा बहु।
देवतार्पणबुद्ध्या च कृतं भोगाय कल्पते॥५८॥
जिस किसी भी उपाय से थोड़ा हो या बहुत, देवतार्पण-बुद्धी से जो कुछ भी दिया अथवा किया जाय, वह दान या सत्कर्म भोगों की प्राप्ति कराने मे समर्थ होता है।
तपश्चर्या च दानं च कर्तव्यमुभयं सदा।
प्रतिश्रयं प्रदातव्यं स्ववर्णगुणशोभितम्॥५९॥
तपस्या और दान - ये दो कर्म मनुष्यों को सदा करने चाहिये तथा ऐसे गृह का दान करना चाहिये जो अपने वर्ण (चमक-दमक या सफाई) और गुण (सुख-सुविधा) से सुशोभित हो।
देवानां तृप्तये ऽत्यर्थं सर्वभोगप्रदं बुधैः।
इहाऽमुत्रोत्तमं जन्मसदाभोगं लभेद्बुधः।
ईश्वरार्पणबुद्ध्या हि कृत्वा मोक्षफलं लभेत्॥६०॥
य इमं पठते ऽध्यायं यः शृणोति सदा नरः।
तस्य वैधर्मबुद्धिश्च ज्ञानसिद्धिः प्रजायते॥६१॥
बुद्धिमान पुरुष देवताओं कि तृप्ति के लिये जो कुछ देते है, वह अतिशय मत्रा मे और सब प्रकार के भोग प्रदान करने वाला होता है। उस दान से विद्वान पुरुष इह लोक और परलोक मे उत्तम जन्म और सदा सुलभ होने वाला भोग पाता है। ईश्वरार्पण-बुद्धि से यज्ञ-दान आदि कर्म करके मनुष्य मोक्ष-फल का भागी होता है।
॥ इति श्रीशिवमहापुराणे विद्येश्वरसंहितायां पञ्चदशोध्यायः ॥
॥ श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता का "देश, काल, पात्र और दान आदि का विचार" नामक यह पंद्रहवाँ अध्याय सम्पुर्ण हुआ ॥
सोलहवाँ अध्याय: पृथ्वी आदि से निर्मित देवप्रतिमाओं के पूजन की विधि, उनके लिये नैदेद्य का विचार, पूजन के विभिन्न उपचारों का फल, विशेष मास, वार, तिथि एवं नक्षत्रों के योग में पूजन का विशेष फल तथा लिङ्ग के वैज्ञानिक स्वरुप का विवेचन
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