ShivPuraan in hindi kathaa chepter 16 (श्रीशिवमहापुराण- सोलहवाँ अध्याय: पृथ्वी आदि से निर्मित देवप्रतिमाओं के पूजन की विधि, उनके लिये नैदेद्य का विचार, पूजन के विभिन्न उपचारों का फल, विशेष मास, वार, तिथि एवं नक्षत्रों के योग में पूजन का विशेष फल तथा लिग्ड़ के वैज्ञानिक स्वरुप का विवेचन), page:1
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: सोलहवाँ अध्याय

पृथ्वी आदि से निर्मित देवप्रतिमाओं के पूजन की विधि, उनके लिये नैवेद्य का विचार, पूजन के विभिन्न उपचारों का फल, विशेष मास, वार, तिथि एवं नक्षत्रों के योग में पूजन का विशेष फल तथा लिङ्ग के वैज्ञानिक स्वरुप का विवेचन : पृष्ठ 1


ऋषय ऊचुः
पार्थिवप्रतिमापूजाविधानं ब्रूहि सत्तम।
येन पूजाविधानेन सर्वाभिष्टमवाप्यते॥१॥
ॠषियों ने कहा— साधुशिरोमणे! अब आप पार्थिव प्रतिमा की पूजा का विधान बताइये, जिससे समस्त अभीष्ट वस्तुओं की प्राप्ति होती है।
सूत उवाच
सुसाधुपृष्टं युष्माभिः सदा सर्वार्थदायकम्।
सद्यो दुःखस्य शमनं शृणुत प्रब्रवीमि वः॥२॥
अपमृत्युहरं कालमृत्योश्चापि विनाशनम्।
सद्यः कलत्रपुत्रादिधनधान्यप्रदं द्विजाः॥३॥
सूतजी बोले— महर्षियों! तुम लोगो ने बहुत उत्तम बात पूछी है। पार्थिव प्रतिमा का पूजन सदा सम्पुर्ण मनोरथों को देने वाला है तथा दुःख का तत्काल निवारण करने वाला है। मैं उसका वर्णन करता हुँ, तूम लोग उसको ध्यान देकर सूनो।
अन्नादिभोज्यं वस्त्रादिसर्वमुत्पद्यते यतः।
ततो मृदादिप्रतिमापूजाभीष्टप्रदा भुवि॥४॥
पुरुषाणां च नारीणामधिकारोत्र निश्चितम्।
नद्यां तडागे कूपे वा जलांतर्मृदमाहरेत्॥५॥
पृथ्वी आदी की बनी हुई देव प्रतिमाओं की पूजा इस भूतल पर अभीष्ट-दायक मानी गयी है, निश्चय ही इसमें पुरुषों व स्त्रियों का भी अधिकार है। नदी, पोखरे अथवा कुएँ मे प्रवेश करके पानी के भीतर से मिट्टी ले आये।
संशोध्य गंधचूर्णेन पेषयित्वा सुमंडपे।
हस्तेन प्रतिमां कुर्यात्क्षीरेण च सुसंस्कृताम्॥६॥
फिर गन्ध-चुर्ण के द्वारा उसका संशोधन करें और शुद्ध मण्डप मे रखकर उसे महीन पिसे और साने। इसके बाद हाथ से प्रतिमा बनाये और दुध से उसका सुन्दर संस्कार करे।
अंगप्रत्यंगकोपेतामायुधैश्च समन्विताम्।
पद्मासनस्थितां कृत्वा पूजयेदादरेण हि॥७॥
उस प्रतिमा मे अङ्ग-प्रत्यङ्ग अच्छी तरह प्रकट हुए हो तथा वह सब प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सम्पन्न बनायी गयी हो। तदन्तर उसे पद्मासन पर स्थापित करके आदर-पूर्वक उसका पूजन करे।
विघ्नेशादित्यविष्णूनामंबायाश्च शिवस्य च।
शिवस्यशिवलिंङ्गं च सर्वदा पूजयेद्द्विज॥८॥
गणेश, सूर्य, विष्णु, दुर्गा और शिव की प्रतिमा का, शिव का एवं शिवलिङ्ग का द्विज को सदा पूजन करना चाहिये।
षोडशैरुपचारैश्च कुर्यात्तत्फलसिद्धये।
पुष्पेण प्रोक्षणं कुर्यादभिषेकं समंत्रकम्॥९॥
षोडशोपचार-पूजन-जनित फल कि सिद्धि के लिये सोलह उपचारों द्वारा पूजन करना चाहिये। पुष्प से प्रोक्षण और मन्त्र-पाठ पुर्वक अभिषेक करे।
शाल्यन्नेनैव नैवेद्यं सर्वं कुडवमानतः।
गृहे तु कुडवं ज्ञेयं मानुषे प्रस्थमिष्यते॥१०॥
सारा नैवेद्य एक कुडव (एक पाव-250 ग्राम) होना चाहिये। घर मे पार्थिव पूजन के लिये एक कुडव और बाहर किसी मनुष्य द्वारा स्थापित शिवलिङ्ग के पूजन के लिये एक प्रस्थ (एक सेर - 870 ग्राम) नैवेद्य तैयार करना आवश्यक है ऐसा जानना चाहिये।
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