ShivPuraan in hindi kathaa chepter 16 (श्रीशिवमहापुराण- सोलहवाँ अध्याय: पृथ्वी आदि से निर्मित देवप्रतिमाओं के पूजन की विधि, उनके लिये नैदेद्य का विचार, पूजन के विभिन्न उपचारों का फल, विशेष मास, वार, तिथि एवं नक्षत्रों के योग में पूजन का विशेष फल तथा लिग्ड़ के वैज्ञानिक स्वरुप का विवेचन), page:12
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: सोलहवाँ अध्याय

पृथ्वी आदि से निर्मित देवप्रतिमाओं के पूजन की विधि, उनके लिये नैवेद्य का विचार, पूजन के विभिन्न उपचारों का फल, विशेष मास, वार, तिथि एवं नक्षत्रों के योग में पूजन का विशेष फल तथा लिङ्ग के वैज्ञानिक स्वरुप का विवेचन : पृष्ठ 12


आदिवारे पञ्चगव्यैरभिषेको विशिष्यते।
गोमयं गोजलं क्षीरं दध्याज्यं पञ्चगव्यकम्॥१११॥
क्षीराद्यं च पृथक्च्चैव मधुना चेक्षुसारकैः।
गव्यक्षीरान्ननैवेद्यं प्रणवेनैव कारयेत्॥११२॥
गाय दूध, गाय का दही और गाय का घी - इन तीनों को पूजन के लिये पृथक-पृथक भी रखे और इन सब को मिलाकर सम्मिलित रुप से पञ्चामृत भी तैयार कर ले। (इनके द्वारा शिवलिंङ्ग का अभिषेक एवं स्नान कराये), फिर गाय के दुध और अन्न के मेल से नैवेद्य तैयार करके प्रणव मन्त्र के उच्चारण पुर्वक उसे भगवान शिव को अर्पित करे।
प्रणवं ध्वनिलिंङ्गं तु नादलिंङ्गं स्वयंभुवः।
बिंदुलिंङ्गं तु यंत्रं स्यान्मकारं तु प्रतिष्ठितम्॥११३॥
उकारं चरलिंङ्गं स्यादकारं गुरुविग्रहम्।
षड्लिंङ्गं पूजयानित्यं जीवन्मुक्तो न संशयः॥११४॥
सम्पुर्ण प्रणव को ध्वनीलिङ्ग कहते है। स्वयम्भुलिङ्ग नाद्स्वरुप होने के कारण नादलिङ्ग कहा गया है। यन्त्र या अर्घा बिन्दूस्वरुप होने के कारण बिन्दुलिङ्ग के रुप मे विख्यात है। उसमे अचल रुप से प्रतिष्ठित जो शिवलिंङ्ग है, वह मकार-स्वरुप है, इसलिये मकारलिङ्ग कहलाता है। सवारी निकालने आदि के लिये जो चरलिङ्ग होता है, वह उकार स्वरुप होने के कारण उकारलिङ्ग कहलाता है तथा पूजा कि दिक्षा देने वाले जो गुरु या आचार्य है, उनका विग्रह अकार का प्रतीक होने से अकारलिङ्ग माना गया है। इस प्रकार अकार, उकार, मकार, बिन्दु, नाद और ध्वनि के रुप मे लिङ्ग के छः भेद है। इन छहो लिङ्गो की नित्य पूजा करने से साधक जीवन मुक्त हो जाता है इसमे संशय नहीं।
शिवस्य भक्त्या पूजा हि जन्ममुक्तिकरी नृणाम्।
रुद्राक्षधारणात्पादमर्धं वैभूतिधारणात्॥११५॥
त्रिपादं मंत्रजाप्याच्च पूजया पूर्णभक्तिमान्।
शिवलिंङ्गं च भक्तं च पूज्य मोक्षं लभेन्नरः॥११६॥
य इमं पठतेऽध्यायं शृणुयाद्वा समाहितः।
तस्यैव शिवभक्तिश्च वर्धते सुदृढा द्विजाः॥११७॥
॥ इति श्रीशिवमहापुराणे विद्येश्वरसंहितायां षोडशो ऽध्यायः ॥
॥ श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता का "पृथ्वी आदि से निर्मित देवप्रतिमाओं के पूजन की विधि, उनके लिये नैवेद्य का विचार, पूजन के विभिन्न उपचारों का फल, विशेष मास, वार, तिथि एवं नक्षत्रों के योग में पूजन का विशेष फल तथा लिङ्ग के वैज्ञानिक स्वरुप का विवेचन" नामक यह सोलहवाँ अध्याय सम्पुर्ण हुआ ॥
सत्रहवाँ अध्याय: षड्​लिग्ङ्स्वरुप प्रणव तथा उसके सुक्ष्म-रुप (ॐकार) और स्थुल-रुप (पञ्चाक्षर-मन्त्र) का विवेचन, उसके जप की विधि एवं महिमा तथा शिव-भक्तों के सत्कार की महत्ता
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