ShivPuraan in hindi kathaa chepter 16 (श्रीशिवमहापुराण- सोलहवाँ अध्याय: पृथ्वी आदि से निर्मित देवप्रतिमाओं के पूजन की विधि, उनके लिये नैदेद्य का विचार, पूजन के विभिन्न उपचारों का फल, विशेष मास, वार, तिथि एवं नक्षत्रों के योग में पूजन का विशेष फल तथा लिग्ड़ के वैज्ञानिक स्वरुप का विवेचन), page:2
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: सोलहवाँ अध्याय

पृथ्वी आदि से निर्मित देवप्रतिमाओं के पूजन की विधि, उनके लिये नैवेद्य का विचार, पूजन के विभिन्न उपचारों का फल, विशेष मास, वार, तिथि एवं नक्षत्रों के योग में पूजन का विशेष फल तथा लिङ्ग के वैज्ञानिक स्वरुप का विवेचन : पृष्ठ 2


दैवे प्रस्थत्रयं योग्यं स्वयंभोः प्रस्थपञ्चकम्।
एवं पूर्णफलं विद्यादधिकं वै द्वयं त्रयम्॥११॥
देवताओं द्वार स्थापित शिवलिंङ्ग के लिये तीन सेर नैवेद्य अर्पित करना उचित है और स्वयं प्रकट हुए स्वयम्भू शिवलिंङ्ग के लिये पाँच सेर। ऐसा करने पर पुर्ण फल कि प्राप्ती समझनी चाहिये।
सहस्रपूजया सत्यं सत्यलोकं लभेद्द्विजः।
द्वादशांगुलमायामं द्विगुणं च ततोऽधिकम्॥१२॥
प्रमाणमंगुलस्यैकं तदूर्ध्वं पञ्चकत्रयम्।
अयोदारुकृतं पात्रं शिवमित्युच्यते बुधैः॥१३॥
इस प्रकार सहस्त्र बार पूजा करने से द्विज सत्यलोक को प्राप्त कर लेता है। बारह अंगुल चौड़ा, इससे दूना और एक अंगुल अधिक अर्थात पच्चीस अंगुल लंबा तथा पंद्रह अंगुल चौड़ा जो लोहे या लकड़ी का बना हुआ पात्र होता है, उसे विद्वान पुरुष 'शिव' कहते है।
तदष्टभागः प्रस्थः स्यात्तच्चतुःकुडवं मतम्।
दशप्रस्थं शतप्रस्थं सहस्रप्रस्थमेव च॥१४॥
जलतैलादिगंधानां यथायोग्यं च मानतः।
मानुषार्षस्वयंभूनां महापूजेति कथ्यते॥१५॥
उसका आठवाँ भाग प्रस्थ कहलाता है, जो चार कुड़व के बराबर माना गया है। मनुष्य द्वारा स्थापित शिवलिंङ्ग के लिये दस प्रस्थ, ॠषियों द्वारा स्थापित शिवलिंङ्ग के लिये सौ प्रस्थ और स्वयम्भू शिवलिंङ्ग के लिये एक सहस्त्र प्रस्थ नैवेद्य निवेदन किया जाय तथा जल, तेल आदि एवं गन्ध द्रव्यों की भी यथायोग्य मात्रा रखी जाय तो यह उन शिवलिंङ्गो की महापूजा बताई जाती है।
अभिषेकादात्मशुद्धिर्गंधात्पुण्यमवाप्यते।
आयुस्तृप्तिश्च नैवेद्याद्धूपादर्थमवाप्यते॥१६॥
देवता का अभिषेक करने (स्नान कराने) से आत्मशुद्धि होती है, गन्ध से पुण्य की प्राप्ति होती है। नैवेद्य लगाने से आयु बढती और तृप्ति होती है। धूप निवेदन करने से धन की प्राप्ति होती है।
दीपाज्ज्ञानमवाप्नोति तांबूलाद्भोगमाप्नुयात्।
तस्मात्स्नानादिकं षट्कं प्रयत्नेन प्रसाधयेत्॥१७॥
दीप दिखाने से ज्ञान का उदय होता है और ताम्बूल समर्पण करने से भोग की उपलब्धि होती है। इसलिये स्नान आदि छः उपचारों को यत्न-पूर्वक अर्पित करें।
नमस्कारो जपश्चैव सर्वाभीष्टप्रदावुभौ।
पूजान्ते च सदाकार्यौ भोगमोक्षार्थिभिर्नरैः॥१८॥
नमस्कार और जप ये दोनों सम्पूर्ण अभीष्ट फल को देने वाले है। इसलिये भोग और मोक्ष की इच्छा रखने वाले लोगों को पूजा के अन्त मे सदा ही जप और नमस्कार करने चाहिये।
संपूज्य मनसा पूर्वं कुर्यात्तत्तत्सदा नरः।
देवानां पूजया चैव तत्तल्लोकमवाप्नुयात्॥१९॥
तदवांतरलोके च यथेष्टं भोग्यमाप्यते।
तद्विशेषान्प्रवक्ष्यामि शृणुत श्रद्धया द्विजाः॥२०॥
मनुष्य को चाहिये कि वह सदा पहले मन से पूजा करके फिर उन-उन उपचारों से पूजा करे देवताओं कि पूजा से उन-उन देवताओं के लोकों कि प्राप्ति होती है तथा उनके अवान्तर लोक मे भी यथेष्ट भोग की वस्तुएँ उपलब्ध होती है। अब मै देव-पूजा से प्राप्त होने वाले विषेश फलों का वर्णन करता हुँ। द्विजों! तुम लोग श्रद्धा-पुर्वक सुनो।
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