ShivPuraan in hindi kathaa chepter 16 (श्रीशिवमहापुराण- सोलहवाँ अध्याय: पृथ्वी आदि से निर्मित देवप्रतिमाओं के पूजन की विधि, उनके लिये नैदेद्य का विचार, पूजन के विभिन्न उपचारों का फल, विशेष मास, वार, तिथि एवं नक्षत्रों के योग में पूजन का विशेष फल तथा लिग्ड़ के वैज्ञानिक स्वरुप का विवेचन), page:3
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: सोलहवाँ अध्याय

पृथ्वी आदि से निर्मित देवप्रतिमाओं के पूजन की विधि, उनके लिये नैवेद्य का विचार, पूजन के विभिन्न उपचारों का फल, विशेष मास, वार, तिथि एवं नक्षत्रों के योग में पूजन का विशेष फल तथा लिङ्ग के वैज्ञानिक स्वरुप का विवेचन : पृष्ठ 3


विघ्नेशपूजया सम्यग्भूर्लोकेऽभीष्टमाप्नुयात्।
शुक्रवारे चतुर्थ्यां च सिते श्रावणभाद्रके॥२१॥
भिषगृक्षे धनुर्मासे विघ्नेशं विधिवद्यजेत्।
शतं पूजासहस्रं वा तत्संख्याकदिनैर्व्रजेत्॥२२॥
विघ्नराज गणेश की पूजा से भूलोक मे उत्तम अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति होती है। शुक्रवार को, श्रावण और भाद्रपद मासों के शुक्ल-पक्ष की चतुर्थी को और पौष मास मे शतभिषा नक्षत्र के आने पर विधि-पूर्वक गणेशजी की पूजा करनी चाहिये। सौ या सहस्त्र दिनों मे सौ या सहस्त्र बार पूजा करे।
देवाग्निश्रद्धया नित्यं पुत्रदं चेष्टदं नृणाम्।
सर्वपापप्रशमनं तत्तद्दुरितनाशनम्॥२३॥
देवता और अग्नि में श्रद्धा रखते हुए किया जाने वाला उनका नित्य पूजन मनुष्य को पूत्र एवं अभीष्ट वस्तु प्रदान करता है। वह समस्त पापों का शमन तथा भिन्न-भिन्न दुष्कर्मों का विनाश करने वाला है।
वारपूजांशिवादीनामात्मशुद्धिप्रदां विदुः।
तीथिनक्षत्रयोगानामाधारं सार्वकामिकम्॥२४॥
विभिन्न वारों मे की हुई शिव आदि की पूजा को आत्मशुद्धि प्रदान करने वाली समझना चाहिये। वार या दिन, तिथि, नक्षत्र और योगों का आधार है। समस्त कामनाओं को देने वाला है।
तथा बृद्धिक्षयाभावात्पूर्णब्रह्मात्मकं विदुः।
उदयादुदयं वारो ब्रह्मप्रभृति कर्मणाम्॥२५॥
उसमें वृद्धि और क्षय नहीं होता। इसलिये उसे पूर्ण ब्रह्म-स्वरुप मानना चाहिये। सूर्योदय-काल से लेकर अगले सूर्योदय-काल काल तक वार की स्थिति मानी गयी है जो ब्राह्मण आदि सभी वर्णों के कर्मों का आधार है।
तिथ्यादौ देवपूजा हि पूर्णभोगप्रदा नृणाम्।
पूर्वभागः पितृ-णां तु निशि युक्तः प्रशस्यते॥२६॥
विहित तिथि के पूर्व-भाग मे की हुई देवपूजा मनुष्यों को पूर्ण भोग प्रदान करने वाली होती है। यदि मध्याह्न के बाद तिथि का आरम्भ होता है तो रात्रियुक्त तिथि का पूर्व-भाग पितरों के श्राद्धादि कर्म के लिये उत्तम बताया जाता है।
परभागस्तु देवानां दिवा युक्तः प्रशस्यते।
उदयव्यापिनी ग्राह्या मध्याह्ने यदि सा तिथिः॥२७॥
ऐसी तिथि का पर-भाग ही दिन से युक्त होता है, अतः वही देवकर्म के लिये प्रशस्त माना गया है। यदि मध्याह्न काल तक तिथि रहे तो उदयव्यापिनी तिथि को ही देवकार्य में ग्रहण करना चाहिये।
देवकार्ये तथा ग्राह्यास्थिति ऋक्षादिकाः शुभाः।
सम्यग्विचार्य वारादीन्कुर्यात्पूजाजपादिकम्॥२८॥
इसी तरह शुभ तिथि एवं नक्षत्र आदि ही देवकार्य मे ग्राह्य होते है। वार आदि का भली-भाँति विचार करके पूजा और जप आदि करने चाहिये।
पूजार्यते ह्यनेनेति वेदेष्वर्थस्य योजना।
पूर्णभोगफलसिद्धिश्च जायते तेन कर्मणा॥२९॥
मनोभावांस्तथा ज्ञानमिष्टभोगार्थयोजनात्।
पूजाशब्दर्थ एवं हि विश्रुतो लोकवेदयोः॥३०॥
वेदों मे पूजा शब्द के अर्थ की इस प्रकार योजना कि गयी है-'पूर्जायते अनेन इति पूजा' यह पूजा शब्द की व्युत्पत्ति है। 'पूः' का अर्थ है भोग और फल कि सिद्धि-वह जिस कर्म से समपन्न होती है, उसका नाम 'पूजा' है। मनोवान्छित वस्तु तथा ज्ञान; ये ही अभीष्ट वस्तुएँ है; सकाम भाव वाले व्यक्ति को अभीष्ट भोग अपेक्षित होता है और निष्काम भाव वाले व्यक्ति को अर्थ परमार्थिक ज्ञान। ये दोनो ही पूजा शब्द के अर्थ है; इनकी योजना करने से ही पूजा शब्द की सार्थकता है। इस प्रकार लोक और वेद मे पूजा-शब्द का अर्थ विख्यात है।
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