ShivPuraan in hindi kathaa chepter 16 (श्रीशिवमहापुराण- सोलहवाँ अध्याय: पृथ्वी आदि से निर्मित देवप्रतिमाओं के पूजन की विधि, उनके लिये नैदेद्य का विचार, पूजन के विभिन्न उपचारों का फल, विशेष मास, वार, तिथि एवं नक्षत्रों के योग में पूजन का विशेष फल तथा लिग्ड़ के वैज्ञानिक स्वरुप का विवेचन), page:4
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: सोलहवाँ अध्याय

पृथ्वी आदि से निर्मित देवप्रतिमाओं के पूजन की विधि, उनके लिये नैवेद्य का विचार, पूजन के विभिन्न उपचारों का फल, विशेष मास, वार, तिथि एवं नक्षत्रों के योग में पूजन का विशेष फल तथा लिङ्ग के वैज्ञानिक स्वरुप का विवेचन : पृष्ठ 4


नित्यनैमित्तिकं कालात्सद्यः काम्ये स्वनुष्ठिते।
नित्यं मासं च पक्षं च वर्षं चैव यथाक्रमम्॥३१॥
तत्तत्कर्मफलप्राप्तिस्तादृक्पापक्षयः क्रमात्।
महागणपतेः पूजा चतुर्थ्यां कृष्णपक्षके॥३२॥
नित्य और नैमेत्तिक कर्म कालान्तर मे फल देते है; किन्तु काम्य कर्म का यदि भली-भाँति अनुष्ठान हुआ हो तो वह तत्काल फलद होता है। प्रतिदिन एक पक्ष, एक मास और एक वर्ष तक लगातार पूजन करने से उन-उन कर्मों के फल की प्राप्ति होती है और उनसे वैसे ही पापों का क्रमशः क्षय होता है।
पक्षपापक्षयकरी पक्षभोगफलप्रदा।
चैत्रे चतुर्थ्यां पूजा च कृता मासफलप्रदा॥३३॥
वर्षभोगप्रदा ज्ञेया कृता वै सिंहभाद्रके।
श्रवण्यादित्यवारे च सप्तम्यां हस्तभे दिने॥३४॥
प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को हुई महागणपति की पूजा एक पक्ष के पापों का नाश करने वाली और एक पक्ष तक उत्तम भोग रुपी फल देने वाली होती है और जब सूर्य सिंह राशी पर स्थित हो, उस समय भाद्रपद मास की चतुर्थी को की हुई गणेशजी की पूजा एक वर्ष तक मनोवान्छित भोग प्रदान करती है-ऐसा जानना चाहिये। श्रावण मास के रविवार को, हस्त नक्षत्र से युक्त सप्तमी तिथि को तथा माघ शुक्ल सप्तमी को भगवान सूर्य का पुजन करना चाहिये।
माघशुक्ले च सप्तम्यामादित्ययजनं चरेत्।
ज्येष्ठभाद्रकसौम्ये च द्वादश्यां श्रवर्णक्षके॥३५॥
ज्येष्ठा तथा भाद्रपद मासों के बुधवार को, श्रवण नक्षत्र से युक्त द्वादशी तिथि को तथा केवल द्वादशी को भी किया गया भगवान विष्णु का पुजन अभीष्ट सम्पत्ति को देने वाला माना गया है।
द्वादश्यां विष्णुयजनमिष्टंसंपत्करं विदुः।
श्रावणे विष्णुयजनमिष्टारोग्यप्रदं भवेत्॥३६॥
गवादीन्द्वादशानर्थान्सांगान्दत्वा तु यत्फलम्।
तत्फलं समवाप्नोति द्वादश्यां विष्णुतर्पणात्॥३७॥
श्रावण मास मे की जाने वाली श्रीहरि की पूजा अभीष्ट मनोरथ और आरोग्य प्रदान करने वाली होती है। अङ्गो एवं उपकरणों सहित पुर्वोक्त गौ आदि बारह वस्तुओं का दान करने से जिस फल की प्राप्ति होती है, उसी को द्वादशी तिथि मे आराधना द्वारा श्रीविष्णु की तृप्ति करके मनुष्य प्राप्त कर लेता है।
द्वादश्यां द्वादशान्विप्रान्विष्णोर्द्वादशनामतः।
षोडशैरुपचारैश्च यजेत्तत्प्रीतिमाप्नुयात्॥३८॥
एवं च सर्वदेवानां तत्तद्द्वादशनामकैः।
द्वादशब्रह्मयजनं तत्तत्प्रीतिकरं भवेत्॥३९॥
जो द्वादशी तिथि को भगवान विष्णु के बारह नामों द्वारा बारह ब्राह्मणों का षोडशोपचार पूजन करता है, वह उनकी प्रसन्नता प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार सम्पूर्ण देवताओं के विभिन्न बारह नामों द्वारा किया हुआ, बारह ब्राह्मणों का पूजन उन-उन देवताओं को प्रसन्न करने वाला होता है।
कर्कटे सोमवारे च नवम्यां मृगशीर्षके।
अंबां यजेद्भूतिकामः सर्वभोगफलप्रदाम्॥४०॥
कर्क की संक्रान्ति से युक्त श्रावण मास मे नवमी तिथि को मृगशिरा नक्षत्र के योग मे अम्बिका का पूजन करे। वे सम्पुर्ण मनोवान्छित भोगो व फलों को देन वाली है।
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