ShivPuraan in hindi kathaa chepter 16 (श्रीशिवमहापुराण- सोलहवाँ अध्याय: पृथ्वी आदि से निर्मित देवप्रतिमाओं के पूजन की विधि, उनके लिये नैदेद्य का विचार, पूजन के विभिन्न उपचारों का फल, विशेष मास, वार, तिथि एवं नक्षत्रों के योग में पूजन का विशेष फल तथा लिग्ड़ के वैज्ञानिक स्वरुप का विवेचन), page:5
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: सोलहवाँ अध्याय

पृथ्वी आदि से निर्मित देवप्रतिमाओं के पूजन की विधि, उनके लिये नैवेद्य का विचार, पूजन के विभिन्न उपचारों का फल, विशेष मास, वार, तिथि एवं नक्षत्रों के योग में पूजन का विशेष फल तथा लिङ्ग के वैज्ञानिक स्वरुप का विवेचन : पृष्ठ 5


आश्वयुक्छुक्लनवमी सर्वाभीष्टफलप्रदा।
आदिवारे चतुर्दश्यां कृष्णपक्षे विशेषतः॥४१॥
ऐश्वर्य की ईच्छा रखने वाले पुरुषों को उस दिन अवश्य उनकी पूजा करनी चाहिये। अश्विन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि सम्पुर्ण अभीष्ट फलों को देने वाली है। उसी मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को यदि रविवार पड़ा हो तो उस दिन का महत्त्व विशेष बढ जाता है।
आर्द्रायां च महार्द्रायां शिवपूजा विशिष्यते।
माघकृष्णचतुर्दश्यां सर्वाभीष्टफलप्रदा॥४२॥
उसके साथ ही यदि आर्द्रा और महार्द्रा (सूर्य संक्रान्ति से युक्त आर्द्रा) का योग हो तो उक्त अवसरों पर की हुई शिव पूजा का विशेष महत्त्व माना गया है। माघ कृष्णा चतुर्दशी को की हुई शिवजी की पूजा सम्पूर्ण अभीष्ट फलों को देने वाली है।
आयुष्करी मृत्युहरा सर्वसिद्धिकरी नृणाम्।
ज्येष्ठमासे महार्द्रायां चतुर्दशीदिनेपि च॥४३॥
मार्गशीर्षार्द्रकायां वा षोडशैरुपचारकैः।
तत्तन्मूर्तिशिवं पूज्य तस्य वै पाददर्शनम्॥४४॥
वह मनुष्य की आयु बढाकर मृत्यु कष्ट को दूर हटाती है और सम्पुर्ण सिद्धियों की प्राप्ति कराती है। ज्येष्ठा मास मे चतुर्दशी को यदि महार्द्रा का योग हो अथवा मार्गशीर्ष मास मे किसी भी तिथि को यदि आर्द्रा नक्षत्र हो तो उस अवसर पर विभिन्न वस्तुओं की बनी हुई मूर्ति के रुप मे शिवजी की जो सोलह उपचारों से पूजा करता है, उस पुण्यात्मा के चरणों का दर्शन करना चाहिये।
शिवस्य यजनं ज्ञेयं भोगमोक्षप्रदं नृणाम्।
वारादिदेवयजनं कार्तिके हि विशिष्यते॥४५॥
भगवान शिव की पूजा मनुष्यों को भोग व मोक्ष देने वाली है, ऐसा जानना चाहिये। कर्तिक मास मे प्रत्येक वार व तिथि मे महादेवजी पूजन का विशेष महत्त्व है।
कार्तिके मासि संप्राप्ते सर्वान्देवान्यजेद्बुधः।
दानेन तपसा होमैर्जपेन नियमेन च॥४६॥
षोडशैरुपचारैश्च प्रतिमा विप्रमंत्रकैः।
ब्राह्मणानां भोजनेन निष्कामार्तिकरो
कार्तिके देवयजनं सर्वभोगप्रदं भवेत्।
व्याधीनां हरणं चैव भवेद्भूतग्रहक्षयः॥४८॥
कार्तिक मास आने पर विद्वान पुरुष दान, तप, होम, जप और नियम आदि के द्वारा समस्त देवताओं का षोडशोपचारों से पूजन करें। उस पूजन मे देव प्रतिमा, ब्राह्मण तथा मन्त्रों का उपयोग आवश्यक है। ब्राह्मणों को भोजन कराने से भी वह पूजन-कर्म समपन्न होता है। पूजक को चाहिये की वह कामनाओं को त्यागकर पीड़ा रहित (शान्त) हो देवाराधना में तत्पर रहे।
कार्तिकादित्यवारेषु नृणामादित्यपूजनात्।
तैलकार्पासदानात्तु भवेत्कुष्ठादिसंक्षयः॥४९॥
हरीतकीमरीचीनां वस्त्रक्षीरादिदानतः।
ब्रह्मप्रतिष्ठया चैव क्षयरोगक्षयो भवेत्॥५०॥
कार्तिक मास मे देवताओं का यजन-पूजन समस्त भोगों को देने वाला तथा भूतों और ग्रहों का विनाश करने वाला है। कार्तिक मास के रविवारों को भगवान सूर्य की पूजा करने और तेल तथा सुती वस्त्र देने से मनुष्यों के कोढ आदि रोगों का नाश होता है। हरे, काली मिर्च, वस्त्र और खीरा आदि का दान और ब्राह्मणों की प्रतिष्ठा करने से क्षय के रोग का नाश होता है।
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