ShivPuraan in hindi kathaa chepter 17 (श्रीशिवमहापुराण- सत्रहवाँ अध्याय: षड्​लिग्ङ्स्वरुप प्रणव तथा उसके सुक्ष्म-रुप (ॐकार) और स्थुल-रुप (पञ्चाक्षर-मन्त्र) का विवेचन, उसके जप की विधि एवं महिमा तथा शिव-भक्तों के सत्कार की महत्ता), page:1
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: सत्रहवाँ अध्याय

षड्​लिङ्गस्वरुप प्रणव तथा उसके सुक्ष्म-रुप (ॐकार) और स्थुल-रुप (पञ्चाक्षर-मन्त्र) का विवेचन, उसके जप की विधि एवं महिमा कार्यब्रह्म के लोकों से लेकर कारणरुद्र के लोकों तक का विवेचन करके कालातीत, पञ्चावरणविशिष्ट शिवलोक के अनिर्वचनीय वैभव का निरुपण तथा शिव-भक्तों के सत्कार की महत्ता : पृष्ठ 1


ऋषय ऊचुः
प्रणवस्य च माहात्म्यं षड्लिंगस्य महामुने।
शिवभक्तस्य पूजां च क्रमशो ब्रूहिनः प्रभो॥१॥
ॠषि बोले — प्रभो! महामुने! आप हमारे लिये क्रमशः षङ्लिङ्गस्वरुप प्रणव का महात्म्य तथा शिव-भक्त के पूजन का प्रकार बताइये।
सूत उवाच
तपोधनैर्भवद्भिश्च सम्यक्प्रश्नस्त्वयं कृतः।
अस्योत्तरं महादेवो जानाति स्म न चापरः॥२॥
सूतजी ने कहा — महर्षियों! आप लोग तपस्या के धनी है, आपने यह बड़ा सुन्दर प्रश्न उपस्थित किया है। किन्तु इसका ठीक-ठीक उत्तर महादेवजी ही जानते है, दूसरा कोई नहीं।
अथापि वक्ष्ये तमहं शिवस्य कृपयैव हि।
शिवोऽस्माकं च युष्माकं रक्षां गृह्णातु भूरिशः॥३॥
तथापि भगवान शिव की कृपा से ही मैं इस विषय का वर्णन करुँगा। वे भगवान शिव हमारी और आप लोगों की रक्षा का भारी भार बारंबार स्वयं ग्रहण करें।
प्रो हि प्रकृतिजातस्य संसारस्य महोदधेः।
नवं नावांतरमिति प्रणवं वै विदुर्बुधाः॥४॥
'प्र' नाम है प्रकृति से उत्पन्न संसार रुपी महासागर का। प्रणव इससे पार करने के लिये दुसरी नव (नाव) है। इसलिये इस ओंकार (ॐ) को प्रणव की संज्ञा देते है।
प्रः प्रपञ्चो न नास्तिवो युष्माकं प्रणवं विदुः।
प्रकर्षेण नयेद्यस्मान्मोक्षं वः प्रणवं विदुः॥५॥
ॐकार अपने जप करने वाले साधकों से कहता है- 'प्र - प्रपञ्च, न - नहीं है, वः - तुम लोगो के लिये।' अतः इस भाव को लेकर भी ज्ञानी पुरुष ओम् (ॐ) को 'प्रणव' नाम से जानते इसका दुसरा भाव 'प्रों' है - 'प्र - प्रकर्षेण, न - नयेत्, चः - युष्मान् मोक्षम् इति चा प्रणवः। अर्थात यह तुम सब उपासकों को बलपूर्वक मोक्ष तक पहुँचा देगा।' इस अभिप्राय से भी इसे ॠषि-मुनि 'प्रणव' कहते हैं।
स्वजापकानां योगिनां स्वमंत्रपूजकस्य च।
सर्वकर्मक्षयं कृत्वा दिव्यज्ञानंतु नूतनम्॥६॥
अपना जप करने वाले योगियों के तथा अपने मन्त्र की पूजा करने वाले उपासक के समस्त कर्मों का नाश करके यह दिव्य नूतन ज्ञान देता है; इसलिये भी इसका नाम प्रणव है।
तमेव मायारहितं नूतनं परिचक्षते।
प्रकर्षेण महात्मानं नवं शुद्धस्वरूपकम्॥७॥
उन माया रहीत महेश्वर को ही नव अर्थात नूतन कहते है। वे परमात्मा प्रकृष्टरुप से नव अर्थात शुद्धरुप है, इसलिये प्रणव कहलाते है।
नूतनं वै करोतीति प्रणवं तं विदुर्बुधाः।
प्रणवं द्विविधं प्रोक्तं सूक्ष्मस्थूलविभेदतः॥८॥
प्रणव साधक को नव अर्थात नवीन (शिवस्वरुप) कर देता है। इसलिये भी विद्वान पुरुष उसे प्रणव के नाम से जानते है। अथवा प्रकृष्टरुप से नव-दिव्य परमात्मज्ञान प्रकट करता है। इसलिये वह प्रणव है।
सूक्ष्ममेकाक्षरं विद्यात्स्थूलं पञ्चाक्षरं विदुः।
सूक्ष्ममव्यक्तपञ्चार्णं सुव्यक्तार्णं तथेतरत्॥९॥
प्रणव के दो भेद बताये गये है- स्थूल और सूक्ष्म। एक अक्षर जो 'ॐ' है, उसे सूक्ष्म प्रणव जानना चाहिये। और 'नमः शिवाय' इस पाँच अक्षर वाले मन्त्र को स्थूल प्रणव समझना चाहिये। जिसमें पाँच अक्षर व्यक्त नहीं है, वह सूक्ष्म है और जिसमें पाँचों अक्षर व्यक्त है, वह स्थूल है।
जीवन्मुक्तस्य सूक्ष्मं हि सर्वसारं हि तस्य हि।
मंत्रेणार्थानुसंधानं स्वदेहविलयावधि॥१०॥
जीवन्मुक्त पुरुष के लिये सूक्ष्म प्रणव के जप का विधान है। वही उसके लिये समस्त साधनों का सार है। (यद्यपि जीवन्मुक्त के लिये किसी साधन की आवश्यक्ता नहीं है, क्योंकी वह सिद्धस्वरुप है, तथापि दूसरों की दृष्टि में जब तक उसका शरीर रहता है, तब तक उसके द्वारा प्रणव जप की सहज साधना स्वतः होती रहती है।) वह अपनी देह का विलय होने तक सुक्ष्म प्रणव मन्त्र का जप और उसके अर्थभूत परमात्म-तत्त्व का अनुसंधान करता रहता है।
FACEBOOK COMMENTES
  Share it --

Shri ShivMahaaPuran (Page 1 of 15)
[First] [1] [2]  [3]  [4]  [5] [Last]