ShivPuraan in hindi kathaa chepter 17 (श्रीशिवमहापुराण- सत्रहवाँ अध्याय: षड्​लिग्ङ्स्वरुप प्रणव तथा उसके सुक्ष्म-रुप (ॐकार) और स्थुल-रुप (पञ्चाक्षर-मन्त्र) का विवेचन, उसके जप की विधि एवं महिमा तथा शिव-भक्तों के सत्कार की महत्ता), page:10
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: सत्रहवाँ अध्याय

षड्​लिङ्गस्वरुप प्रणव तथा उसके सुक्ष्म-रुप (ॐकार) और स्थुल-रुप (पञ्चाक्षर-मन्त्र) का विवेचन, उसके जप की विधि एवं महिमा कार्यब्रह्म के लोकों से लेकर कारणरुद्र के लोकों तक का विवेचन करके कालातीत, पञ्चावरणविशिष्ट शिवलोक के अनिर्वचनीय वैभव का निरुपण तथा शिव-भक्तों के सत्कार की महत्ता : पृष्ठ 10


पुनःकारणरुद्रस्य लोकाष्टाविंशका मताः।
पुनश्च कारणेशस्य षट्पञ्चाशत्तदूर्ध्वगाः॥९१॥
उनसे भी ऊपर फिर कारणरुपी रुद्र के अट्ठाईस लोकों की स्थिति मानी गयी है। फिर उनसे भी ऊपर कारणेश शिव के छप्पन लोक विद्यमान है।
ततः परं ब्रह्मचर्यलोकाख्यं शिवसंमतम्।
तत्रैव ज्ञानकैलासे पञ्चावरणसंयुते॥९२॥
पञ्चमंडलसंयुक्तं पञ्चब्रह्मकलान्वितम्।
आदिशक्तिसमायुक्तमादिलिंगं तु तत्र वै॥९३॥
तदन्तर शिवसम्मत ब्रह्मचर्य लोक है और वहीं पाँच आवरणों से युक्त ज्ञानमय कैलास है, जहाँ पाँच मण्डलों, पाँच ब्रह्मकलाओं और आदिशक्ति से संयुक्त आदिलिङ्ग प्रतिष्ठित है। उसे परमात्मा शिव का शिव का शिवालय कहा गया है।
शिवालयमिदं प्रोक्तं शिवस्य परमात्मनः।
परशक्त्यासमायुक्तस्तत्रैव परमेश्वरः॥९४॥
वहीं पराशक्ति से युक्त परमेश्वर शिव निवास करते है। वे सृष्टि, पालन, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह इन- पाँच कृत्यो मे प्रवीण है।
सृष्टिः स्थितिश्च संहारस्तिरोभावोप्यनुग्रहः।
पञ्चकृत्यप्रवीणोऽसौ सच्चिदानंदविग्रहः॥९५॥
वे सदा ध्यान रुपी में धर्म में ही स्थित रहते है और सदा सब पर अनुग्रह किया करते है।
ध्यानधर्मः सदा यस्य सदानुग्रहतत्परः।
समाध्यासनमासीनः स्वात्मारामो विराजते॥९६॥
वे स्वात्माराम है और समाधीरुप आसन पर आसीन हो नित्य विराजमान होते है।
तस्य संदर्शनं सांध्यं कर्मध्यानादिभिः क्रमात्।
नित्यादिकर्मयजनाच्छिवकर्ममतिर्भवेत्॥९७॥
कर्म एवं ध्यान आदि का अनुष्ठान करने से क्रमशः साधन पथ मे आगे बढने पर उनका दर्शन साध्य होता है। नित्य-नैमित्तिक आदि कर्मो द्वारा देवताओं का यजन करने से भगवान शिव के समाराधन कर्म मे मन लगता है।
क्रियादिशिवकर्मभ्यः शिवज्ञानं प्रसाधयेत्।
तद्दर्शनगताः सर्वे मुक्ता एव न संशयः॥९८॥
क्रिया आदि जो शिव सम्बन्धि कर्म है, उनके द्वारा शिव ज्ञान सिद्ध करे। जिन्होने शिवतत्त्व का साक्षात्कार कर लिया है अथवा जिन पर शिव की कृपा दृष्टि पड़ चुकी है, वे सब मुक्त ही है- इसमे संशय नहीं है।
मुक्तिरात्मस्वरूपेण स्वात्मारामत्वमेव हि।
क्रियातपोजपज्ञानध्यानधर्मेषु सुस्थितः॥९९॥
आत्म स्वरुप से जो स्थिती है, वही मुक्ति है। एक मात्र अपने आत्मा मे रमण या आनन्द का अनुभव करना ही मुक्ति का स्वरुप है।
शिवस्य दर्शनं लब्धा स्वात्मारामत्वमेव हि।
यथा रविः स्वकिरणादशुद्धिमपनेष्यति॥१००॥
कृपाविचक्षणः शंभुरज्ञानमपनेष्यति।
अज्ञानविनिवृत्तौ तु शिवज्ञानं प्रवर्तते॥१०१॥
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